लॉकडाउन में करवाया सुरक्षित प्रसव

यह कहानी भी लॉकडाउन में एक महिला के सुरक्षित प्रसव की है जोकि एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने ही करवाया और जिनका नाम है प्रियंका मिश्र। प्रियंका, मध्य प्रदेश, सीधी जिले के बंजारी सेक्टर की आंगनवाड़ी केंद्र क्रमांक 4 में कार्यरत हैं। हुआ यह कि इनके गांव की एक लड़की की ससुराल रायबरेली है। लेकिन उनके परिवार में केवल उसके पति ही उनके समीप थे और वह उसकी गर्भावस्था के दौरान देखभाल नहीं कर सकते थे। इसलिए वह अपनी पहली डिलीवरी के लिए अपने मायके आ गई। जब प्रियंका को यह पता चला तो उन्होंने उससे बातचीत की और पाया कि उसकी ससुराल में उसे डिलीवरी से पूर्व होने वाला कोई उपचार जैसे टीकाकरण या दवाइयां ,खून की जांच गर्भ में जोखिम का परीक्षण आदि ऐसी कोई सी भी टेस्टिंग नहीं हुई थी। ऐसी परिस्थिति में प्रसव से पहले उन्होंने सभी सेवाएं उपलब्ध करायीं। आशा कार्यकर्ता और एएनएम की मदद से उस महिला का सुरक्षित प्रसव भी करवाया। यही नहीं प्रियंका ने सब जरूरी सुविधाएं भी मुहैया करवाया ताकि उसे योजना का लाभ मिल सके। लेकिन उसी दौरान प्रियंका के ससुर की अप्रैल में मृत्यु हो गई। अपने काम की प्राथमिकता को देखते हुए, उन्होंने वहां न जाने का निर्णय लिया। प्रियंका बताती हैं कि उनके पति कहीं दूर जॉब करते हैं और उनके पास केवल उनका एक बेटा है। उन्होंने अपने बेटे को भी अपने गांव नहीं जाने दिया। उनका बेटा केवल 5 साल का है इसलिए वह जब भी काम पर जाती हैं तो अपने बेटे को भी अपने साथ ही लेकर जाती हैं। परिवार और समुदाय दोनों को संभालने की ताकत एक महिला में ही अच्छे से हो सकती है, उन्होंने इस बात को साबित भी किया। गांव में जो भी लोग बाहर से लौटे थे उनमें से कुछ परिवार बहुत गरीब थे। प्रियंका ने उनके लिए राशन उपलब्ध करवाया और उन्हें क्वारेंटाईन भी किया। आज पूरा गांव सुरक्षित है।

कोरोना से संक्रमित मां की करवाई डिलीवरीबहादुरी की दी मिसाल

यह किस्सा मध्य प्रदेश, मंदसौर के बोतलगंज इलाके का है। एक महिला जोकि गर्भवती थी और साथ ही वह वायरस के द्वारा संक्रमित भी थी। तब न केवल गर्भवती महिला बल्कि उसका पूरा परिवार उसकी व बच्चों (जुड़वा) की सेहत के लिए चिंतित थे। उस समय उन्हें किसी ऐसे सहारे की आवश्यकता थी जो न केवल महिला का इलाज कर सके बल्कि उन्हें समय-समय पर गाइड भी करता रहे। ऐसे समय में इस महिला का सहारा बनीं रेखा चौहान जोकि इस इलाके की आंगनवाड़ी केंद्र की सुपरवाइजर हैं। सेक्टर में आंगनवाड़ी केंद्र से जुड़े एक गर्भवती महिला का नियमित फॉलो किया जा रहा था उस महिला के घर में जुड़वा बच्चे थे और मामला काफी संवेदनशील था। इसलिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ता दुर्गा नाथ (सेक्टर सुपरवाइजर) के साथ 

स्वयं फौलो अप ले रही थीं। जब डिलीवरी का समय पास आया तो संबंधित महिला की तबीयत काफी बिगड़ गई और उसे मंदसौर ले जाया गया। वहां उसकी रिपोर्ट कोरोना पोजिटिव आई। यह काफी मुश्किल दौर था। दोबारा तबीयत काफी बिगड़ गई थी। इस दौरान उन्होंने एक बेटे व एक बेटी को जन्म दिया। लेकिन दुर्भाग्यवश महिला की जान नहीं बच पाई। इस दौरान बच्चों की जिम्मेदारी उनकी नानी ने उठाई और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने गांव में बच्चों को बकरी के दूध की व्यवस्था की, व बच्चों का टीकाकरण भी करवाया व नियमित फौलोअप किया गया। अब दोनों बच्चे सुरक्षित हैं। साथ ही गांव के सभी लोग नेगेटिव आये।

अंधेरी जिंदगी में रोशनी की किरण

‘खुद से जीतने की जि़द है, मुझे खुद को ही हराना हैमैं भीड़ नहीं हूं दुनिया की, मेरे अंदर एक ज़माना है। खुद के लिए एक मुकम्मल जहां की चाहत कहीं न कहीं हर दिल में बसी होती है, मगर बात जब दूसरों के आंसू पोंछने की आती है या बात जब गुमनामी की जिंदगी गुज़ार रही सूनी आंखों को अपने अहसास से रोशन करने की आती है, तो उस वक्त अपने कदमों को आगे बढा़कर किसी जरूरतमंद का हाथ थामने वाले लोगों की गिनती उंगलियों पर आसानी से की जा सकती है, क्योंकि ऐसी बुलंद सोच हर किसी के बस की बात नहीं। कोमल हृदय, मिलनसार स्वभाव और चेहरे पर तेज किसी की भी शख्सियत को खुद-ब-खुद बयां कर देता है। मन में कुछ कर गुज़रने का जुनून जिस पर हर वक्त सवार रहता है, जरूरतमंद की मदद करना जिसे अपना मजहब लगता है, जिदंगी की सच्चाइयों को बेहद करीब से देखने वाली ऐसी शख्सियत हैं- स्मिता भारती। स्मिता जी को बचपन से ही लिखने का बेहद शौक है और वो एक मंजी हुई थिएटर आर्टिस्ट भी हैं, जो उनके दिल के बेहद करीब है। सन् 1992 में साक्षी नाम की एनजीओ की बुनियाद रखी गई। जो घरेलू हिंसा, चाइल्ड एब्यूज और सेक्सुअल हरासमेंट जैसे ज्वलंत मुद्दों पर काम कर रही थीं। उसी दौरान साक्षी ने एक  प्ले के सिलसिले में स्मिता जी से सम्पर्क किया और फिर देखते ही देखते वो साक्षी का हिस्सा बन गईं। साक्षी के साथ सालों पहले शुरू हुआ ये सफर $ख्वाबों से पहले, दूसरों की जरूरतों के तकसीम होने की ताबीर लिखने से शुरू हुआ। इस इदारे से जुड़ने के बाद स्मिता जी को मानो ऐसा लगा कि जो वो जिंदगी से चाहती थीं, उन्हें जिंदगी ने वो सब कुछ दे दिया। उन्होंने महिलाओं के मौजूदा हालात को सुधारने के लिए कई कार्य किए, जिसकी बदौलत आज सैकड़ों लोग इस इदारे से जुड़ चुके हैं। स्मिता जी ने विशाखा गाईडलाइन्स और चाईल्ड स्पेशल एब्यूज के लिए काम किया। इसके अलावा जैंडर इकवैलिटी ला को लेकर भी वो पूरे साहस के साथ आगे बढ़ीं और महिलाओं को उनका हक दिलाया। स्मिता भारती जी ने साक्षी से पहले तिहाड़ जेल में भी बतौर स्टोरी टेलर तकरीबन आठ साल तक काम किया, जहां उन्होंने कैदियों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए, कहानियों को बुना और उन्हें जीवन जीने की कला सिखाई। काम के प्रति उनकी गंभीरता, समर्पण और जदीद हौंसला मानो हर चीज़ इनके किरदार में साफ-साफ नज़र आती है, लेकिन कहते हैं न कमाल को भी इज़हार की दरकार है और उनकी इस कोशिश में खुदा ने भी उनका पूरा साथ दिया। समाज के लिए नेक काम कर रही स्मिता का मकसद लोगों को न सिर्फ उनके हक से वाकिफ करवाना है बल्कि उनके हक के लिए लड़ना और उन्हें उनका हक दिलाना भी है। ये एक ऐसी शख्सियत हैं, जिसकी नज़र अपने मकसद पर पूरी तरह से टिकी हुई है। साक्षी की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट नैना कपूर और जर्नलिस्ट जगजीत पूरेवाल ने मिलकर की थी, जिसे बाद में स्मिता भारती के सुपूर्द कर दिया गया। फिलहाल, साक्षी की बागडोर पूरी तरह से स्मिता जी के हाथों में है, जो अपने भरसक प्रयासों की बदौलत महिलाओं को उनका हक दिलवाने में कामयाब साबित हो रही हैं।

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