दिवाली से जुड़े प्रतीकों का महत्त्व: Diwali Importance
Diwali Importance

Diwali Importance: दिवाली पर हम सुख-समृद्धि के लिए बहुत सारे प्रतीक चिह्नïों का प्रयोग भी करते हैं। कौन से हैं वह चिह्नï तथा क्या है उनका महत्त्व? आइए जानते हैं लेख से?

दीपावली के शुभागमन से तो जैसे संपूर्ण वातावरण अपने आप ही जगमगा उठता है। हर्षोल्लास से भरे इस त्योहार को जोर-शोर से मनाने को भी खुद-ब-खुद मन मचल उठता है। हफ्तों पहले से ही हम लोगों के मन मस्तिष्क में लक्ष्मी-गणेश, कमल, स्वास्तिक, ओम, दीया, कलश-पल्लव, शुभ-लाभ इत्यादि की छवियां उभरने लगती है।

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यह जगत प्रसिद्ध है कि धन-समृद्धि की देवी लक्ष्मी तथा शांति के देवता गणेश हैं। साथ-ही-साथ जहां शांति होती है वहां धन की देवी लक्ष्मी अवश्य वास करती हैं, लेकिन फिर भी दीपावली की रात को लक्ष्मी-गणेश की उपासना कर शांति और धन-वैभव दोनों को आमंत्रित किया जाता है। इस तरह लाल कपड़े में लिपटी लक्ष्मी का अर्थ ऐसी देवी के आह्वान से है जो दानी, साहसी, रक्षा करने वाली और बुराईयों का नाश करनेे वाली है।

कमल तो लक्ष्मी जी का प्रिय पुष्प है। इस तरह लक्ष्मी जी की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए इन्हें कमल पुष्प अवश्य चढ़ानी चाहिए। साथ ही साथ कमल इसका प्रतिनिधित्व भी करता है कि जिस तरह वह कीचड़ में खिलकर भी सबको अपनी ओर आकर्षित करता है, वैसे ही हम लोग भी अपने सुकर्मों से सबको अपनी ओर आकर्षित करें अर्थात भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बनें।

Diwali Importance
swastika

‘स्वास्तिक का अर्थ’है क्षेम, शुभ, मंगल तथा कल्याण और ‘क’ का अर्थ है करने वाला। इस प्रकार स्वास्तिक का अर्थ है- कल्याण करने वाला। देवताओं के चारों ओर घूमने वाले आभामण्डल का चिह्नï ही स्वास्तिक होने के कारण स्वास्तिक देवताओं का प्रतीक है, इसलिए समस्त शास्त्रों में स्वास्तिक को शुभता और सकारात्मक ऊर्जा प्रदायक बताया गया है। ऐसा कोई भी मांगलिक कार्य नहीं है जो स्वास्तिक की रचना के बिना पूर्ण होता हो। स्वास्तिक, सभी त्योहार, व्रत, पर्व, पूजा एवं हर मांगलिक अवसर पर सामान्यतया रोली, सिन्दूर या कुमकुम से बनाया जाता है। यह परम शुभता का प्रतीक अनादिकाल से विद्यमान होकर संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। सभ्यता और संस्कृति के पुरातन लेख केवल हमारे वेद और पुराण ही हैं और हमारे ऋषि-मुनियों ने उनमें स्वास्तिक का भान प्रस्तुत किया है। पुण्याहवाचन तथा स्वास्तिवाचन में आशीर्वाद मंत्र इस प्रकार है।

‘ऊं आयुष्मते स्वस्ति, ऊं आयुष्मते स्वस्ति, ‘ऊं आयुष्मते स्वस्ति।ऊं स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धक्षभा: स्वस्तिन: पूषा विश्ववेदा:।
स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दघातु।।
स्वास्तिक की चार भुजाओं में विद्यवान प्रतीक रूप चार देवताओं से मानव-कल्याण हेतु इस प्रकार प्रार्थना की जाती है।
सब ओर विद्यमान सुयश वाले इन्द्र, संपूर्ण विश्व का ज्ञान रखने वाले पूषा, अरिष्टों को मिटाने हेतु चक्र के समान शक्तिशाली गरुड़ एवं बुद्धि के स्वामी बृहस्पति जनमानस के कल्याण की वृद्धि करें। इस स्वास्तिक से 100000 सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

Om
Om

ओम का हिन्दू धर्म में बड़ा महत्त्व है। यह प्रतीक ब्रह्मï, जो हर जगह, हर समय उपस्थित और जीवन का प्रमाण है, को अभिव्यक्त करने वाला पवित्र शब्दांश है। ‘ऊं’ आत्मिक बल देता है। इसके उच्चारण से जीवनशक्ति ऊर्ध्वगामी होती है। इसके सात बार के उच्चारण से शरीर के रोग के कीटाणु दूर होने लगते हैं एवं चित्त से हताशा-निराशा भी दूर होती है। यही कारण है कि ऋषि-मुनियों ने सभी मंत्रों के आगे ‘ऊं’ जोड़ा है। जैसे- ऊं नम: शिवाय, ऊं गणेशाय नम:, ऊं नमो भगवते वासुदेवाय, ऊं भूर्भुव: स्व… आदि।

diwali se jude pratikon ka mahatva
diwali se jude pratikon ka mahatva


इस तरह यह सकारात्मक ऊर्जा प्रदायक ‘ऊं’ हिन्दू, इस्लाम तथा सिख धर्म में विद्यमान होने के साथ-साथ हम लोगों के जन्म से भी जुड़ा है अर्थात् जन्म लेते ही सर्वप्रथम को ऊंवां…ऊंवां…ऊंवां करता है। इस तरह अकार, उकार और मकार युक्त ऊं ही समस्त शब्दों की बुनियाद है।

दीया प्रकाश का प्रतीक है। दीया के सच की अनुभूति को पाए बिना जीवन के अवसाद और अंधेरे को सदा सर्वदा के लिए दूर कर पाना कठिन ही नहीं, नामुमकिन भी है। दीये का सच उसके स्वरूप में है। दीया भले ही मरणशील मिट्टी का है, परन्तु ज्योति अमृतमय आकाश की है। जो धरती का है, वह धरती पर ठहरा है, लेकिन ज्योति तो निरंतर आकाश की ओर भागी जा रही है। ठीक दीये की ही भांति मनुष्य की देह भी मिट्टी ही है, किंतु उसकी आत्मा मिट्टी की नहीं है। वह तो इस मिट्टी के दीये में जलने वाली अमृत ज्योति है। हालांकि अहंकार के कारण वह इस मिट्टी की देह से ऊपर नहीं उठ पाती है। आत्मा की ज्योति जलते ही हम लोगों में स्नेह, सौहार्द, ममत्व, इंसानियत जागृत होगी और अपना-पराया, ऊंच नीच का भेद-भाव समाप्त हो जायेगा।

Kalash-Pallava
Kalash-Pallava

पुराण कुंभ कहा जाने वाला पानी से भरा और आम की पत्तियों से ढंका मिट्टी का घड़ा, उसके ऊपर अनाज से भरा ढंकना और उसके ऊपर रखा नारियल को पूजा शुरू करने से पूर्व आमतौर पर मुख्य देवी-देवता के निकट स्थान दिया जाता है। इन सबके पीछे ऐसी मान्यता है कि हरे रंग का आम्र पल्लव मन की शांति, प्रसन्नता और स्थिरता का प्रतीक है तो पानी से भरा मिट्टी का कलश और अनाज से भरा ढंकना, धन-वैभव और अनाज का।

इस तरह दीपावली में श्री, शुभ-लाभ और फल-पत्तियों का भी बड़ा महत्त्व है। श्री और शुभ-लाभ तथा रिद्धि-सिद्धि भी लक्ष्मी सूचक शब्द है। इसी तरह नारियल, पान, सुपारी, कसैली, दही, नारियल इत्यादि का भी लक्ष्मी पूजा के अंतर्गत विशेष महत्त्व है। तभी तो इनके बिना लक्ष्मी-पूजा की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

diwali se jude pratikon ka mahatva
diwali se jude pratikon ka mahatva

जहां तक नैवेद्य या प्रसाद का प्रश्न है तो इसके लिए ऌपका केला और लड्ïडू तथा खील-बताशा को विशेष मान्यता प्राप्त है।