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परंपरा में ही है प्रकृति से जुड़ाव

घरों में बनने वाली रोटियों में से पहली गाय के लिए और आखिरी कुत्ते के लिए, चिडिय़ों के लिए छत्त पर पीने का पानी रखना, कबूतरों को बाजरा डालना, चींटियों को आटा बुरकना, श्राद्ध में कौवे के लिए पहला खाना रखना, शुभ अवसरों पर बैल या घोड़े को गुड़-चना खिलाना और ऐसे ही न जाने कितने कर्मकांड, जिन्हें आज केवल धार्मिक अनुष्ठानों से जोड़कर देखा जाता है, हमेशा से हमारी भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। भले ही ये सब मुख्य रूप से ‘धर्म के नाम पर होता आया हो, लेकिन धर्म की तो वास्तविक परिभाषा ही यही रही है, जिसे धारण किया जा सके, जो हमारे रोज़मर्रा के जीवन का अटूट हिस्सा हो।

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Beat Plastic Pollution: हमारे जीवन के लिये कितना घातक है प्लास्टिक?

पूरे विश्वभर में बड़ी संख्या में लोगों को बढ़ावा देने और उत्सव को ज्यादा असरदार बनाने के लिये संयुक्त राष्ट्र के द्वारा निर्धारित खास थीम पर हर वर्ष का विश्व पर्यावरण दिवस उत्सव आधारित होता है।

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