Spiritual Thoughts: जब किसी व्यक्ति को उदासी और खेद में घिरा पाओ तो समझना कि उसका रजस बढ़ गया है। जब तुम कुछ इन तीनों गुणों का खेल समझ कर देखोगे, तब तुममें व्यक्तियों के प्रति करुणा जागृत होगी, क्रोध या आवेग नहीं हम सबके जीवन में इन तीन गुणों का उतार-चढ़ाव होता रहता है।
जीवन में साधना से बुद्धि में सात्विक गुण बढ़ता है और सात्विक बुद्धि से ज्ञान, सजगता और प्रफुल्लता का उदय होता है। यह सब सत्व के साथ ही आता है। हमारे व्यक्तित्व में, जीवन में जो उन्नति होती है, वह सत्व गुण बढ़ने पर ही आती है। रजस के साथ जीवन में दुख व उदासी और तमस के साथ भ्रांति और आलस्य बढ़ता है।
Also read: तुम्हारा सुन्दर भविष्य तुम्हारे हाथों में है: Spiritual Thoughts
जब किसी व्यक्ति को उदासी और खेद में घिरा पाओ तो समझना कि उसका रजस बढ़ गया है। जब तुम कुछ इन तीनों गुणों का खेल समझ कर देखोगे, तब तुममें व्यक्तियों के प्रति करुणा जागृत होगी, क्रोध या आवेग नहीं और तुम उनमें दोष देखना बंद कर दोगे, क्योंकि तमोगुणी व्यक्ति संदेह, भ्रम और नासमझी करेगा ही। रजोगुणी व्यक्ति इच्छाओं से घिरा, बहुत सारे काम करने की दुविधा में फंसा रहेगा। सात्विक प्रवृत्ति में व्यक्ति में प्रेम, सेवा और करुणा के फूल खिलते जाएंगे। इस तरह इन तीन प्राकृतिक गुणों के आधार पर यदि किसी को देखते हैं तो हम उसके प्रति कोई निर्णय न लेकर उसे भली-भांति समझ पाते हैं। हम सबके जीवन में इन तीन गुणों का उतार-चढ़ाव होता रहता है।
इसलिए हर व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि वह वर्ष में एक या दो सप्ताह साधना के लिए निकालें और दिव्य ज्ञान को जीवन में उतारें। आपमें से कुछ ने यह महसूस किया होगा कि जब कभी भी आप इस तरह के किसी मौन शिविर या साधना शिविर में जाने के लिए तैयारी करते हैं तो आपके भीतर कुछ न कुछ बदलाव आना शुरू हो जाता है। मन अधिक प्रसन्न और लयबद्ध रहता है। हमारे ऋषियों ने मनुष्य के व्यवहार और प्रकृति को समझने के लिए ज्योतिष विदया से भी संबंध जोड़ा है। और कहा कि नक्षत्रों, ग्रहों आदि का हमारे व्यवहार पर असर पड़ता है, ताकि हम यह समझ पाएं कि व्यक्ति विश्वक किरणों से भी कुछ प्रभावित होता है। इसको गहराई से समझने के लिए उन्होंने नक्षत्रों के विज्ञान की खोज की। इसलिए हम किसी व्यक्ति या उसके व्यवहार पर क्रोध आदि न करें, क्योंकि नक्षत्र-ग्रहों की शक्तियां भी हमारे व्यवहार को प्रभावित करते हैं और ग्रहों की, उन किरणों के बुरे, असुखद प्रभाव को कम करने के लिए कुछ ‘उपाय भी बताए गए हैं।
उन्होंने भजन-कीर्तन और ध्यान की विधियां बताईं। क्योंकि इन सबके पीछे जो शिव तत्त्व या सर्वोत्कृष्ट नियम जो हमारी चेतना की तुरिया अवस्था(चौथी अवस्था) है, वह इन सारे ग्रहों की विश्वक किरणों पर नियंत्रण करता है। इसलिए ध्यान, भजन, कीर्तन आदि से उन ग्रहों के अनचाहे या बुरे प्रभाव समाप्त हो जाते हैं। हालांकि सब प्राणी संचालन करते प्रतीत होते हैं, किन्तु सबमें वही एक बृहत् चेतना विद्यमान है। ऐसा ज्ञान केवल मानसिक तल पर नहीं, सचमुच अस्तित्वगत रूप से जब उत्पन्न होता है तो उसे दिव्य ज्ञान कहते हैं। यह भी तीन प्रकार का है।
पहला, जब हम जानते हैं कि सब प्राणियों में एक ही चेतना कार्य कर रही है तो यह सात्विक ज्ञान है। राजसिक ज्ञान में हम व्यक्तियों को भेदभाव की दृष्टि से देखते हैं कि ‘यह व्यक्ति तो अच्छा है और यह बुरा है इत्यादि। तामसिक ज्ञान में तो दूसरों को केवल गलत ही नहीं समझा जाता बल्कि उनमें चैतन्य के भी दर्शन नहीं होते। जो दूसरों को जड़ वस्तु की तरह ही देखते हैं। वे ही जीवन में हिंसक हो जाते हंै। वरना वह किसी को मार नहीं सकते, किसी की भी हिंसा नहीं कर सकते। तामसिक ज्ञान में वस्तुएं या लोग जैसे हंै, वैसे दिखाई नहीं देते। यह भ्रामक ज्ञान या गलत बोध के कारण होता है। रजोगुण और तमोगुण की प्रधानता से हमारे भीतर असंतुलन उत्पन्न होता है। इस स्थिति से उबरने के लिए जीवन में अधिक सत्व को उत्पन्न करना होगा, जिससे जीवन में समता और लयबद्धता का जन्म हो और साधना से यह परिवर्तन लाया जा सकता है।
