एक कंजूस सेठ के पास एक दिन एक कवि आया। उसने सेठ को उसकी प्रशंसा में कुछ कविताएं सुनाई, जो उसे बहुत पसंद आई। इसके बाद कवि ने उससे कुछ पुरस्कार की याचना की। सेठ ने कुछ अशर्फियां मंगाई और उन्हें अपनी दोनों हथेलियों में बंद करके कवि के कान के पास अपने हाथ हिलाए और बोला कि क्या तुमने अशर्फियों की खनखनाहट सुनी? कवि ने कहा कि हां सुनी।
सेठ ने हंसकर कहा कि तुमने मुझे कविता सुनाकर खुश किया, वैसे ही मैंने भी तुम्हें अशर्फियों की खनखनाहट सुनाकर खुश कर दिया। बेचारा कवि अपना सा मुंह लेकर चला गया। वहीं बैठे सेठ के एक मित्र को यह बात अच्छी नहीं लगी। उसने सेठ को सबक सिखाने की ठानी और उसे शाम को पुलाव खाने के लिए अपने घर आमंत्रित किया। शाम को उसने एक देगची में पुलाव का सामान भरा और उसे छींके में रखकर छत से लटका दिया। नीचे उसने एक मोमबत्ती जलाकर रख दी और सेठ से बातें करने लगा।
काफी देर बाद जब सेठ को भूख सताने लगी तो उसने पुलाव के बारे में पूछा। उसने भीतर दिखाया कि देखो, पुलाव पक रहा है। सेठ चिढ़कर बोला कि इस तरह तो कल तक भी पुलाव नहीं बनेगा। मित्र बोला कि अगर मोमबत्ती की लौ से पुलाव नहीं पक सकता तो सिक्कों की खनखनाहट सुनकर कोई खुश कैसे हो सकता है? सेठ को भूल का एहसास हो गया।
सारः किसी की मजबूरी का अनुचित लाभ नहीं उठाना चाहिए।
ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं– Indradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)
