…………….‘रुक्मिणी बेटी…!’ सुराही होंठ से अलग करके वह हांफते से बोले, ‘कमबख्त पंडित ने जाने क्यों जाते समय हमें विश्वास दिलाया था कि हमारी यात्रा बहुत शुभ घड़ी में आरंभ हो रही है। वहां भी लेने-के-देने पड़ गए और अब लौटते समय यहां भी।’

 ‘वहां…’ राधा ने फिर सोचा। जहां वह लोग गए थे, वहां भी अवश्य कोई दुर्घटना घटी है, परंतु उसने इसे जानने का प्रयत्न नहीं किया।

 कोलाहल अब भी मचा हुआ था। लोगों ने काफी हद तक अपने संबंधियों को पा लिया। मृत्यु कम हुई थी‒घायल व्यक्ति अधिक थे। यात्रा में साथ चलती पुलिस ने जलते हुए कम्पार्टमेंट को बुझा दिया था, परंतु धुआं अब भी था। अंग्रेज़ी सत्ता के अफ़सरों की लाशें एक किनारे सजा दी गई थीं। पुलिस का पहरा था, सरकारी सहायता की सभी यात्रियों को बहुत बेचैनी से प्रतीक्षा थी। रेल की इस दुर्घटना ने छोटे-बड़े सबको एक कर दिया था। मुसीबत क्या रंग नहीं लाती।

 ‘कहां जा रहे हो बाबा तुम?’ समीप ही एक पेड़ की जड़ का सहारा लेकर घायल व्यक्ति‒ चौधरी कृपाल सिंह ने पूछा‒अपने सिर पर हाथ फेरते हुए। शायद डाकुओं ने यहीं वार किया था। अपनी बात द्वारा मानो वह एक छोटे आदमी का अहसान उतार रहे थे।

 ‘अभी तक तो कोई मंजिल नहीं बनाई सरकार।’ बाबा ने चौधरी कृपाल सिंह के व्यक्तित्व का अनुमान लगाकर उत्तर दिया।

 चौधरी कृपाल सिंह ने उसे गौर से देखा‒ गरीब दुखिया। उसने लड़की पर दृष्टि की‒ गुदड़ी में मानो लाल छुपा हुआ था, बड़ी-बड़ी काली पलकों के नीचे आंखों के अंदर एक असाधारण-सी चमक थी‒ ऐसी चमक जो उन्होंने आज तक नहीं देखी थी। गोरे मुखड़े पर यदि कनपटी के समीप ग्रहण नहीं होता तो क्षितिज पर मुस्कराता चंद्रमा भी मुंह छिपा लेता।

राधा ने कृपाल सिंह की दृष्टि की गंदी चुभन अपने शरीर पर महसूस की तो उसका दिल कांप उठा। यह बड़े जागीरदार जानें क्यों हरदम सुंदरता के भूखे होते हैं। गरीब को अपनी इज्जत तक संभालना कठिन है, घबराई हिरणी के समान वह वहां से उठ जाने का प्रयत्न करने लगी।

‘यह मेरी लड़की है…मेरी पोती…।’ बूढ़े बाबा ने बीच में कहा।

‘हूं? ओह…।’ कृपाल सिंह ने अपनी लड़की की उपस्थिति का एकदम से ज्ञान किया तो लज्जित होकर नज़रों का भाव बदल दिया, उन्होंने पूछा‒ ‘कहां के रहने वाले हो?’

‘रहने वाला तो रामगढ़ का हूं, परंतु आ कृष्णानगर से रहा हूं।’ बाबा ने उत्तर दिया।

‘रामगढ़!’ चौधरी कृपाल सिंह ने उसे आश्चर्य से देखा। रामगढ़ नाम से भी उन्हें घृणा हो गई थी।

रुक्मिणी ने भी उसे देखा…फिर राधा को भी।

‘रामगढ़ क्यों छोड़ दिया?’

‘वहां के जालिम राजा से तंग आकर।’ बूढ़ा बाबा बोला‒ ‘मेरी बेटी को मंडप से उठा ले गया और फिर इसे कहीं का नहीं रखा।…………..

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रुक्मिणी ने राधा को बहुत गौर से देखा। स्वयं इतनी सुंदर होने के पश्चात् भी वह राधा के अंदर असाधारण खिंचाव देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी। उसके भाइयों ने भी राधा को बहुत ध्यान से देखा।

 राधा ने शर्म से अपनी गर्दन झुका ली।

 ‘और फिर…।’ बाबा ने स्वयं ही बात जारी की, ‘हम उसकी नज़र से बचकर कृष्णानगर में जा छिपे, परंतु उस जालिम ने हमारा पीछा वहां भी नहीं छोड़ा। पिछली दुपहरिया वह राधा से स्वयं आकर मिला।’

‘राधा!’ रुक्मिणी के कान खड़े हो गए। चौधरी कृपाल सिंह उठकर ठीक से बैठ गए। ‘राधा ही तो उस लड़की का नाम है, जिसके कारण राजा विजयभान सिंह ने उनका अपमान किया था, जिसकी सुंदरता से प्रभावित होकर उसने रुक्मिणी को ठुकरा दिया… कहीं यही तो वह राधा नहीं?’

‘फिर क्या हुआ?’ बाप-बेटी दोनों ने उत्सुक होकर लगभग एक साथ पूछा।

‘इसे बहला-फुसलाकर वह अपने साथ ले जाना चाहता था।’ बाबा ने अपनी बात जारी रखी, ‘कहता था वह इससे प्रेम करता है, इससे विवाह करेगा। इसे अपनी महारानी बनाकर रखेगा। मेरी भोली-भाली लड़की वास्तव में उस धोखेबाज़ की बातों में आ जाती, परंतु जब इसने मुझे सारी बातें बतार्इं तो मैंने इसे समझाया कि राजा विजयभान सिंह आरंभ से ही आवारा है, जाने कितनी ही मासूम लड़कियों का ख़ून उसके सिर है, जिसमें मेरी अपनी पोती तथा बेटी भी सम्मिलित हैं।’

रुक्मिणी के साथ सभी ने उसे गौर से देखा।

‘हां।’ बाबा का गला भर्रा गया। उसने बात जारी रखी‒ ‘उसने मेरी छोटी पोती के साथ भी बलात्कार किया था और फिर जब उसके विरुद्ध उसके पिता ने आवाज़ उठाई तो उसका मुंह भी सदा के लिए बंद कर दिया गया।’

‘ओह!’ रुक्मिणी के मुंह से निकला।

परंतु चौधरी कृपाल सिंह किसी गहरी सोच में डूबे हुए थे। शायद किसी योजना को मन-ही-मन जन्म देकर रूप देने की चिंता कर रहे थे।

‘फिर मैं चुपचाप वहां से निकल भागा।’ बाबा ने फिर कहा‒‘यदि उसे पता चल गया होता तो वह मेरी बेटी का अपहरण करने के लिए कोई दूसरा रास्ता अपना लेता। कमबख्त… जब तक मरेगा नहीं, हज़ारों आत्माओं को शांति नहीं मिलेगी।’

‘तुम ठीक कहते हो बाबा…।’ कृपाल सिंह ने होंठों को भींचकर सख्ती से कहा। राजा विजयभान सिंह से अपने अपमान का बदला लेने के लिए वह अपनी योजना को रूप दे चुके थे, ‘और ऐसे आदमी की मौत भी बहुत भयानक होती है।’

‘राधा!’ सहसा रुक्मिणी बोली। उसके अंदर के सर्प ने भी चोट खाने के बाद करवट बदली। विजयभान सिंह से उसे भी तो बदला लेना था, ‘जब तुम्हारी कोई मंजिल नहीं है, रहने का कोई ठिकाना नहीं है, तो हमारे साथ ही चलो। हम, तुम दोनों को अपनी कोठी में छोटा-मोटा काम देंगे, तुम लोग वहां रह भी सकते हो। तुम्हारा गुज़ारा भी होता रहेगा।’

‘जी?’ राधा कुछ सकुचाई। उसके बाबा ने फिर भी इनकार करना चाहा। आरंभ में चौधरी कृपाल सिंह की दृष्टि उसे भी अच्छी नहीं लगी थी।

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