अंतिम संस्कार में तुमने एक मृत व्यक्ति को देखा? तुमने एक शव, एक मृत शरीर देखा। क्या तुमने एक मृत व्यक्ति को देखा? नहीं। तुमने एक मृत व्यक्ति को नहीं देखा। तुमने इसका अनुभव नहीं किया। या तुम किसी से मिले हो जो मर गया हो और उसने तुम्हें वापस आकर बताया हो कि मैं इस तरह से मरा था? नहीं, तुम मरे नहीं हो। तुमने मरे हुए व्यक्ति को भी नहीं देखा, न ही तुमसे कोई मृत व्यक्ति मिला है। तो बेकार का विचार कहां से तुम्हारे मन में आ गया कि तुम मरोगे? मृत्यु एक कल्पना है। कई लोगों ने इसके बारे में बातें कीं और तुम्हें विश्वास दिलाया। मृत्यु जैसी कोई चीज नहीं है। मात्र जीवन है, जीवन, सिर्फ जीवन। एक आयाम से दूसरे में, दूसरे से तीसरे आयाम में जाना।

जब भौतिक शरीर बहुत कमजोर हो जाता है, दुर्बल हो जाता है और किन्हीं कारणों से टूट जाता है- चाहे तुम्हारी कार कहीं टकरा जाए, या बहुत पीने से तुम्हारा लीवर खराब हो जाता है, या तुम किसी के प्रेम में पड़ते हो और तुम्हारा दिल टूट जाता है, या तुम्हारा शरीर बहुत बूढ़ा और दुर्बल हो जाता है- किसी भी कारण से जब शरीर जीवन को वहन करने योग्य नहीं रह जाता, तो जीवन को इसे छोड़कर आगे बढ़ना पड़ता है। इसलिए वह ऐसा करता है।

तो जब तुम कहते हो फलां व्यक्ति नहीं रहा, गुजर गया, तुम केवल यह कह रहे हो वे हमारे साथ नहीं रहे तुम यह नहीं कह रहे हो कि वे सचमुच नहीं रहे। वे केवल तुम्हारे साथ नहीं रहे, जिस तरह तुम उन्हें जानते थे। तो जब कोई शरीर त्यागता है, इसका मूल कारण यह होता है कि भौतिक शरीर जीवन को चलाने और उसका पोषण करने के लायक नहीं रह जाता। जब ऐसा होता है, तो उस प्राणी का क्या होगा? भौतिक शरीर और सचेत मन चला जाता है। विवेक-विचार करने वाला, विश्लेषण करने वाला मन चला गया, परंतु मन का मूल तत्त्व नहीं गया। क्या तुम समझ रहे हो मैं क्या कह रहा हूं? तो उसमें अब भी वे गुण हैं, परंतु उसमें कोई विवेक-विचार नहीं है।

तो एक चीज तुम्हें बहुत अच्छी तरह से समझ लेना होगा, जब कोई मरता है- यह मायने नहीं रखता कि वह तुम्हारे पिता थे, तुम्हारी मां थी, तुम्हारे पति थे, तुम्हारी पत्नी थी, बच्चा था या तुम्हारा बहुत प्यारा मित्र था- जिस क्षण वह शरीर छोड़ता है, उसका तुमसे कोई संबंध नहीं रह जाता क्योंकि जो भी वे तुम्हारे बारे में जानते थे, वह सब भौतिक था, है कि नहीं? जब मैं भौतिक कहता हूं, तो उसका अर्थ मात्र शरीर ही नहीं, बल्कि मन और भावनाएं भी हैं। तुम उस व्यक्ति के बारे में जो कुछ भी जानते हो और वह व्यक्ति तुम्हारे बारे में जो कुछ भी जानता है, वह या तो भौतिक शरीर के स्तर पर है, या मन या भावनाओं के स्तर पर है। ये सारी चीजें उसी भौतिक की सीमा में आती हैं। तो जब वह भौतिक को छोड़ देता है, ये सारी चीजें भी चली जाती हैं और फिर मैं या मेरे मृत पिता जैसी कोई चीज नहीं रह जाती। जैसे ही वे मरे कि अब वे तुम्हारे पिता नहीं रहे। वे जा चुके, अब खत्म हो गए।

तो जैसे ही यह विवेक विचार वाला मन चला जाता है, वह प्राणी अपनी प्रवृत्तियों के अनुसार आगे बढ़ेगा। यही कारण है कि भारत में व्यक्ति की मृत्यु जिस प्रकार होती है, उसे इतना अधिक महत्त्व दिया जाता है, ताकि वह जिन प्रवृत्तियों को लेकर आगे बढ़ता है, उन्हें हम एक खास तरह से स्थापित कर सके। यह मायने नहीं रखता कि उस व्यक्ति ने किस तरह का जीवन जिया है, किंतु जब अंतिम क्षण आता है, हम राम-राम या किसी अन्य पावन नाम का उच्चारण करते हैं। इसके पीछे मूल विचार यही है कि मरने वाले में थोड़ी जागरूकता पैदा की जाए, जिससे वह किसी भय या लालच के माहौल में प्राण-त्याग न करे क्योंकि एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रस्थान करने का वह अंतिम क्षण बहुत प्रबल रूप में उस व्यक्ति का गुण बन जाता है। उसके आगे की यात्रा के लिए यही उसकी प्रमुख प्रवृत्ति बन जाती है।

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