कुछ वर्षों पहले तक लोग केवल जरूरत का सामान खरीदने के लिए बाजार जाते थे लेकिन आजकल बाजार में घूम-घूमकर शॉपिंग करना एक थेरेपी व टाइम पास करने का तरीका बन गया है।

आज का आदमी अपनी खुशी के लिए बाजार का मोहताज होकर रह गया है।
शॉपिंग करना अवसादग्रस्त लोगों के लिए कुछ देर के लिए खुशी पा लेने की थेरेपी बन गई है। भारत में मध्यम वर्ग बड़ी तेजी से बढ़ा है। इस नव-धनाढ्य वर्ग के पास पैसा बड़ी तेजी से और अपने साथ नाना प्रकार की परेशानियां लेकर आया है। बाजार हजारों प्रकार की चीजों से अटे पड़े हैं।

उस दिन मेरी मत मारी गई थी। अच्छा-भला मैं अखबार के साथ चाय की चुस्कियां ले रहा था। बच्चों को स्कूल भेजकर श्रीमती भी अखबार से लोहा लेने लगी। वह अखबार को पिछले पन्ने से पढऩा शुरू करती है क्योंकि उन पन्नों पर सेल, डिस्काउंट, फ्री ऑफर आदि बहुत छपते हैं। श्रीमती घर के बीसियों काम बीच में छोड़कर सेल देखने के लिए तैयार होने लगीं। साथ में कह रही थीं, खरीदेंगे कुछ नहीं। आदमी को यह तो पता होना चाहिए कि लेटेस्ट फैशन क्या चल रहा है। बड़े से पांच सितारा होटल के उस शानदार हाल में हम पहुंचे जहां बैंगलोरी सिल्क साड़ी की मेगा सेल लगी थी।

सुबह के दस बजे थे। भीड़ इतना ज्यादा नहीं था। हर तरफ चुस्त, चुलबुली, शोख व हसीन सेल्स गर्ल अंग्रेजी में गिटपिट करती इठला रही थीं। सेल देखने आई लेडीज भी खूब भरी-पूरी, गुदाज और सुडौल काया वाली थीं। श्रीमती तो हजारों साडिय़ों के विशाल समुद्र में खो गई। हम कभी यहां खड़े होते तो कभी वहां। कोण बदल-बदलकर हमने उन हसीन तितलियों को जी भर कर निहारा जो अपने गुदाज जिस्म की सुध-बुध भुलाकर साडिय़ां देखने में मग्न थीं।

श्रीमती ने तीन-चार साड़िय़ां पसंद करके हमें थमा रखी थीं। यूं रंग-बिरंगी साड़़िय़ां अपनी बांहों में उठाकर पत्नी के पीछे-पीछे चलने वाले वफादार और आज्ञाकारी पति अकेले हम ही नहीं थे। पचास-साठ ऐसे खुशकिस्मत प्राणी और भी थे जो रोबोट की तरह अपनी पत्नी की हर इच्छा पूरी करने के लिए तत्पर खड़े थे।

फिर तो देखते-देखते आज्ञाकारी पतियों और खुशकिस्मत व सौभाग्यवती पत्नियों का एक जबरदस्त रेला सा आ गया। हर तरफ एक हड़कम्प सा मच गया। सेल्सगल्र्स की हरकत तेज हो गई। उनकी हालत ऐसी थी जैसी तूफान के वक्त मल्लाहों की होती है। हर कोई कुछ न कुछ मांग रहा था। उस हाल में सांस लेना तक दूभर हो गया था। खींचातानी होने लगी मानो संसद के निचले सदन का सत्र चल रहा हो। एक-एक साड़ी पर चार-चार हाथ लपक रहे थे। सेल की आंधी में श्रीमती ने वह सामान भी उठा लिया जो उसने पिछले पांच सालों में तो प्रयोग नहीं किया। पता नहीं जब करने लगेंगी तब तक नया फैशन ही आ जाएगा। 

वे दिन लद गए जब ग्राहकों को पटाने के लिए दुकानदार मुस्कुराते-मुस्कुराते लगभग दोहरा हो जाता था और सामान्य ग्राहक पहली तारीख का बहाना बनाकर दुकान से बाहर हो लेता था और बेचारा दुकानदार पूरा दिन बार-बार कपड़ों के थान लपेटता-लपेटता वीरगति को प्राप्त हो जाता था। अब दुकानदार अपने ब्रांड डिस्पले कर देता है और दुकान में इत्मीनान से बैठ कर अपने बड़े से टीवी पर मैच देखता है। उसे पता है उसने मेगा सेल लगा रखी है, लक्की कूपन की ढेरों स्कीमें हैं। मछली खुद ही जाल में फंसने के लिए आएगी।

एक पैनिक होता है कि कहीं बाजार खाली न हो जाए और फिर दूसरों को इतनी खरीददारी करते देख एक अजीब सी हीन भावना घर कर जाती है कि हमने व्यर्थ में ही जन्म लिया है। ऐसा सोचकर हर टॉम, डिक एंड हैरी सेल के अनंत महासागर में उतर जाता है। पैसे गांठ में हैं या नहीं, इसकी अब किसी को कोई चिंता नहीं। क्रेडिट-कार्ड जो है। बाद में देखा जाएगा।