बेटियों की मां-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Betiyon ki Maa

Hindi Stories: नंदनी और मीरा को उनकी भाभी दिल में भरी नफरत से इतना स्वागत कर रही थी के दोनों को उसकी बातें सुनकर आँसू बहाने के अलावा और कोई रास्ता नही था.. 

“दीदी आप लोग यहाँ अपनी मां से मिलने आई है न, तो उनसे मिलिए और फिर अपने काम से काम रखिए। बिना मतलब मेरे काम में पड़ने की जरूरत नहीं है। आखिर बर्दाश्त की भी हद होती है। मैं भी आप लोगों की ही उम्र की हूं। मुझ में भी आपके जितनी समझ है। मुझे मेरे काम में दखलअंदाजी पसंद नहीं है”

नंदनी और मीरा की भाभी  ने मुंह तोड़कर जवाब दिया।

अपने  ही भाभी की बात सुनकर नंदनी और मीरा चुप रह गई। आखिर बोलती भी क्या? भाभी तो सीधे मुंह बात भी नहीं करती थी। दोनों बहनों ने भाई अनुज की तरफ देखा इस उम्मीद के साथ कि भाई तो कुछ बोलेगा भाभी को। ,लेकिन वो तो नजरे झुकाए चुपचाप बैठ हुआ था।

दोनों बहने बेइज्जती का घूट पीकर रह गई। आखिर जानती थी कि अगर वो कुछ बोलेगी तो बाद में भाभी माँ का जीना हराम कर देगी।

आज साल भर  बाद दोनो बहने अपने मायके आई थी। पर मायके में इतना कुछ बदल चुका है ये उनकी सोच से भी बाहर था। जिस घर में कभी माँ पापा की चलती थी, आज वहाँ बहू का सिक्का बोल रहा था। आखिर भाई इतना चुप कैसे हो गया। वो तो माँ के खिलाफ कुछ भी नही सुन नहीं सकता था। मायके में बेटियों का ऐसे स्वागत होगा इसका अंदाजा उनको बिल्कुल नहीं था। 

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ये तो तय है कि किसी इंसान के जाने के बाद बदलाव होता है।पर पिता जी के जाने के बाद ऐसा क्या हुआ जो घर का माहौल इतना ज्यादा बदल गया। पिता जी के सामने तो भाभी कुछ कह नहीं पाती थी। पर अब इतनी हिम्मत कहाँ से आ गई भाभी में, अभी और भाई की शादी पिछले साल ही हुई थी। छोटे भाई की शादी में ही दोनो बहने मायके आयी थी। तब घर में सब कुछ ठीक ही था। जब भी नंदनी और मीरा ससुराल से आती थी तो उनका स्वागत बड़े अच्छे से होता था। माँ और भाभी उनकी मनपसंद चीजे बनाकर रखती थी। पिता जी शाम को बाजार से आते समय कुछ न कुछ जरूर लेकर आते थे। जानते थे कि  बेटियों को बाजार की चीजें बहुत पसंद है। और सिर्फ ऐसा नहीं कि सिर्फ बेटी के लिए लेकर आए हो। साथ में बहू के लिए भी उसकी पसंद की चीज जरूर लेकर आते थे।

लेकिन पिछले साल पिता की अचानक मौत हो गई। उसके बाद बेटियां सिर्फ एक बार मायके आई थी। उसके बाद अब आई है। बच्चों की पढ़ाई घर की जिम्मेदारी के चलते आना नही हो पाया था, अब जब यहाँ आयी तो यहाँ का तो माहौल पूरा ही बदल चुका था।

कल से देख रहीं थी। कि माँ चुप हो चुकी थी। अब ज्यादा कुछ बोलती नहीं थी। साड़ियां भी कितनी घिस चुकी थी। उन्हीं को पहने जा रही थी। माँ कभी भी बिना प्रेस की साड़ियां नहीं पहनती थी। उनकी साड़ियां इतनी घिसी हुई भी कभी नहीं होती थी। पर आज उन्हें इस तरह की साड़ी में देखकर बेटियों को बहुत दुःख हुआ, 

नंदनी और मीरा से रहा नहीं गया तो जबरदस्ती माँ के लिए साड़ी निकालने के लिए उनका बक्सा खोला तो देख कर दंग रह गई। जो बक्सा  साड़ियों से भरा होता था, उस बक्से में बस कुछ घिसी पिटी साड़ियां रखी हुई थी। ये देखकर नंदनी ने माँ से पूछ ही लिया,

” माँ आपकी सारी साड़ियां कहाँ गई?” नये कपड़े क्यों नही पहनती आप,,, 

”  बेटा तेरे पिता जी के जाने के बाद मन नहीं करता। वो साड़ियां मैं पहनती नहीं, इसलिए मैंने वो सारी साड़ियां लेनदेन में निकाल दी थी”

” पर उसमें तो कई सारी पहनी हुई साड़ियां थी”

” हाँ, मैंने फिर भी निकाल कर दे दी”

उसके आगे दोनों बेटियां कुछ कह नहीं पाई। 

जैसे- तैसे शाम हुई। सबको खाना दिया गया लेकिन माँ सबके साथ नही बैठी बल्कि कमरे में अकेले खाना खा रही थी मीरा से नही रहा गया कमरे में गई और माँ की थाली में सुबह का बचा हुआ खाना देखकर वो हैरान रह गई।

आज तो भाभी ने गोभी की सब्जी बनाई है। फिर माँ को सुबह का बचा खाना क्यों। उसने माँ से पूछा,

” माँ आप सुबह का खाना क्यों खा रही हो। गोभी क्यों नहीं लिया। आपको तो बहुत पसंद था ना”

” आजकल ये सब खाने का मेरा मन नहीं करता। सादा खाना खाने से सादे विचार रहते हैं” माँ ने बोला.. 

पर अब तो ये बातें मीरा को बर्दास्त नहीं हुई। जाकर नंदनी से सब कुछ बता दिया, दीदी माँ को खाना तक नही मिलता यहाँ ठीक से। जो माँ हमें बताना नहीं चाह रही है। पर घर का माहौल जिस तरह से बदला था उसके बारे में कभी सोचा ही नही था। लेकिन ये बात दोनो बहनों को जल्दी ही समझ में आ गई। जब रात को भाभी अपने मायके बात कर रही थी। और वो बातें नंदनी और मीरा ने सुन ली।

“अरे क्या बताऊं मम्मी। जब से ये ननदें घर आई हुई है। दिमाग खराब है ये लोग जल्दी से जाए तो मैं सुकूँ से रहूँ। आज अपनी माँ से पूछ रही थी सुबह का खाना क्यों खा रही हो ? अरे मैं दूंगी तो लेगी ना। अरे अब कौन इतनी महंगाई में बुढ़िया का बोझ उठाये नये पकवान मैं अपने बच्चों को खिलाऊँ या इस बुढ़िया को, 

सुनकर नंदनी मीरा का दिमाग घूम गया। मतलब पिता जी के जाते ही माँ बोझ गई। जरूर साड़ियों के लिए भी भाभी ने कुछ ना कुछ सुनाया होगा। तभी नई साड़ियां नही खरीदती है। 

  भाभी अपनी मनमानी करती है पर भाई कुछ क्यों बोलता नहीं। ये। दोनों बेटियां ने आज माँ से बात भी की,

” माँ आप कुछ बोलती क्यों नहीं हो? दादी भी तो विधवा थी तुम्हारे साथ रहती थी। लेकिन आपने तो कभी उनके साथ ऐसा नहीं किया। अगर कोई कहता तो आप उससे लड़ जाती थी। पर आज आपको क्या हो गया। उल्टा आप गलत को बर्दाश्त कर रही हो। सब कुछ तो आपका है ये घर भी” 

” बेटा रहना तो मुझे अपने बेटे बहू के साथ ही है ना। अब बेवजह की झगड़ा मोल लूंगी तो वो लोग मुझे छोड़कर चले जाएंगे। फिर भला मैं अकेली कैसे रहूंगी”

माँ रोने लगी।

” पर माँ भाभी इतनी मनमानी कर रही है। भाई चुपचाप क्यों सह रहा है। भाई उनको जवाब क्यों नहीं देता है”

” पहले शुरू – शुरू सचिन जवाब देता था। पर वो हर रोज बहू लड़ जाती थी। बच्चों को बहुत मारती थी,तो मैंने ही सचिन को मना कर दिया। कम से कम सचिन तो सुकून से रहेगा। मेरी तो उम्र कट गई । बाकी के दिनबचे हुए दिन जैसे तैसे निकल जाएंगे “

” एक मिनट माँ। आपकी उम्र अभी सिर्फ पचास साल ही है।  कम से कम स्वाभिमान के साथ तो जियो। आप कब तक ये सब बर्दाश्त करोगी। घर आपका, स्वाभिमान आपका, हम बच्चे भी आपके, लेकिन हुकुम भाभी का चल रहा है। ये तो गलत है”

” तू छोड़ ये सब बातें। सो जा, अच्छा देर हो गई.. 

कहकर माँ ने बात पलट दी और दूसरी तरफ मुह करके सो गई। 

लेकिन दूसरे दिन सुबह नाश्ते के लिए भाभी ने बाजार से छोला चावल मंगा लिया।  अपने बच्चे को खाने को दिया खुद खा लिया.. 

मीरा ने बोला भाभी भूख लगी है कुछ खाना बना लूँ.. 

भाभी हाँथ पटकते हुए चिल्लाई इतना पैसा नही है मेरे पास सबको चार दिन तक खिलाते रहूँ.. 

” दीदी आप लोगों को आना है इस घर में तो शांतिपूर्वक आईए। बेवजह मेरे खर्च न बढ़ाया करिये एक दिन तक तो मैं रख पाऊँगी इससे ज्यादा नही आपकी माँ का बोझ उठा रही हूँ यही क्या कम है, अगर आपको ज्यादा माँ की चिंता है अपनी माँ को खिलाने, पिलाने, ओढ़ाने पहनाने का, तो अपने साथ ही ले जाइए। पर मुझे माफ़ करिये। ऐसे ही करना है तो इस घर में आने की जरूरत नहीं है। और ना ही मुझे सिखाने की जरूरत है कि मुझे को कैसे रहना है “

भाभी की बात सुनकर दोनों नन्दों को गुस्सा आ गया। 

” ठीक है भाभी,हम रहे है।‌ पापा के साथ-साथ इस घर के लोगों का स्वाभिमान भी खत्म हो चुका है। मुझे नहीं पता था कि पापा के हमारा मायका भी खत्म हो गया”

” नंदनी मीरा कहाँ जा रही हो?”

अचानक से सचिन की माँ बोल पड़ी। ये सुनकर सचिन की पत्नी बोली,

” जातीं हैं तो जाने दीजिए। मायके आकर कोई एहसान नहीं करती है ये दोनों।‌ और आपको इसे रोकने की कोई जरूरत नहीं है। आप भी जाइए इनके साथ जाना है तो, 

” चुप कर बहू। बहुत ज्यादा बोल रही हो तुम। तू कौन है मुझ पर हुकुम में चलाने वाली। मैं चुपचाप बर्दाश्त करती हूं तो इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे बोलना नहीं आता है। मैं अपने घर में शांति रखने के लिए चुप रहती हूँ। खबरदार जो मेरी बेटियों को कुछ भी कहा तो”

“अच्छा! आज तो बेटियों को देखकर जबान खुल गई बुढ़िया की। सारी जिम्मेदारी हम निभाए और यहाँ बेटी के लिए जबान खुल रही है। भूलो मत, आप हमारे साथ रहती हो”

बहू ने बेशर्मी से कहा।

भूल गई हो क्या.. बहू बोली,, 

” नहीं भूली हूं मैं, कुछ भी नहीं भूली हूं। पर बहु तू भूल गई है। ये घर मेरा है। और मैं तुम्हारे साथ नहीं, तुम मेरे साथ रहती हो। चाहे तो आज तुम्हें घर से निकाल सकती हूं”

“अच्छा! तो फिर रहेंगी किसके साथ? बताओ मुझे। कौन उठायेगा आपकी जिम्मेदारी “

” मेरी जिम्मेदारी मैं खुद उठा सकती हूं। मुझे तेरी जरूरत नहीं है। अपने स्वाभिमान को मार कर मैंने बहुत जी लिया। तुझे जाना है तो तू शौक से जा सकती है”

आज सास की बात सुनकर सचिन की पत्नी के होश उड़ गए, 

” आप खड़े-खड़े क्या सुन रहे हो? अपनी माँ को समझाते क्यों नहीं कि अपनी बहू से झगड़ा करना उन्हें भारी पड़ सकता है”

” मैं क्या समझाऊं? जब मैं तुम्हें नहीं समझा पाया तो अपनी माँ को क्यों समझाऊं। वैसे माँ सही कह रही है। वो आज हमें इस घर से निकाल सकती है। उनके पास इसका पूरा हक है। कानूनी रूप से घर उनके नाम है हमें अपने घर से निकाल सकती है। और कल को प्रॉपर्टी अपनी बेटी के नाम भी कर सकती है। अब ये तुम पर निर्भर करता है कि तुम्हें किराए के घर में रहना है या नहीं। मैंने तुम्हें बता दिया है। अब तुम देख लो कि झगड़ा करना किसको भारी पड़ेगा “

कहते हुए सचिन ने भी हाथ खड़े कर दिए। इसके आगे बहू कुछ कह नहीं पाई और सभी से माफ़ी माँगने लगी क्योकिं यहाँ से जाने के बाद किराये के घर पर वो रहना नही चाहती थी