भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
मौसमे-बहार के फलों से घिरा बेहद नजरफरेब (आँखों को अच्छा लगनेवाला) गेस्ट हाउस हरे-भरे टीले की चोटी पर दूर से नजर आ जाता है। टीले के ऐन (ठीक) नीचे पहाड़ी झील है। एक बल खाती सड़क झील के किनारे-किनारे गेस्ट हाउस के फाटक तक पहुँचती है। फाटक के नजदीक वालरस (एक विशाल समुद्री स्तनपायी) की ऐसी मूंछोंवाला एक फोटोग्राफर अपना साजो-सामान फैलाए एक टीन की कुर्सी पर चुपचाप बैठा रहता है। यह गुमनाम पहाड़ी कस्बा टूरिस्ट इलाके में नहीं है, इस वजह से बहुत कम सय्याह (सैलानी) इस तरफ आते हैं। चुनांचे जब कोई माहे-अस्ल (सुहागरात) माननेवाला जोड़ा या कोई मुसाफिर गेस्ट हाउस में आ पहुँचता है तो फोटोग्राफर बड़ी उम्मीद और सब्र के साथ अपना कैमरा सँभाले बाग की सड़क पर टहलने लगता है। बाग के माली से उसका समझौता है। गेस्ट हाउस में ठहरी किसी नौजवान खातून के लिए सुबह-सवेरे गुलदस्ता ले जाते वक्त माली फोटोग्राफर को इशारा कर देता है और जब माहे-अस्ल मनानेवाला जोड़ा नाश्ते के बाद नीचे बाग में आता है तो माली और फोटोग्राफर दोनों उनके इंतजार में चौकस मिलते हैं।
फोटोग्राफर मुद्दतों से यहाँ मौजूद है। न जाने और कहीं जाकर अपनी दुकान क्यों नहीं सजाता? लेकिन वह इसी कस्बे का बाशिंदा है। अपनी झील और अपनी पहाड़ी छोड़कर कहाँ जाए? इस फाटक की पुलिया पर बैठे-बैठे उसने बदलती दुनिया के रंगारंग तमाशे देखे हैं। पहले यहाँ साहब लोग आते थे। बरतानवी प्लांटर्ज, सफेद सोला हैट पहने कोलोनियल सर्विस के जगादरी (कद्दावर) ओहदेदार, उनकी मेम लोग और बाबा लोग। रात-रात-भर शराबें उड़ाई जाती थीं और ग्रामोफोन चीखते थे और गेस्ट हाउस के निचले ड्राईंग रुम के चोबी (लकड़ी के बने) फर्श पर डांस होता था। दूसरी बड़ी लड़ाई के जमाने में अमरीकन आने लगे थे। फिर मल्क को आजादी मिली और इक्का-दुक्का सय्याह आने शुरू हुए या सरकारी अफसर या नए ब्याहे शामों को झील पर झुकी धनक (धनुष) का नजारा करना चाहते हैं, ऐसे लोग जो सुकून और मुहब्बत के मुतलाशी (तलाश करने वाले) हैं जिसका जिंदगी में वजूद नहीं, क्यों हम जहाँ जाते हैं फना (नश्वरता) हमारे साथ है। हम जहाँ ठहरते हैं फना हमारे साथ है। फना मुसलसल (निरंतर) हमारी हमसफर है।
गेस्ट हाउस में मुसाफिरों की आवक-जावक जारी है। फोटोग्राफर के कैमरे की आँख यह सब देखती है और खामोश रहती है।
एक रोज शाम पड़े एक नौजवान और एक लड़की गेस्टहाउस में आन कर उतरे। यह दोनों अंदाज से माहे-अस्ल मनाने वाले मालूम नहीं होते थे लेकिन बेहद मसरूर (प्रसन्न) और संजीदा-से वह अपना सामान उठाए ऊपर चले गए। ऊपर की मंजिल बिलकुल खाली पड़ी थी। जीने के बराबर में डाइनिंग हॉल था और उसके बाद तीन बड़े रूम।
“यह कमरा मैं लूँगा।”
नौजवान ने पहले बेडरुम में दाखिल होकर कहा, जिसका रुख झील की तरफ था। लड़की ने अपनी छतरी और ओवरकोट उस कमरे के एक पलंग पर फेंक दिया था।
“उठाओ अपना बोरिया-बिस्तर।”
नौजवान ने उससे कहा।
“अच्छा …।”
लड़की दोनों चीजें उठाकर बराबर के सिंटिंग-रुम से गुजरती दूसरे कमरे में चली गई, जिसके पीछे एक पुख्ता गलियारा-सा था। कमरे के बड़े-बड़े दरीचों (खिड़कियों) में से वे मजदूर नजर आ रहे थे जो एक सीढ़ी उठाए पिछली दीवार की मरम्मत में मसरूफ (व्यस्त) थे।
एक बैरा लड़की का सामान लेकर अंदर आया और दरीचों के परदे बराबर करके चला गया। लड़की सफर के कपड़े तब्दील करके सिटिंग-रुम में आ गई। नौजवान आतिशदान के पास एक आरामकुर्सी पर बैठा कुछ लिख रहा था, उसने नजरें उठाकर लड़की को देखा। बाहर झील पर दफअतन (सहसा) अँधेरा छा गया था। वह दरीचे में खड़ी होकर बाग के धुंधलके को देखने लगी। फिर वह भी एक कुर्सी पर बैठ गई, न जाने, वे दोनों क्या बातें करते रहे। फोटोग्राफर जो अब भी नीचे फाटक पर बैठा था, उसका कैमरा आँख रखता था लेकिन समाअत (सुनने) से आरी (वंचित) था।
कुछ देर बाद वे दोनों खाना खाने के कमरे में गए और दरीचे से लगी हुई मेज पर बैठ गए। झील के दूसरे किनारे पर कस्बे की रोशनियाँ झिलमिला उठी थीं।
उस वक्त तक एक यूरोपियन सय्याह भी गेस्टहाउस में आ चुका था। वह खामोश डाइनिंग-हॉल के दूसरे कोने में चुपचाप बैठा खत लिख रहा था। चंद पिक्चर पोस्टकार्ड उसके सामने मेज पर रखे थे।
“यह अपने घर खत लिख रहा है कि मैं इस वक्त पुरअसरार (रहस्यमयी) मशरिक (पूरब) के एक पुरअसरार डाकबंगले में मौजूद हूँ। सुर्ख साड़ी में मलबूस (लिबास पहने) एक पुरअसरार हिंदुस्तानी लड़की मेरे सामने बैठी है। बड़ा ही रोमैंटिक माहौल है।” लड़की ने चुपके से कहा।
उसका साथी हँस पड़ा।
खाने के बाद वे दोनों फिर सिटिंग-रूम में आ गए। नौजवान अब उसे कुछ पढ़कर सुना रहा था, रात थी, रात गहरी होती गई। दफअतन लड़की को जोर की छींक आई और उसने सैं-V करते हुए कहा
“अब सोना चाहिए।”
“तुम अपनी जुकाम की दवा पीना न भूलना।”
नौजवान ने फिक्र से कहा।
“हाँ, शब-बखैर (गुड नाईट)।”
लड़की ने जवाब दिया और अपने कमरे में चली गई। पिछला गलियारा घुप्प अँधेरा पड़ा था,
कमरा बेहद पुरसुकून, खुनक (ठंडा) और आरामदेह था। जिंदगी बेहद पुरसुकून और आरामदेह थी। लड़की ने कपड़े तब्दील करके सिंगार-मेज की दराज खोल दवा की शीशी निकाली कि दरवाजे पर दस्तक हुई। उसने अपना स्याह किमोनो पहनकर दरवाजा खोला। नौजवान जरा खैराया हुआ था, सामने खड़ा था।
“मुझे भी बड़ी सख्त खाँसी उठ रही है।” उसने कहा।
“अच्छा …!”
लड़की ने दवा की शीशी और चमचा उसे दे दिया। चमचा नौजवान के हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गया, उसने झुककर चमचा उठाया और अपने कमरे की तरफ चला गया, लड़की रोशनी बुझाकर सो गई।
सुबह को वह नाश्ते के लिए डाइनिंग-रूम में गई। जीने के बराबर वाले हॉल में फूल महक रहे थे। ताँबे के बड़े-बड़े गुलदान ब्रासो से चमकाए जाने के बाद हॉल के झिलमिलाते चोबी फर्श पर एक कतार में रख दिए गए थे और ताजा फूलों के अंबार उनके नजदीक रखे हुए थे। बाहर सूरज ने झील को रोशन कर दिया था और जर्द व सफेद तितलियाँ सब्जे (हरियाली) पर उड़ती फिर रही थीं। कुछ देर बाद नौजवान हँसता हुआ जीने पर नमूदार हुआ, उसके हाथ में गुलाब के फूलों का एक गुच्छा था।
“माली नीचे खड़ा है, उसने यह गुलदस्ता तुम्हारे लिए भिजवाया है।”
उसने कमरे में दाखिल होकर मुस्कराते हुए कहा और गुलदस्ता मेज पर रख गया।
लड़की ने एक शगूफा (कली) उठाकर बेख्याली से उसे अपने बालों में लगा लिया और अखबार पढ़ने में मसरूफ हो गई।
“एक फोटोग्राफर भी नीचे मँडला रहा है, उसने मुझसे बड़ी संजीदगी से तुम्हारे मुताल्लिक दरयाफ्त किया कि तुम फलाँ फिल्म-स्टार तो नहीं?”
नौजवान ने कुर्सी पर बैठकर चाय बनाते हुए कहा।
लड़की हँस पड़ी। वह एक नामवर रक्कासा (मशहूर नृत्यांगना) थी। मगर इस जगह पर किसी ने उसका नाम भी न सुना था। नौजवान लड़की से भी ज्यादा मशहूर मूसिकार (संगीतकार) था। मगर उसे भी यहाँ कोई न पहचान सका था। इन दोनों को अपनी आरजी (अस्थायी) गुमनामी और मुकम्मल सुकून के यह मुख्तसर लम्हात बहुत भले मालूम हुए।
कमरे के दूसरे कोने में नाश्ता करते हुए अकेले यूरोपियन ने आँखें उठाकर उन दोनों को देखा और जरा-सा मुस्कुराया। वह भी इन दोनों की खामोश मसर्रत (खुशी) में शरीक हो चुका था।
नाश्ते के बाद दोनों नीचे गए और बाग के किनारे गुलमोहर के नीचे खड़े होकर झील को देखने लगे। फोटोग्राफर ने अचानक छलावे की तरह नमूदार होकर बड़े ड्रामाई अंदाज में टोपी उतारी और जरा झुककर कहा-
“फोटोग्राफ, लेडी?”
लड़की ने घड़ी देखी।
“हम लोगों को अभी बाहर जाना है। देर हो जाएगी।”
“लेडी…” फोटोग्राफर ने पाँव मुँडेर पर रखा और एक हाथ फैलाकर बाहर की दुनिया की तरफ इशारा करते हुए जवाब दिया, “बाहर कारजारे-हयात (जीवन के कार्यक्षेत्र) में घमासान का रन पड़ा है। मुझे मालूम है इस घमासान से निकलकर आप दोनों, खुशी के चंद लम्हें चुराने की कोशिश में मसरूफ हैं। देखिए, इस झील के ऊपर धनक पल-की-पल में गायब हो जाती है। लेकिन मैं आपका ज्यादा वक्त न लूँगा। इधर आइए।”
“बड़ा लसान (वाकपटु) फोटोग्राफर है।”
लड़की ने चुपके से अपने साथी से कहा। माली जो गोया अब तक अपने क्यू का मुंतजिर था, दूसरे दरख्त के पीछे से निकला और लपककर एक और गुलदस्ता लड़की को पेश किया। लड़की खिलखिलाकर हँस पड़ी। वह और उसका साथी अमर सुंदरी पार्वती के मुजस्समे (मूर्ति) के करीब जा खड़े हुए। लड़की की आँखों पर धूप पड़ रही थी इसलिए उसने मुस्कुराते हुए आँखें जरा-सी चुधिया दी थीं।।
क्लिक-क्लिक… तस्वीर उतर गई।
“तस्वीर आपको शाम तक मिल जाएगी। बैंक यू, लेडी। बैंक यू, सर…” फोटोग्राफर ने जरा-सा झुककर दोबारा टोपी छुई। लड़की और उसका साथी कार की तरफ चले गए।
सैर करके वे दोनों शाम पड़े लौटे। शाम की नारंगी रोशनी में देर तक बाहर घास पर पड़ी कुर्सियों पर बैठे रहे। जब कोहरा गिरने लगा तो अंदर मंजिल के वसीअ (विस्तृत) और खामोश ड्राइंगरूम में नारंगी कुमकुमों की रोशनी में आ बैठे। न जाने क्या बातें कर रहे थे जो किसी तरह खत्म होने को ही न आती थीं। खाने के वक्त वे ऊपर चले गए। सुबह-सबेरे वे वापस जा रहे थे और अपनी बातों की महवियत (तल्लीनता) में उनको फोटोग्राफर और उसकी खींची हुई तस्वीर याद भी न रही थी।
सुबह को लड़की अपने कमरे ही में थी जब बैरे ने अंदर आकर एक लिफाफा पेश किया।
“फोटोग्राफर साहब, यह रात को दे गए थे।” उसने कहा।
“अच्छा। उस सामने वाली दराज में रख दो।” लड़की ने बेख्याली से कहा और बाल बनाने में जुटी रही।
नाश्ते के बाद सामान बाँधते हुए उसे दराज खोलना याद न रहा और जाते वक्त खाली कमरे पर एक सरसरी नजर डालकर वह तेज-तेज चलती कार में बैठ गई। नौजवान ने कार स्टार्ट कर दी। कार फाटक से बाहर निकली। फोटोग्राफर ने पुलिया पर से उठकर टोपी उतारी। मुसाफिरों ने मुस्कराकर हाथ हिलाए। कार ढलवान से नीचे रवाना हो गई।
वह वालरस की ऐसी मूंछोंवाला फोटोग्राफर अब बहुत बूढ़ा हो चुका है। और उसी तरह उस गेस्टहाउस के फाटक पर टीन की कुर्सी बिछाए बैठा है और सय्याहों की तस्वीरें उतारता रहता है, जो अब नई फजाई सर्विस (हवाई सेवा) शुरू होने की वजह से बड़ी तादाद में इस तरफ आने लगे हैं।
लेकिन इस वक्त एयरपोर्ट से जो टूरिस्ट कोच आकर फाटक में दाखिल हुई, उसमें से सिर्फ एक खातून अपना अटैची केस उठाए बरामद हुई और ठिठककर उन्होंने फोटोग्राफर को देखा, जो कोच को देखते ही फौरन उठ खडा हआ था. मगर किसी जवान और हसीन लडकी के बजाय एक अधेड उम्र की बीबी को देखकर मायूसी से दोबारा जाकर अपनी टीन की कुर्सी पर बैठ चुका था।
खातून ने दफ्तर में जाकर रजिस्टर में अपना नाम दर्ज किया और ऊपर चली गईं। गेस्टहाउस सुनसान पड़ा था। सय्याहों की एक टोली अभी-अभी आगे रवाना हुई थी और बैरे कमरे की झाड़-पोंछ कर चुके थे। और डाइनिंग हॉल में दरीचे के नीचे सफेद बुर्राक (उजले) मेज पर छुरी-काँटे जगमगा रहे थे। नौवारिद (नवागंतुक) खातून दरमियानी बेडरूम में से गुजरकर पिछले कमरे में चली गई और अपना सामान रखने के बाद फिर बाहर आकर झील को देखने लगीं। चाय के बाद वह खाली सिटिंग-रूम में जा बैठीं और रात हुई तो जाकर अपने कमरे में सो गईं। गलियारे में कुछ परछाइयों ने अंदर झाँका तो वह उठकर दरीचे में गईं, जहाँ मजदूर दिन-भर काम करने के बाद सीढ़ी दीवार से लगी छोड़ गए थे। गलियारा भी सुनसान पड़ा था। वह फिर पलंग पर आकर लेटी तो चंद मिनट बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। उन्होंने दरवाजा खोला, बाहर कोई न था। सिटिंग-रूम भाँय-भाँय कर रहा था, वह फिर आकर लेट रहीं। कमरा बहुत सर्द था।
सुबह को उठकर उन्होंने अपना सामान बाँधते हुए सिंगार-मेज की दराज खोली तो उसके अंदर बिछे पीले कागज के नीचे से एक लिफाफे का कोना नजर आया, जिस पर उनका नाम लिखा था। खातून ने जरा ताज्जुब से लिफाफा बाहर निकाला। एक काकरोच कागज की तह में से निकलकर खातून की उँगली पर आ गया। उन्होंने दहलकर उँगली झटकी और लिफाफे में से एक तस्वीर सरककर नीचे गिर गई, जिसमें एक नौजवान और एक लड़की अमर सुंदरी पार्वती के मुजस्समे के करीब खड़े मुस्करा रहे थे। तस्वीर का कागज पीला पड़ चुका था। खातून चंद लम्हों तक गुमसुम उस तस्वीर को देखती रहीं, फिर उसे अपने बैग में रख लिया।
बैरे ने बाहर से आवाज दी कि एयरपोर्ट जाने वाली कोच तैयार है। खातून नीचे गईं। फोटोग्राफर नए मुसाफिरों की ताक में बाग की सड़क पर टहल रहा था। उसके करीब जाकर खातून ने बेतकल्लुफी से कहा-
“कमाल है, पंद्रह बरस में कितनी बार सिंगार-मेज की सफाई की गई होगी मगर यह तस्वीर कागज के नीचे इसी तरह पड़ी रही।” फिर उनकी आवाज में झल्लाहट आ गई, “और यहाँ का इंतजाम कितना खराब हो गया है। कमरे में कॉकरोच ही कॉकरोच!”
फोटोग्राफर ने चौंककर उनको देखा और पहचानने की कोशिश की, फिर खातून के झुर्रियोंवाले चेहरे पर नजर डालकर अलम (दुख) से दूसरी तरफ देखने लगा, खातून कहती रहीं। उनकी आवाज भी बदल चुकी थी। चेहरे पर दुरुश्ती (कठोरता) और सख्ती थी और अंदाज में चिड़चिड़ापन और बेजारी (दयनीयता) और वह सपाट आवाज में कहे जा रही थीं-
“मैं स्टेज से रिटायर हो चुकी हूँ। अब मेरी तस्वीरें कौन खींचेगा भला, मैं अपने वतन वापस जाते हुए रात-की-रात यहाँ ठहर गई थी। नई हवाई सर्विस शुरू हो गई है। यह जगह रास्ते में पड़ती है।”
“और..और..आपके साथी?” फोटोग्राफर ने आहिस्ता से पूछा।
कोच ने हॉर्न बजाया।
“आपने कहा था ना कि कारजारे-हयात में घमासान का रन पड़ा है। इसी घमासान में कहीं खो गए।”
कोच ने दोबारा हॉर्न बजाया।
“और उनको खोए हुए भी मुद्दत गुजर गई… अच्छा खुदा हाफिज।”
खातून ने बात खत्म की और तेज-तेज कदम रखती कोच की तरफ चली गई।
वालरस की ऐसी मूंछोंवाला फोटोग्राफर फाटक के नजदीक जाकर अपनी टीन की कुर्सी पर बैठ गया।
जिंदगी इनसानों को खा गई। सिर्फ कॉकरोच बाकी रह गए।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
