Maafi: प्रोफेसर साहब आ गए,प्रोफेसर साहब आ गए जल्दी से बढ़िया वाला कुर्सी लाओ कुछ अजीब सा लगा मुझे अपने ही गांव में पहुंचकर सभी दादा, बाबा ,चाचा आज मुझे प्रोफेसर साहब कह रहे थे सच में सब समय का दोष होता है समय बदलते ही लोगों की नजर और नजरिया दोनों बदल जाते हैं जिनके मुंह रजनीशबा कहते हुए थकते नहीं थे आज वह मुझे प्रोससर साहब बुला रहे हैं। वो भी बिल्कुल सम्मान भरी निगाहों से, इनके पाक निगाहें यह बयां कर रही थी। अरे नहीं बाबा मैं वही रजनीशवा हूं आपका छोटकू। इतना बड़ा संबोधन मेरे लिए मुझे अच्छा नहीं लग रहा है, है ना शैलेंद्र काका अपनी चाचा की ओर देखते हुए मैंने कहा। तभी हमारे बड़े बाबा ने कहा ,जो इतने प्रोफेसरों का निर्माणकर्ता है निर्माता है । वो प्रोफेसर से कम थोड़े ही है वह तो प्रोफेसरों का गुरु है……….।
छोड़िए ना बाबा इन सब बातों को मैं भोज खाने आया हूं इतने दिनों बाद । मुझे जी भर के सबके साथ गप्पे करनी है और भोज खाना है। इस वक्त का आनंद लेना है हां हां बिल्कुल । भोज तो बस एक बहाना है सब से मिलने जुलने का, भोज खत्म हुआ देर रात तक हम सभी चर्चा परीचर्चा करते रहे। आंगन गया तो दादी ,चाची ,बहन ,बुआ सब से मिला उन सब से भी ढेरों बातें की सब ने ढेरों आशीर्वाद दिया। सब से बातें करते करते बहुत लेट हो चुकी थी, मैं सोने चला गया। लेकिन मुझे नींद कहां आ रही थी मेरे कानों में बाबा की गूंज प्रोफेसर साहब आ गए, प्रोफेसर साहब आ गए गुंजायमान हो रही थी ।वही घर वही सब कुछ मेरे लिए शब्द बदल गए मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। 27 की उम्र में , महसूस किया कि मैं 47का सम्मान पा रहा हूं । बचपन में ही 55 की उम्र सच में, मैं जीने लगा था। बड़ी सोच बड़ी-बड़ी बातें इसकी सबसे बड़ी वजह होती है जिम्मेदारियां, ये जिम्मेदारियां कम उम्र में ही जिम्मेदार बना देती हैं। मैंने महसूस किया कि मेरे पापा बलेंद्र चौधरी को भी, यह शब्द सुकून दे रहे थे। अपने कानों में गूंजते इसी ध्वनि के साथ मैं रजनीश चौधरी ना चाहते हुए भी अपने अतीत के पन्नों को पलटने पर मजबूर हो गया यहां आकर………।
मकान तो नहीं लेकिन प्यारा सा गांव में घर था हमारा। इस घर को स्वर्ग से भी सुंदर सजा कर रखती थी मेरी मां अभिलाषा देवी। मेरे पापा ब्लेंद्र चौधरी चाचा शैलेंद्र चौधरी दोनों भाई मिलकर बहुत ही प्यार से रहते थे। कहते हैं ना कि बच्चे घर से ही सीखते हैं, जब अपने पापा को चाचा से इतना प्यार करते देखता था। मैं भी अपने छोटे भाई केशव चौधरी से उतना ही प्यार करता था। दोनों भाई बहुत कम ही लड़ाई झगड़ा करते थे, इसको देखकर मेरी मां भी बहुत सुकून महसूस करती थी । इतना काम करने के बाद मेरी मां जब आराम करने जाती हमेशा कहती ,मेरा बच्चा मुझे तंग नहीं करता है।चाचा को पढ़ाई की काफी ललक थी और इस ललक को जीवित रखने के लिए मेरे पापा ने कोई कसर नहीं छोड़ी । दादा दादी उतने सक्षम नहीं थे कि, उनके इस पढ़ाई को पूरा करवा पाते । चाचा चार्टर्ड अकाउंटेंट की पढ़ाई कर रहे थे, वह भी बाहर रहकर। लेकिन उन्होंने पढ़ाई से चोरी नहीं की उन्होंने बढ़िया से पूरी लगन और ईमानदारी सेअपनी चार्टर्ड एकाउंटेंट की पढ़ाई पूरी कर इस पेशे को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाया………।
मेरी मां कहीं ना कहीं चाहती थी कि, हम दोनों भाई भी चाचा के तरह ही चार्टर्ड अकाउंटेंट की पढ़ाई करें। धीरे-धीरे समय बीतता गया और मैं भी बड़ा हो गया चाचा को देखते हुए, मैट्रिक के बाद इंटर कॉमर्स से लेकर अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखा । मेरी मां हमेशा कहती की चाचा चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं तुम भी उसी पेशे को अपनाना । पढ़ने में,मैं भी तेज था लेकिन कहते हैं ना कि, सही मार्गदर्शन भी जरूरी होता है ।जिंदगी में कब किस मोड़ पर कौन सा बदलाव आ जाए कोई नहीं जानता। कुछ ऐसा ही हुआ हमारे परिवार के साथ भी चाचा अपने पेशे को बेहतर संभालने लगे। विवाह योग्य थे ही ढेर सारी शादी के प्रस्ताव आने लगे थे ।अच्छी लड़की देख कर सब ने रिश्ता तय कर दिया और शादी भी हो गई। सूरत से अच्छी नहीं सीरत से भी अच्छी होनी चाहिए यह बड़े बुजुर्ग देख नहीं पाए हमारी चाची में । मेरी मां काफी समझदार महिला है हमेशा परिवार को बांधकर रखने में विश्वास करती हैं। हमारी मां जिस घर को एक एक तिनके से जोड़ जोड़ कर स्वर्ग बनाई थी।चाची ने आते ही, स्वर्ग जैसे घर को नरक में तब्दील कर दिया…….।
जब परिवार में कलह बढ़ने लगती है तो बरकत नजर नहीं आती है , जहां मेरा परिवार कम में सुकून महसूस कर रहा था वही देखते ही देखते धीरे-धीरे हर चीज का अभाव होने लगा । मेरे में समझदारी थी, थोरी कम उम्र से ही लेकिन, पैसे का आभाव इतना था कि मैं जो करना चाहता था वह कर नहीं पाया ।मां की आंखों को जब मैं पढ़ता तो मुझे बहुत तकलीफ होती देखकर। इस बात को मैं अच्छी तरह से समझने लगा था कि पैसे का अभाव है इसलिए मेरी पढ़ाई आगे कंटिन्यू नहीं हो पा रही है तो फिर मैंने घर घर जाकर ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया ।धीरे-धीरे मेरा ये काम रफ्तार पकड़ने लगा, काम कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता जो काम आपको आपका भोजन, और दो पल का सुकून दे वह हर काम आनंदमय ही होता है…….।
इसी आनंद के अनुभव के साथ साथ मेरा इस कौशल में भी विकास हो रहा था। मैंने कॉमर्स से ग्रेजुएशन भी कर लिया। इसी दरमियान मैंने कुछ दिन प्राइवेट सेक्टर में भी काम किया, लेकिन मन नहीं लगा पठन-पाठन में जो रूचि थी वह मुझे प्राइवेट सेक्टर में काम करते हुए, वो रुझान नहीं लगा। पुनः वापस घर आकर होम ट्यूशन करने लगा । समय अपनी रफ्तार से बीत रहा था । छुट्टियों में हमारे घर हमारे मामा जी आए हुए थे ,मामा जी मेरे काफी समझदार थे, उन्होंने मेरा सही मार्गदर्शन किया उन्हीं के कहने पर यूजीसी नेट की परीक्षा मैंने दी। इस उच्च स्तर की पढ़ाई की कोई उचित व्यवस्था नहीं थी फिर भी मैंने अथक मेहनत से नेट क्वालीफाई कर लिया । मैंने अपना रिजल्ट सबसे पहले मां को दिखाया। मां की आंखें चमक रही थी ,अपने बेटे की खुशी पे……..।
जिंदगी को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ तो जीविका चाहिए ही था सो मैंने इसी नेट के रिजल्ट को पाकर, इसी का शिक्षक बनने का सोच लिया । मेरे इसी सोच को मेरे 6 मित्रों ने आर्थिक रूप से सहयोग करके एक प्लेटफार्म का रूप दे दिया, और देखते ही देखते मैं इसका संचालक बन गया। मां की समझदारी और लोगों का इतना स्नेह मिलता गया, सफलताएं दिन दूनी रात चौगुनी इस प्लेटफार्म की बढ़ती ही चली गई । वक्त ने करवट ली अथक मेहनत से आज छुटकू रजनीश बहुत आगे निकल गया…अपने जीवन के सफर में ।यही सब सोचते सोचते पता नहीं कब आंखें लग गई।सुबह सुबह जब सूर्य की किरणें आंखों पर पड़ी,उठते ही मैं देखता हूं कि, लव खामोश और झुकी नजरों से चाचा हमारे बगल में खड़े हैं। थोड़ी देर चुप्पी के बाद चाचा ने कहा मुझे माफ कर दो, यह बातें मेरे सीने को छलनी कर दिया। मैंने उन्हें गले लगाते हुए कहा आज मैं जो भी हूं , जैसा भी हूं आपके उस वक्त के बदले स्वभाव से ही हूं। मैं आपका अपना हूं तो फिर माफी किस बात की|
