Hindi Story: चंद दिन पहले हमारे पड़ोसी मिश्रा जी के घर इलाके के एक बहुत बड़े नेता आ पहुंचे। मिश्रा जी का सारा परिवार उनकी सेवा में जुट गया। मेहमाननवाजी की रस्म निभाते हुए मिश्रा जी ने अपने नौकर से झटपट चाय-नाश्ता तैयार करने को कहा। नेता जी ने कहा कि आजकल कुछ दिनों से चाय मुझे माफिक नहीं आती, आप चाय तो रहने ही दो। मिश्रा जी के नौकर ने भी कहा कि आप बिल्कुल ठीक कह रहे हो। चाय पीना भी क्या पीना है जी? न कोई इसकी शक्ल, न कोई सीरत और सूरत, देखने में बिल्कुल काली कलवटी। एक बार आदमी चाय पी ले, सारी रात नींद ही नहीं आती। सबसे खराब बात तो यह है कि जिस किसी कपड़े पर चाय का थोड़ा-सा भी दाग लग जाये वो सारी उम्र नहीं उतरता।
इससे पहले की नेता जी कुछ और कहते, उनका नौकर बोला कि मैं आपके लिए बहुत ही शानदार और बढ़िया मीठी लस्सी बना कर लाता हूं। लस्सी जैसी कोई दूसरी चीज तो इस दुनिया में हो ही नहीं सकती। भगवान ने लस्सी को क्या बढ़िया रंग-रूप दिया है। जब दूध-दही से लस्सी तैयार होती है तो सारे घर में नाच-गाने जैसा माहौल बन जाता है। लस्सी पीते ही जहां मन को शांति मिलती है, वही इससे सेहत भी ठीक बनी रहती है।नौकर की बात को बीच में काटते हुए नेता जी ने कहा- ‘नहीं भाई, लस्सी तो तुम रहने ही दो, क्योंकि इसे पीते ही सुस्ती और नींद आने लगती है।’ नौकर ने झट से पलटी मारते हुए कहा कि जनाब यह तो आप ने लाख टके की बात कह दी। वैसे भी जिस बर्तन में लस्सी बनायी जाये, कई दिन तो उसकी चिकनाहट खत्म नहीं होती और न ही उसमें से बदबू जाती है। आप चाय और लस्सी का चक्कर छोड़िये, मैं आपके लिये खाना तैयार करता हूं।’
नौकर की चापलूसी को भांपते हुए उन्होंने कहा कि खाने में क्या खास खिलाओगे? नौकर ने कहा- ‘जी मेरी क्या औकात है कि मैं आपको कुछ बता सकूं? आप जो भी हुक्म करो मैं तैयार कर देता हूं।’ मिश्रा जी ने कहा-‘बहुत दिन से भिंडी नहीं खाई। आज यदि कड़क तन्दूरी रोटी के साथ मसालेदार भिंडी बन जाये तो मजा ही आ जाये।’ नौकर ने मिश्रा जी की हां में हां मिलाते हुए कहा कि आपने तो आज मेरे मुंह की बात छीन ली। मेरा भी बहुत दिनों से भिंडी पकाने का मन कर रहा था। कोमल-कोमल भिंडियों के स्वाद का तो कोई मुकाबला ही नहीं। पास बैठे नेता जी ने कह दिया- ‘भिंडी बनती तो जरूर अच्छी है, लेकिन यह थोड़ी लेसदार होती है।’ नौकर ने नेता जी को खुश करने के इरादे से कहना शुरू किया कि आप बिल्कुल ठीक फरमा रहे हो, वैसे भी मंडी में सब्जियों की कोई कमी थोड़े ही है। भिंडियों से तो अच्छा है कि आदमी सफेदी में मिलाने वाली गोंद खा ले।
मिश्रा जी ने नेता जी से कहा- ‘यदि आप हुक्म करे तो करेले की सब्जी तैयार करवा दूं।’ इससे पहले नेता जी अपनी इच्छा जाहिर करते नौकर ने अपनी बकबक जारी रखते हुए कहा कि करेलों से बढ़ कर तो कोई दूसरी सब्जी हो ही नहीं सकती। भुने हुए प्याज और बढ़िया मसाले डाल कर करेले बने हो तो उसके सामने चिकन भी फीका लगने लगता है। अब नेता जी ने नौकर को टोकते हुए कहा कि यह सब कुछ तो ठीक है, लेकिन करेले थोड़े कड़वे होते हैं। मिश्रा जी के नौकर ने बिना एक पल सोचे-समझे कहा कि यह तो आप बिल्कुल सच कह रहे हो। मुझे तो खुद यह नीम का बड़ा भाई लगता है। एक बार करेले की सब्जी खा लो, सारा दिन प्यास ही नहीं बुझती। करेले की सब्जी खाने से तो अच्छा है कि आदमी कुनैन की गोलियां खा ले।
कुछ लोग जीवन में अपनी मंजिल पाने के लिये मेहनत को छोड़ सिर्फ झूठी तारीफ और चापलूसी का सहारा लेते हैं। चमचागिरी और चापलूसी के यह किस्से मिश्रा जी के नौकर या आम आदमी तक ही सीमित नहीं होते। चंद दिनों पहले जब महाराष्ट्र के एक मंत्री ने राहुल गांधी के जूते उठाये तो किसी को अचंभा नहीं हुआ क्योंकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। बरसों पहले ज्ञानी जैल सिंह ने मैडम इंदिरा गांधी के सैंडिल उठाए थे। लोग उस हंगामे को आज भी याद करते हैं जब तरक्की पाने के लिए एक बार एन.डी. तिवारी ने संजय गांधी की चप्पलें उठाई थी। एक जरूरतमंद को तो अपनी मजबूरी के चलते भगवान को छोड़ बाहुबलियों की चापलूसी करनी पड़ती है, परन्तु आज दुनिया में शहंशाह की हस्ती रखने वाले अभिताभ बच्चन भी अपना मतलब निकालने के लिए कभी नेहरू-गांधी की कांग्रेस के आंगन में, कभी भैया अमर सिंह के गले में बांहें डाल कर झूमते नजर आते हैं। आजकल तो खबर गर्म है कि अरबों रुपयों के मालिक अमिताभ बच्चन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लुभा रहे हैं। फिल्मों में एक्टिंग के माहिर असल जीवन में भी इतने बढ़िया एक्टर है कि मौके की नजाकत को देखते ही आसानी से परिस्थितियों के मुताबिक रंग बदल लेते हैं। ऐसे लोगों का शायद यही मानना है कि जो काम चापलूसी से आसानी से हो जाता है, उसे तो शायद भगवान भी न कर पायें।
हम सभी जानते हैं कि किस्मत किसी के हाथ में नहीं होती, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि मेहनत तो हमारे हाथ में है और मेहनत से हर कोई अपनी किस्मत बदल सकता है। इसलिए हमें अपनी किस्मत पर नहीं, सदा अपनी मेहनत पर विश्वास रखना चाहिये। इस सच्चाई को कैसे झुठलाया जा सकता है कि योग्यता, ईमानदारी और धैर्यशीलता के समक्ष हर कोई घुटने टेकने पर मजबूर हो जाता है। जो व्यक्ति परिश्रम से डरता है वह जीवन में कभी भी सफलता नहीं पा सकता। जौली अंकल दुनिया के सभी रंगों को देखने-परखने के बाद इतना ही जान पाये हैं कि चापलूसी करने वाले चाहे इसकी महिमा का कितना ही गुणगान क्यूं न कर ले, लेकिन हमें सदा झूठी तारीफ और प्रशंसा से बचना चाहिये क्योंकि ये दोनों ही इंसान के सबसे बड़े दुश्मन हैं। समय अच्छा हो या बुरा कुछ देर में गुजर ही जाता है।
ये कहानी ‘कहानियां जो राह दिखाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–
