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प्रेम और सेक्स को किया धारणाओं से मुक्त: Love Meaning
Love Meaning by Osho

Love Meaning: हमारे मनोविज्ञान में प्रेम शब्द सेक्स के साथ इस कदर जुड़ा है कि हम बिना सेक्स के प्रेम की कल्पना भी नहीं कर सकते, फिर वह प्रेम स्त्री-पुरुष के बीच हो या दो पुरुषों या स्त्रियों के बीच। हम मान ही नहीं सकते कि बिना सेक्स के प्रेम हो सकता है। प्रेम और सेक्स के संदर्भ में ओशो ने बहुत कुछ कहा है जो हमारी सोच को बदलता है।

Love Meaning: ग्लानि से उभारा- स्वामी आनंद ध्रुव

ओशो ने जीवन, प्रेम और सेक्स को जिस दृष्टिकोण से देखा और प्रस्तुत किया वह अतुलनीय है। अभी तक धर्म या अध्यात्म से जुड़े लोगों ने प्रेम/सेक्स को अछूत विषय मान कर छोड़ दिया था। इस विषय पर लोग या तो निंदा करते थे या फिर उपेक्षा करते थे। इतिहास में पहली बार इन विषयों की ओशो ने न तो निंदा की, न उपेक्षा की बल्कि डंके की चोट पर अपना विशद दृष्टिकोण रखा। इसका असर यह हुआ कि जो युवा लोग स्वाभाविक रूप से प्रेम और सेक्स के प्रति आकर्षित होते थे, अपने को धर्म या अध्यात्म के योग्य नहीं समझते थे, उनके मन में एक ग्लानि रहती थी, वे अपने को अयोग्य समझते थे। वे इन स्वाभाविक वृत्तियों को पाप समझते थे। ‘लंगोट के पक्के’ होना जरूरी समझते थे। इस गलतफहमी को ओशो ने दूर किया और उन लोगों को जीवन ऊर्जा, सेक्स ऊर्जा को रूपान्तरित करने और ऊर्ध्वगामी बनाने का आह्वान किया। उस युवा वर्ग में आस जगी, जो अभी तक स्वयं अपने को अछूत मानता था, पापी मानता था, ग्लानि से भरा था। ओशो ने मिट्टी को सोना बनाने की कला सिखाई, कोयले को हीरा बनाने की कला सिखाई।

सेक्स को निंदा से मुक्त किया- ओशो करुणेश

ओशो ने जीसस के वचन ‘दि लव इज गॉड के आगे गॉड इज लव की बात की। ओशो ने बार बार अपने प्रवचनों में यह दुहराया की अध्यात्म के पंछी के दो पंख होते हैं- ध्यान और प्रेम। अगर किसी ने ध्यान को साधा और उसके भीतर प्रेम का जन्म नहीं हुआ तो समझो ध्यान में कुछ कमी रह गयी। और दूसरी तरफ प्रेम के मार्ग पर चलकर ध्यान घटित न हो तो समझो प्रेम में कुछ कमी रह गयी। हां, ओशो ने जो सेक्स और प्रेम का मनोविज्ञान दिया है, वह अद्वितीय है, अनूठा है। इसलिए उन्होंने बदनामी की परवाह नहीं करते हुए, अपनी सबसे विवादित पुस्तक प्रवचनमाला का शीर्षक दिया ‘सम्भोग से समाधि की ओर,’ जबकि शीर्षक बड़ा साफ और तर्क संगत था और एक साधक के जीवन में उत्तरोतर ऊर्ध्वगमन का सार-सूत्र संकेत है। उन्होंने कहा परमात्मा के मार्ग पर जो पायदान हैं उनमें पहला पायदान सम्भोग है, जिस स्तर पर हम अभी जी रहे हैं। और हमारी दृष्टि आखिरी पायदान समाधि, भक्ति, प्रेम पर होनी चाहिए तभी हम अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं, प्रभु को पा सकते हैं, प्रभु से मिलकर एक हो सकते हैं, परम समाधि को उपलब्ध हो सकते हैं, परम आनंद को जान सकते हैं। हां अगर हमने पहले पायदान से दुश्मनी मोल ली और दमन का रास्ता इख्तियार किया तो हम प्रभु को नहीं पा सकते, जैसा की ज्यादातर साधु-संन्यासियों के साथ होता है। दूसरी तरफ ज्यादातार लोग जिन्हें हम संसारी कहते हैं, पहले पायदान पर ही अटक जाते हैं, अपना डेरा जमा लेते हैं। ये भी प्रभु के मार्ग पर आगे बढ़ने से चूक जाते हैं। इसीलिए ओशो ने कहा है, ‘न भोगो न भागो, वरन जागो।’ ओशो पृथ्वी पर एक अनूठे संत हुए जिन्होंने सेक्स को निंदा से मुक्त किया और संन्यास को सरलतम बनाया।

प्रेम और सेक्स का मनोविज्ञान दिया – मा ओशो अनु

ओशो प्रेम का मनोविज्ञान देते हुए बताते हैं कि मनुष्य की सभी भाषाओं में प्रेम सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शब्द है क्योंकि प्रेम की भाषा, अस्तित्वगत भाषा है। प्रेम के लिए भविष्य का कोई अस्तित्व है ही नहीं, केवल वर्तमान ही सामने रहता है। तुम इस क्षण में हो सकते हो, प्रेम में कोई योजना बनाना संभव ही नहीं है।
प्रेम, तुम्हारे अस्तित्व के गहनतम केंद्र में एक मौलिक परिवर्तन लाता है। सिर और बुद्धि तो परिधि पर है। बुद्धि सागर की लहरों जैसी है, प्रेम सागर की गहराई जैसा है। सागर की गहराई में वहां कोई लहरें नहीं हैं। जब तुम प्रेम के द्वारा देखते हो, तब तुम सत्य और वास्तविकता जैसी है, उसे यथार्थ रूप में जानते हो। प्रेम अस्तित्व के साथ मिलकर एक साथ सहभागिता में बरस रहा है।
प्रेम तुम्हें इतनी अधिक गहराई और श्रेष्ठता से तुष्ट करता है कि कोई भी कार्य अथवा कोई कलात्मक कार्य करने की जरूरत ही महसूस नहीं होती। प्रेम के साथ अहंकार रह ही नहीं सकता। प्रेम करना, परमात्मा ही बन जाना है। अगर तुम वास्तव में सच्चा प्रेम करते हो तो चेतना का एक शिखर निर्मित होता है। चमत्कारिक रूप से तुम्हारी चेतना में कुछ चीज बदल जाती है। प्रेम तुम्हें रूपांतरित कर देता है।
प्रेम एक ऊर्जा क्षेत्र है… वैज्ञानिक भी इससे सहमत हैं। और प्रेम में एक रूपांतरित कर देने वाली शक्ति है। वह तुम्हें भारहीन होने में सहायता करती है। वह तुम्हें पंख देती है तुम अनंत की ओर सभी के पार जा सकते हो। प्रेम एक दिव्य ऊर्जा है।
तुम भले ही धार्मिक हो या नहीं, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है। प्रेम मनुष्य के जीवन का केंद्रीय अनुभव बना ही रहता है। चमत्कारिक रूप से तुम्हारी चेतना में कुछ चीज बदल जाती है। प्रेम निम्न तल से उच्च तल की ओर ले जाता है। वह मनुष्य को दिव्यता में बदल देता है। प्रेम हमेशा परमानंद देता है। यह तुम्हारे और सर्वोच्च सत्ता के मध्य एक सेतु है।
सेक्स
सेक्स का मनोविज्ञान देते हुए ओशो समझाते हैं- प्रेम का प्राथमिक बिंदु सेक्स ही है और जो लोग सेक्स को घृणा के नजरिये से देखते हैं, वे कभी प्रेम कर ही नहीं सकते। संभोग और समाधि के बीच प्रेम एक सेतु है, एक यात्रा है, एक मार्ग है, समाधि जिसका अंतिम छोर है और संभोग इस सीढ़ी का पहला सोपान है।
सेक्स ऊर्जा का अधोगमन है, नीचे की तरफ बह जाना है। ब्रह्मïचर्य ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन है, ऊपर की ओर उठ जाना है।
ओशो सेक्स का विज्ञान समझाते हुए कहते हैं कि ‘संभोग में समाधि की झलक का स्मरण रखें और उस बिंदु को पकड़ने की कोशिश करें। उस बिंदु को जो विद्युत की तरह संभोग के बीच में चमकती है, समाधि की एक क्षण को जो चमक आती है और विदा हो जाती है। उस बिंदु को पकड़ने की कोशिश करें कि वह क्या है। उसको पकड़ लें कि वह क्या है। और एक दफा उसे आपने पकड़ लिया तो उस पकड़ में आपको दिखाई पड़ेगा कि उस क्षण में आप शरीर नहीं रह जाते- बॉडीलेसनेस। उस क्षण में आप शरीर नहीं हैं। उस क्षण में एक झलक की तरह आप कुछ और हो गए। आप आत्मा हो गए। वह झलक आपको दिखाई पड़ जाए तो फिर उस झलक के लिए ध्यान के मार्ग में श्रम किया जा सकता है। उस झलक को फिर ध्यान की तरह से पकड़ा जा सकता है और अगर वह ज्ञान हमारे जानने और जीवन का हिस्सा बन जाए तो आपके जीवन में सेक्स की कोई जगह नहीं रह जाएगी। कामवासना भी परमात्मा के साथ जुड़ने का एक मार्ग बन जाएगी।’

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