आज हम आपको ऐसे ही कुछ कुप्रथा के बारे में बताएंगे जो हमारे समाज भी आज भी देखने को मिलता है। साथ ही उन कुप्रथाओं के बारे में बताएंगे जो कभी हमारे समाज में होते थे।
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आज की शबरी – गृहलक्ष्मी लघुकथा
अपनी मित्र कजरी के घर के मेन गेट की घंटी बजाते बजाते मेरी नजर बेर के उस पेड़ पर अटक गई, जो लगा तो बाजू वाले घर में था पर उसका पूरा हिस्सा बाउंड्री वॉल के इस तरफ याने कजरी के आंगन में था गेट खोलते कजरी बोली, क्या सोचने लगी।
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दहेज – गृहलक्ष्मी लघुकथा
शिवांश एक कम्पनी में इंजीनियर था। उसके साथ कम्पनी में अक्षिता भी कार्य करती थी, दोनों एक दूसरे को पसन्द करते थे परन्तु डरते थे कि कहीं दोनों के माता-पिता जाति -भेद के कारण मना न कर दें।
