इससे पहले मैंने मस्कुलर डिस्ट्रॉफी का नाम तक नहीं सुना था। आज भी अनेक लोग होंगे जो मस्कुलर डिस्ट्राफी को नहीं जानते होंगे, जिसमें मांसपेशियां धीरे धीरे पूरी तरह बेकार हो जाती हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हर साल पैदा होने वाले बच्चों में करीब 25 हजार बच्चे मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीडित होते हैं। मस्कुलर डिस्ट्रॉफी व्यक्ति के जीन के माध्यम से पीढियों तक पहुंचने वाली ऐसी बीमारी का समूह है जो व्यक्ति की किसी भी पीढ़ी में मांसपेशियों की विकृति के रूप में सामने आ सकता है। इस बीमारी में मरीज की मांसपेशियां बेकार हो जाती हैं जबकि उसका मस्तिष्क आम आदमी की तरह काम करता रहता है।

शुरूआत में बच्चे में इसके लक्षण पता नहीं लगते, लेकिन अगर कोई बच्चा समय से खड़ा नहीं हो पा रहा है और लगातार गिरता रहता है तो उसके खून का परीक्षण कराना चाहिए कि कहीं उसे यह बीमारी तो नहीं है। आमतौर पर मस्कुलर डिस्ट्राफी 12 प्रकार की होती है। इसके सबसे आम प्रकार हैं लिंब गर्डल मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जिसमें कंधों और पैरों के जोड़ों को हिलाना बहुत कठिन होता है। इसमें मरीज जब तक बैठा रहता है, तब तक वह ठीक-ठाक लगता है और यदि उसे सहारा देकर उठा दिया जाए तो वह कुछ देर तक खड़ा भी रह सकता है। दूसरी सबसे ज्यादा होने वाली डिशेन मस्कुलर डिस्ट्राफी के लक्षण बचपन में ही नजर आने लगते हैं। डिस्ट्राफी का यह प्रकार आमतौर पर पुरुषों में ही पाया जाता है और महिलाएं इसकी कैरियर होती हैं यानी महिला की पीढिय़ों में रोग के लक्षण पहुंच सकते हैं। अनेक जांचों के बाद इस रोग की पुष्टि होती है। आजकल तो गर्भ में ही इसकी जांच कर ली जाती है, गर्भ में ही पता लग जाता है कि भ्रूण को मस्कुलर डिस्ट्रॉफी तो नहीं है।

इंडियन एसोसिएशन ऑफ मस्कुलर डिस्ट्रॉफी की अध्यक्ष संजना गोयल कहती हैं, देश के हर नागरिक को खुलकर जीने और खुशियां बटोरने का अधिकार है तो फिर इस मर्ज से पीडित लोग ही अछूते क्यों रहें। इसी सोच के चलते इस रोग के मरीजों में खुशी, उत्साह और स्फूर्ति का संचार करने के लिए हर साल समर कैंप में मरीजों के लिए अनेक तरह के फन गेम्स और वाटर गेम्स आयोजित किए जाते हैं, ताकि मरीज एकत्रित होकर अपनी बीमारी को भूल कर मौज मस्ती कर सकें। एसोसिएशन के कैंपों में शामिल होने से सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि व्यक्ति अपने जैसे अनेक लोगों से मिल कर महसूस करता है कि वह अकेला नहीं है। कैंप में सब खुद को अधिक ऊर्जावान महसूस करते हैं और जीने की इच्छा को बल मिलता है। समर कैंप में मस्कुलर डिस्ट्राफी के विशेषज्ञ डॉक्टरों को बुलाया जाता है जो मरीजों के परिजनों को बीमारी के बारे में सही जानकारी और सलाह देते हैं। शिविर में आए नए मरीजों को संगठन से जोडा जाता है और उन्हें बीमारी से जूझने के लिए सलाह और सारी जानकारी, मनोरंजन के साधन, नई तकनीक की व्हीलचेयर और पढऩेलिखने या अपना काम करने के लिए आर्थिक समेत हर संभव मदद की जाती है। 

पहले लोगों को इस बारे में जानकारी नहीं थी। लोग अपने बच्चे के ठीक से चल न पाने को उसकी कमजोरी मान लेते थे और बिना इलाज के मरने के लिए छोड़ देते थे लेकिन अब कैंपों में मरीज और परिजनों को बीमारी की सारी जानकारी मिलती है और शंकाओं का निवारण हो जाता है। एसोसिएशन के विंग नाम के कार्यक्रम में मरीजों को पावर्ड व्हीलचेयर दी जाती है जो इस बीमारी के मरीजों के लिए बेहद जरूरी होती है। पावर्ड व्हीलचेयर मिलने के बाद मरीज की जिंदगी बदल जाती है। उसमें अपना काम खुद करने का विश्वास आता है। वह बाहर जाकर भी अपना काम खुद कर सकता है।

मरीजों के घर घर जाकर इस बीमारी से जूझने का एकमात्र उपाय विशेष प्रकार की फिजियोथेरेपी करवाई जाती है जिसे पुनरुत्थान कहते हैं। जो मरीज अपना काम खुद नहीं कर पाते वे अपने रिश्तेदारों के लिए बोझ समान हो जाते हैं। जगह-जगह ऐसे लोगों को जोड़ा जाता है जो मरीज की रोजमर्रा के काम में मदद कर सकें। दरकार है ऐसे लोगों की जो अतिरिक्त समय निकाल कर इससे जूझ रहे मरीजों को पढ़ाने, उन्हें लाने-ले जाने आदि के लिए मदद करें ताकि मरीजों के परिजनों को राहत मिले।