Overview: रेखा के काव्यात्मक शब्दों ने रेड सी इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल की रात को यादगार बना दिया
उमराव जान के रेड सी इंटरनेशनल प्रीमियर पर रेखा का संबोधन सिर्फ एक भाषण नहीं था—वह जीवन, कला और इंसान की सहज कमजोरियों की एक खूबसूरत स्वीकारोक्ति थी। उनकी पंक्ति—“मैंने सीखा कि क्या नहीं करना चाहिए”—अनुभव और विनम्रता का ऐसा संगम थी जिसे सुनकर हर कोई भीतर तक छू गया।
Rekha Emotional Speech: रेड सी इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में उमराव जान के विशेष प्रीमियर के दौरान रेखा मंच पर आईं तो पूरा माहौल किसी जादू की तरह ठहर गया। उनकी आँखों में वर्षों की तपस्या, अनुभव और भीतर सहेजी अनगिनत कहानियों की चमक दिखाई दे रही थी। उन्होंने अपने अंदाज़ में, बेहद शांत और काव्यात्मक लहज़े में वो बातें कहीं जो हर कलाकार, हर दर्शक और हर सपने देखने वाले के दिल को छू गईं—“मैंने सीखा कि क्या नहीं करना चाहिए।”उनका यह वाक्य न केवल अनुभव की गहराई से उपजा था, बल्कि एक कलाकार की सच्चाई का प्रतीक भी था।
रेखा की आवाज़ और उनका काव्य-मय अंदाज़
रेखा की बातों में एक ऐसी पुरानी दुनिया की महक थी जिसे शब्दों में पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता। वे बोलती नहीं थीं—लग रहा था जैसे किसी मुगल-ए-आज़म की हवेली में धीमी-धीमी सरोद बज रही हो और उसी के सुरों में उनकी बातें बह रही हों। उन्होंने बताया कि उनका हर अनुभव, हर मोड़, और हर हिचक ने उन्हें धीरे-धीरे गढ़ा है। इसीलिए उनका यह वाक्य, “मैंने सीखा कि क्या नहीं करना चाहिए”, सिर्फ एक स्वीकारोक्ति नहीं था—यह एक कलाकार की गहराई से निकली सच्चाई थी।
‘उमराव जान’ की यात्रा – पर्दे से जीवन तक
रेखा ने बताया कि उमराव जान उनके लिए सिर्फ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि एक उम्रभर की साधना है। जिस दर्द, मोहब्बत और तहज़ीब से उमराव जिया था, रेखा ने उसे असल ज़िंदगी में महसूस किया है। उन्होंने कहा कि यह किरदार उन्हें अपने भीतर झाँकने की ज़रूरत बार-बार समझाता रहा—
“कभी-कभी कला आपको खुद से मिलाती है, और कभी खुद को सुधारना भी सिखाती है।”
ज़िंदगी की सीखें—गलतियों से निकली रोशनी
रेखा ने बड़ी विनम्रता से स्वीकार किया कि उनकी सबसे बड़ी सीखें उन्हीं पलों से आईं जो कठिन थे। उन्होंने हिम्मत से कहा कि ज़िंदगी के सफ़र में क्या करना है, यह तो हर कोई सीख लेता है—लेकिन जो बात उनसे धीरे-धीरे समझ आई, वह थी क्या नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा—“अगर इंसान अपनी भूलों को सम्मान से स्वीकार कर ले, तो वही भूलों का बोझ मोतियों में बदल जाता है।”उनके इन शब्दों में एक ऐसी परिपक्व शांति थी जिसे सुनकर पूरा सभागार स्थिर हो गया।
कला और संवेदना का रिश्ता—रेखा की अनकही दुनिया
रेखा ने बताया कि एक कलाकार के लिए संवेदना उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। उनकी आवाज़ में वह नर्मी थी जो सिर्फ उसी में होती है जिसने जीवन को कई रंगों में जिया हो।उन्होंने कहा कि जब इंसान जीवन को दिल से महसूस करता है, तो उसका दुख कविता बन जाता है, उसकी कमज़ोरी ताकत बन जाती है, और उसका अनुभव कला में ढल जाता है। उनकी बातें न किसी पुरस्कार की, न किसी उपलब्धि की—बल्कि उस यात्रा की थीं जिसमें वे खुद को हर दिन नए सिरे से समझती रही हैं।
रेड सी प्रीमियर—जहाँ रेखा ने समय को थाम लिया
जब रेखा ने मंच पर बोलना शुरू किया, तो कैमरों की चमक भी धीमी लगने लगी। हर चेहरा उनकी बातों को सुनने में खो गया। ऐसा महसूस हुआ जैसे उस हॉल में सिर्फ रेखा और उनके शब्द मौजूद हों।उनके हर वाक्य के साथ हवा में एक अद्भुत सुकून फैल रहा था—जैसे कोई दास्तान सुनाई जा रही हो, जिसके हर मोड़ पर कोई नई गहराई छिपी हो।
नई पीढ़ी के लिए एक सौम्य संदेश
रेखा का भाषण सिर्फ यादों का नहीं था—वह प्रेरणा का भी स्रोत था। उनकी विनम्रता और ईमानदारी ने यह संदेश दिया कि सफलता के पीछे कठोर अनुशासन, आत्मचिंतन और गलतियों का सम्मान होता है।उन्होंने मुस्कुराकर कहा—“सीखने की उम्र कभी खत्म नहीं होती। मैं आज भी सीख रही हूँ… और शायद यही वजह है कि मैं यहाँ खड़ी हूँ।”उनके इस वाक्य ने युवा कलाकारों को समझाया कि इस उद्योग में चमकते रहने के लिए भीतर का दीपक सबसे ज़रूरी है।
