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diwali me rang bharti rangoli - दीपावली में रंग भरती रंगोली

रंगोली लोकजीवन का एक बहुत ही अभिन्न अंग है। देश के विभिन्न हिस्सों में रंगोली सजाने का अपना अलग-अलग स्वरूप है। दीपावली के मौके पर इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है।

प्राचीनकाल से ही हिन्दू धर्म में रंगोली को शुभ माना जाता है। विभिन्न रंगों और फूलों से बनाई गई रंगोली आपके घर और आसपास के वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है, जिससे मन प्रसन्न और तनावमुक्त रहता है।

ये रंग ही तो त्योहारों में जान डालते हैं, चाहे वह होली हो, गणेश चतुर्थी हो, दुर्गा अष्टïमी हो या फिर दिवाली ही क्यों न हो। रोशनी का पर्व दिवाली भी रंगों के बिना अधूरा लगता है। रंगों के जरिए हम अपनी खुशियों और भावों को व्यक्त करते हैं।

रंगोली को अल्पना या चौक पूरना भी कहा जाता है। कई स्थानों पर रंगोली बनाने के लिए विभिन्न डिजाइन के साधन भी मिलने लगे हैं, जिसमें चावल का आटा भर कर जमीन पर चलाना मात्र होता है और सुन्दर आकृतियां उभर आती हैं। यह एक प्रकार से स्त्रियों द्वारा अपनी रचनात्मकता दिखाने का अवसर भी होता है। ग्रामीण परिवेश अभी भी आधुनिकता से अछूता है। वहां घर के बाहरी दीवारों पर, आंगन में, मुख्य द्वार के बाहर विभिन्न रंगों की अद्भुत रंगोली देखने को मिल जाएगी।

diwali me rang bharti rangoli - दीपावली में रंग भरती रंगोली
दीपावली में रंग भरती रंगोली 4

यह प्रसन्नता की बात है कि आधुनिक और पढ़ी-लिखी स्त्रियों में भी रंगोली या अल्पना के प्रति गहरा आकर्षण दिखाई देता है।

रंगोली के बारे में एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। एक बार शिवजी ने हिमालय की ओर प्रस्थान करते हुए पार्वती से कहा कि जब मैं लौटूं, तुम्हारा घर-आंगन जगमगाता हुआ मिलना चाहिए, अन्यथा मैं पुन: हिमालय पर लौट जाऊंगा। शंकरजी तो चले गए, पर पार्वती चिंता में मग्न हो गईं। उन्होंने घर को झाड़ा-बुहारा। फिर गाय के गोबर से लीपा। घर सूख भी न पाया था कि शंकरजी ने अपनी वापसी की सूचना की आवाज लगा दी। पार्वती हड़बड़ा कर दौड़ीं और उनके पांव गीले आंगन में फिसल गए। शिवजी ने देखा तो चकित रह गए। पार्वती के पावों की कलात्मक छाप, पांवों में लगे महावर के लाल रंग का अंकन और उस पर गिरे हुए ऌफूल। सब एक मनोरम दृश्य उत्पन्न कर रहे थे।

इस रंगीन आकृति पर प्रसन्न होकर शिवजी ने वरदान दिया कि आज से जिन घरों में यह रंगोली सजाई जाएगी, वहां शिव का वास होगा। घर-आंगन, धन-धान्य से भरा रहेगा और तभी से घरों में रंगोली बनाने की प्रथा चल पड़ी।

diwali me rang bharti rangoli - दीपावली में रंग भरती रंगोली
दीपावली में रंग भरती रंगोली 5

अल्पना-अलंकरण अत्यधिक पुराना प्रतीत होता है, क्योंकि पुरातत्वीय खोजों से जो सामग्री प्राप्त हुई है, उसमें अद्भुत रेखांकन देखने को मिले हैं। विशेषज्ञों का मत है कि ये रेखांकन, जो प्राय: अल्पना में पाए जाते हैं, वे शिव के प्रतीक हैं तथा अर्धवृत का प्रयोग आदि शक्ति के प्रतीक हैं। इस प्रकार शिव-शक्ति के प्रतीक रूप में अल्पना का अंकन हमारे देश के एक छोर से दूसरे छोर तक मांगलिक अवसरों पर अवश्य किया जाता है, जिसे विविध क्षेत्रों में अल्पना, रंगोली, चौक पूरना, मांडना, कोलम, कोडरा, कुंडल आदि नामों से पुकारा जाता है।

विशेष अवसरों पर उकेरे जाने वाले ये मांगलिक प्रतीक कल्याण की कामना के द्योतक हैं। इसकी महत्ता के बारे में मान्यता है कि बिना इन अलंकरणों के घर कल्याणकारी, मंगलकारी नहीं प्रतीत होता।

मांगलिक अवसरों पर घर में बनाए जाने वाले चित्रांकन में अपने क्षेत्रों के अनुसार अल्पना या रंगोली उकेरे जाते हैं। प्रारंभ में गाय के गोबर से उस स्थान को लीपा जाता है, फिर सींक, सलाई, रुई, ब्रश अथवा उंगली के सहारे अल्पना, रंगोली, लोक चित्रकारी आदि बनाने का कार्य प्रारंभ कर दिया जाता है तथा अवसर के अनुरूप लक्ष्मी, कमल का फूल, स्वस्तिक, चिड़िया, हाथी, शेर, मोर, ऌफूल आदि श्रद्धा भक्ति के साथ बनाए जाते हैं। अल्पना आलेखन में नारी-हृदय की कोमल भावनाओं का जो भाव उड़ेला जाता है, उसकी उत्कृष्टता को आंकना आसान नहीं है। शिव और शक्ति के समन्वय की कल्पना को अल्पना में आड़ी-तिरछी रेखाओं और अर्धवृतों में साकार करने की परंपरा भी है।

रंगोली बनाने की शुरुआत प्राय: वर्षा ऋतु समाप्त होते ही होने लगती है। आसमान के साफ होते ही लोग कीड़ों-मकोड़ों को नष्ट करने के लिए घरों की सफाई शुरू कर देते हैं। घरों की सफाई के बाद घर-आंगन रंगोली या अल्पना के लिए तैयार हो जाता है। स्त्रियां रोली, कुमकुम, पिसे चावल, रंग, लकड़ी का बुरादा, भूसी, चोकर, आटा आदि अनेक वस्तुओं से जमीन पर रंगोली बनाती हैं।

भगवान के पूजन के समय सर्वप्रथम चौक पूरने की प्रथा भी रंगोली का ही एक रूप है। स्त्रियां स्वस्तिक के चिन्ह को अंकित करना शुभ मानती हैं। स्वस्तिक चार भुजाओं का प्रतीक है।

ये चार रेखाएं आश्रम, वर्ग, वेद एवं पुरुषार्थ की प्रतीक हैं। स्वास्तिक के अतिरिक्त कलश, पुष्प, मछली, पक्षी, हाथी, शंख, तारा आदि का अंकन करने के पीछे सुख, समृद्धि एवं ऐश्वर्य की कामना ही परिलक्षित होती है। लक्ष्मी तथा गणेश का अंकन भी इसी भावना का प्रतीक है। रंगोली हमारी लोक संस्कृति की एक अमूल्य धरोहर है। दीपावली के पर्व पर भी दीप और कलश को अंलकृत करके एवं घरों व पूजा के थाल में रंगोली सजाकर स्त्रियां संपूर्ण वातावरण को रंग-बिरंगा बना देती हैं।

रामचरितमानस में इसका उल्लेख इस रूप में किया गया है-

चौकें चारु सुमित्रां पूरी।
मनिमय विविध भांति अति रूरी।।
तथा लोकगीत में भी कहा गया है-
घर बीच चउक पुराइला, देव
बइठाइला हो।

तात्पर्य यह है कि घर में चौक पूर कर मांगलिक कार्य के शुभारंभ में देव-स्थापना कर सर्वांगीण कल्याण की कामना की जाती है। वास्तव में ग्रामीण-जीवन का भोलाभाला, सरल-सीधा निष्कलुष स्वरूप इन सबसे झलकता है कि कितनी निश्छल निर्मल-भावनाएं इन विविध उपास्य प्रतीकों में उभारी जाती हैं और उकेरी जाती हैं, जिनका गुणगान करते-करते मन नहीं अघाता और देखते-देखते जी नहीं भरता। 

रंगोली मां लक्ष्मी को बेहद प्रिय है। इसलिए लोग रंगोली बनाकर मां लक्ष्मी को प्रसन्न करते हैं और उनका स्वागत करते हैं तथा उनसे आर्शीवाद की कामना करते हैं। आज रंगोली सिर्फ गांव-कस्बों में ही नहीं बल्कि शहरों में भी अत्यधिक लोकप्रिय है। नई-पुरानी पीढ़ी मिलकर बड़े चाव से रंगोली बनाती है। आखिर रंग-बिरंगी रंगोली ही तो दीपावली को संपूर्ण और रंगीन बनाती है।

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