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हाल के दशकों में लड़कियों और महिलाओं के जीवन में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। लेकिन आज भी कुछ महिलाओं की दशा में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है। अधिकारों के प्रति जागरूकता के अभाव के कारण महिलाओं की दशा में सुधार नहीं हुआ है।

अब बात करते हैं कि महिलाओं के लिए आज के समय की मांग क्या है और क्यों? नीति निर्माण जैसे कार्यों में महिलाओं की भागीदारी बढ़नी चाहिए। क्योंकि जब महिलाएं इन क्षेत्रों में आगे आएंगी तो परिवार के लिए और अपनी जैसी और महिलाओं के सर्वांगीन विकास पर ध्यान देगी।

भारत सरकार ने नए कानूनों को लागू करके महिलाओं की सुरक्षा और उन्हें सशक्त बनाने में मदद करने के लिए एक पहल की है।

निर्भया मामले के बाद भारत सरकार ने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) विधेयक, 2015 पारित किया है। (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2000, के रूप में अपराधी की आयु अब 18 से घटाकर 16 वर्ष कर दी गई है। भारत की संसद ने महिलाओं को विभिन्न रूपों से होने वाले अपराधों से बचाने के लिए कई अन्य कानून पारित किए हैं।

महिलाओं के सशक्तिकरण को देखते हुए निम्नलिखित कानून बनाएं गए हैं जिनकी व्याख्या कुछ इस प्रकार से है-

मातृत्व लाभ अधिनियम 1961

यह अधिनियम कामकाजी महिलाओं को मातृत्व लाभ की अनुमति देता है, हर वह कामकाजी महिला जो कम-से-कम तीन महीने के लिए किसी कंपनी का हिस्सा रही हैं, ऐसे कार्यालय में वह पेड मेटरनिटी लीव की हकदार हैं।

2005, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम

महिलाओं के प्रति पुरुषों के बढ़ते हिंसात्मक रवैये को देखते हुए घरेलू हिंसा संरक्षण कानून पारित हुआ। यह कानून घरेलू परिस्थितियों में महिलाओं को अपमानजनक पुरुषों से बचाता है। विवाहित महिलाओं के साथ लिव-इन-रिलेशन में रह रही महिलाओं को भी सुरक्षा प्रदान करता है।

कार्यस्थल में महिलाओं के यौन उत्पीड़न से सुरक्षा का अधिनियम, 2013

शारीरिक और मानसिक रूप से सुरक्षित कार्यस्थल पर काम करना हर महिला का अधिकार है। किसी भी  कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन दुराचार को न्यायालय द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जाता है। ये कानून सभी कार्यस्थलों में सुरक्षा के साथ महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाएगा जिससे सही मायने में महिला सशक्तिकरण होगा।

बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006

बाल विवाह भारतीय संस्कृति और रीति-रिवाजों में गहराई से अन्तर्निहित है, जिसे मिटाना मुश्किल हो जाता है। यह अधिनियम उन विवाहों पर रोक लगाता है जहां दूल्हे की उम्र 21 साल से कम है और दुलहन की उम्र 18 साल से कम है। इस कानून के तहत, नाबालिग लड़कियों की शादी करने का प्रयास करने वाले माता-पिता पर आपराधिक आरोप लगते हैं। उन्हें इस अपराध के लिए दंडित भी किया जाता है।

महिलाओं के लिए राष्ट्रीय आयोग, 1990

राष्ट्रीय महिला आयोग का प्रमुख उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाना था। यह एक ऐसी यूनिट है, जो शिकायत के आधार पर महिलाओं के संवैधानिक हितों और उनके लिए कानूनी सुरक्षा उपायों को लागू कराती है।

1976 का समान पारिश्रमिक अधिनियम

यह अधिनियम बिना किसी लिंग भेदभाव के समान काम का समान वेतन प्रदान करता है। यह विशेष अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि लिंग की परवाह किए बिना पुरुष और महिला श्रमिकों को समान रूप से और बिना पक्षपात के भुगतान किया जाए। महिलाओं के लिए सिर्फ कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं हैं बल्कि उनको उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना भी बेहद जरूरी है।

1956 का हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम

पुरुषों को आमतौर पर उनके माता-पिता या पैतृक अवांछित संपत्ति का विशेषाधिकार प्राप्त होता है, जबकि महिलाओं के पास कम अवसर होते हैं। इस संशोधन में एक नई धारा जोड़ी गई। जहां अब पैतृक संपत्ति पर बेटियों का भी बेटों के बराबर का ही अधिकार होगा।

20वीं सदी में दुनिया भर में महिलाओं की स्थिति में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं।  महिलाओं को सशक्त बनाना आपके साथ शुरू होता है। आप आस-पास की महिलाओं के लिए अपना समर्थन दिखाएं। उन्हें आत्मनिर्भर बनाएं और उनको उनकी ताकत याद दिलाएं की वो भी समाज में अपना वर्चस्व पा सकती हैं।

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