Hydrotherapy for Kids: श्रेया अपने डेढ साल के बेटे सौरव को लेकर काफी परेशान थी। उसके हाथ-पैरों में काफी अकड़न रहती थी। जिसकी वजह से उसने जन्म के 15 महीने के बाद खड़ा होना शुरू किया था। लेकिन अभी तक ठीक तरह चल नहीं पा रहा था। वो पूरा पैर जमीन पर टिकाकर चलने के बजाय पंजों के बल चलता था। पीडियाट्रिशियन ने सौरव को न्यूरोसर्जन को दिखाने के लिए कहा।
न्यूरोसर्जन ने पूरा चेकअप करके श्रेया को बताया कि सौरव पर सेरेब्रल पाल्से डिजीज का प्रभाव है। जिसमें बच्चा अपनी उम्र के लिहाज से विकास के नियत मानदंडों और मांसपेशियों में गतिशीलता के मानक मापदंड तक नहीं पहुंच पाता है। उपचार के लिए समुचित देखभाल, नियमित एक्सरसाइज और हाइड्रोथेरेपी लाभ पहुंचा सकती है। समुचित उपचार और देखभाल की वजह से सौरव के हाथ-पैर की मांसपेशियों में अकड़न कम हुई और पहले की अपेक्षा ठीक तरह चलने लगा है। उसमें आत्मविश्वास भी बढ़ा।
हाइड्रोथेरेपी या एक्वाथेरेपी वास्तव में पानी के अंदर कराई जाने वाली फिजियोथेरेपी है। जो प्रशिक्षित फिजियोथेरेपी डॉक्टर के सुपरविजन में ही कराई जाती है। इस थेरेपी से बच्चों खासकर मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के शारीरिक-मानसिक विकास को बढ़ावा मिलता है। सेरेब्रल पाल्से जैसे न्यूरोलॉजिकल जीरो-डेवलेपमेंट डिस्आर्डरए अति सक्रिय (हाइपर एक्टिव) या अशांत (रेस्टलेस) बच्चों के समग्र विकास के लिए यह थेरेपी बहुत मददगार साबित होती है।

बच्चे में ये शारीरिक विकार मूलतः गर्भावस्था में या जन्म के समय ब्रेन को किसी भी तरह की क्षति पहुंचने के कारण होते हैं। ब्रेन में जरूरी ऑक्सीजन पहुंच नहीं पाती, जिससे वह शरीर के विभिन्न अंगों और मांसपेशियों तक तालमेल बिठा पाने में असमर्थ हो जाता है। बच्चों की मांसपेशियों में लचीलापन और ताकत कम हो जाती है। हाथ-पैरों में अकड़ाहट आने लगती है जिससे उसे चलने-फिरने में दिक्कत होती है।
इसके अलावा इन समस्याओं से जूझ रहे बच्चों के लिए भी हाइड्रोथेरेपी लाभदायक है- डाउन सिंड्रोम हो, स्पाइन में दर्द हो, गठिया या जोड़ो का दर्द या सर्जरी के बाद मांसपेशियों में अकड़ाहट हो, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जिसमें मांसपेशियां धीरे-धीरे टूटने लग जाती हैं।
क्या है प्रक्रिया

हाइड्रोथेरेपी मेडिकल स्विमिंग पूल में दी जाती है जो आम स्विमिंग पूल से थोड़ा छोटा होता है। इसमें पानी का टैम्परेचर 33 डिग्री से 36 डिग्री तक सेट किया जाता है। बच्चों के लिए पूल का पानी आमतौर पर 34 डिग्री टैम्परेचर तक गर्म किया जाता है। इस पूल के अंदर बच्चों को फिजियोेथेरेपी कराई जाती है।
चूंकि हाथ-पैरों में अकड़ाहट की वजह से सेरेब्रल पाल्से पीड़ित बच्चे तैर नहीं पाते और उसे पानी के अंदर सांस न ले पाने की दिक्कत भी आ सकती है, इसलिए फिजियोथेरेपिस्ट उन्हें लाइफ-जैकेट पहनाकर पानी में उतारते हैं। जिससे वो पानी में ऊपर तैरता रहता है। यानी उसका शरीर पानी के अंदर और मुंह-सिर पानी के ऊपर ही रहता है। वैज्ञानिक आर्किमिडीज के ‘बायोन्सी फोर्स ऑफ वॉटर (उत्प्लावक बल)’ सिद्धांत की मानें तो पानी में जाने पर शरीर का वजन 90 प्रतिशत तक कम हो जाता है और हम पानी में तैरने लगते हैं।
हाइड्रोथेरेपी कराने के लिए किसी मशीन की जरूरत नहीं होती। पानी में जाने पर बच्चे का वजन कम होने पर उसे गुरूत्वाकर्षण के विरुद्ध हाथ-पैर चलाना, ऊपर-नीचे करना आसान हो जाता है। पानी में किसी भी मूवमेंट को करने के लिए उसके शरीर को चारों तरफ से बराबर प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है जिससे वह पानी में हाथ-पैर का मूवमेंट आसानी से कर पाता है। धीरे-धीरे फिजियोथेरेपिस्ट डॉक्टर बच्चे को पानी में वॉक, रनिंग, जम्पिंग, बॉल पुशिंग जैसी कई एक्सरसाइज करवाते हैं।
विभिन्न हाइड्रोथेरेपी एक्सरसाइज

बच्चे की स्थिति के आधार पर हाइड्रोथेरेपी एक्सरसाइज कराई जाती हैं। बच्चे को कम से कम 10 सप्ताह के लिए हाइड्रोथेरेपी दी जाती है। इसमें सप्ताह में तीन दिन 45 मिनट की सीटिंग की जाती हैं।
पानी में चलना- पानी में चलने से बच्चों को संतुलन, समन्वय और शक्ति में सुधार करने में मदद मिलती है। उन्हें पूल में एक-दो कदम आगे-पीछे और साइड में चलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कुछ दिन बच्चा इसका आदी हो जाता है, तो थोड़े ज्यादा गहरे पानी में चलने के लिए कहा जाता है। इससे बच्चे में आत्मविश्वास बढ़ता है।
फ्लोटिंग एक्सरसाइज- इसमें बच्चे को अपनी पीठ के बल लेटना और पानी में तैरना सिखाया जाता है। जरूरत हो तो उसके शरीर को फ्लोटेशन डिवाइस से सहारा दिया जाता है, इससे बच्चा रिलेक्स होगा।
किकिंग और लेग एक्सरसाइज– बच्चे को पूल के किनारे पकड़कर या किकबोर्ड का इस्तेमाल करते हुए किकिंग एक्सरसाइज कराई जाती है। इससे पैरों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं, लचीलेपन में भी सुधार होता है और शरीर में कॉर्डिनेशन को बढा़वा मिलता है।
वॉटर गेम्स- इसमें बच्चे को वॉटर बॉल या खिलौने खेलने के लिए दिए जाते हैं। बॉल को पानी में नीचे या आमने-सामने हिट करने के लिए कहा जाता है। खिलौनों को एक-दूसरे को पास करने या फेंक कर देने के लिए कहा जाता है। इससे बच्चों के हाथ-आंखों में कॉर्डिनेशन होता है, दूसरों के साथ बातचीत होने पर आत्मविश्वास आता है।
वॉटर एरोबिक्स– बच्चे की स्थिति और आयु के हिसाब से डिजाइन किए गए वॉटर एरोबिक्स कराए जाते हैं। इसमें बच्चे को हाथ-पैर उठाना, आगे-पीछे मूव करना सिखाया जाता है। इससे बच्चे की मांसपेशियों की ताकत बढ़ती है।
डीप ब्रीदिंग एक्सरसाइज- बच्चे को पानी में डीप ब्रीदिंग करना सिखाया जाता है। नाक से गहरी सांस लेने और मुंह से धीरे-धीरे छोड़ने के लिए कहा जाता है। इससे वो रिलेक्स महसूस करते हैं और मानसिक तनाव कम होता है।
किस उम्र में दी जाती है हाइड्रोथेरेपी

हाइड्रोथेरेपी के लिए किसी भी उम्र के बच्चे आ सकते हैं। अगर 4-5 महीने के बच्चे की मांसपेशियों में कमजोरी या अकड़ाहट हो, मानसिक रूप से कमजोर होना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। तो डॉक्टर को कंसल्ट करना जरूरी हो जाता है। डॉक्टर बच्चे की स्थिति के हिसाब से ही डॉक्टर हाइड्रोथेरेपी कराने की सलाह देते हैं।
क्या होते हैं फायदे
सेरेब्रल पाल्से पीड़ित बच्चे दैनिक रूटीन में अपने हाथ-पैर जमीन से ऊपर नहीं उठा पाते। नियमित रूप से हाइड्रोथेरेपी कराने पर उनमें काफी बदलाव आते हैं और आत्मविश्वास बढ़ता है।
- 34 डिग्री तापमान में हल्का गुनगुना पानी बच्चे के लिए लाभदायक होता है। गर्म पानी में उसकी सिंकाई तो होती ही है, गुनगुने पानी में रहने से हार्ट को पम्प करने की प्रक्रिया बढ़ जाती है और शरीर में रक्त संचरण अच्छा होता है।
- रक्त संचरण बढ़ने पर ऑक्सीजनयुक्त ब्लड हर मांसपेशी, नर्व्स तक पहुंचता है। मांसपेशियों में अकड़ाहट कम होकर लचीलापन आ जाता है। दर्द में आराम मिलता है। मांसपेशियों में मूवमेंट की क्षमता बढ़ती है।
- आमतौर पर ये बच्चे सीधे नहीं खड़े हो पाते, हाइड्रोथेरेपी के बाद शरीर का संतुलन बढ़ता है। चलने में आसानी होती हैं।
- एक्टिव होने पर सांस बेहतर तरीके से ले पाता है।
- उनका मेटाबॉलिज्म रेट बढ़ता है, पाचन प्रक्रिया सुचारू होने पर उनकी भूख में सुधार होता है जिससे वजन भी बढ़ता है।
- हाइड्रोथेरेपी से बच्चे की जीवनशैली में भी बदलाव आता है। हाइड्रोथेरेपी में चूंकि पेरेंट भी साथ रहते हैं, दूसरे बच्चों को देखता है तो उसमें आत्मविश्वास बढ़ता है। दूसरे बच्चों और फिजियोथेरेपिस्ट डॉक्टर से मिलने-बात करने पर उनका मानसिक विकास अच्छा होता है।
- जब बच्चा यह महसूस करता है कि वो खड़ा हो पा रहा है या मूव कर पा रहा है। इससे बच्चे का स्ट्रेस लेवल कम होता है जिससे वो पहले की अपेक्षा ज्यादा खुश रहता है।
(डॉ मुनीष धवन, एसिस्टेंट प्रोफेेसर, बाल रोग विशेषज्ञ, मीरी-पीरी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च सेंटर, शाहाबाद और डॉ प्रभात रंजन, सीनियर फिजिययोथेरेपिस्ट, एम्स, दिल्ली)
