शक्ति आराधना में महाराष्ट्र का अपना विशेष महत्त्व है, क्योंकि यहां मां दुर्गा के साढ़े तीन पीठ हैं जो जागृत धार्मिक स्थलों के रूप में प्रसिद्घ हैं। इन देवी मंदिरों की भव्यता एवं मान्यता देखते ही बनती है-

प्रथम शक्तिपीठ- श्री महालक्ष्मी माता मंदिर (कोल्हापुर) 

महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में से पहले शक्तिपीठ के रूप में कोल्हापुर में स्थित श्री महालक्ष्मी देवी के मंदिर को स्थान दिया गया है। दो मंजिला इस मंदिर का निर्माण कोल्हापुर के आसपास पाए जाने वाले काले पत्थरों से किया गया है। मंदिर में स्थापित महालक्ष्मी देवी की मूर्ति की ऊंचाई 1.22 मीटर है और इस मूर्ति को 0.91 मीटर ऊंचे पत्थर के चबूतरे पर खड़ा किया गया है। मंदिर के आसपास रहने वालों का कहना है कि कार्तिक तथा माघ माह में महालक्ष्मी देवी के मंदिर में सूर्य की किरणें महाद्वार से मंदिर में प्रवेश करके मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचती हैं और वहां से वे महालक्ष्मी देवी पर पड़ती हैं, सूर्य की किरणें पहले महालक्ष्मी देवी के चरणों में पहुंचती हैं और बाद में वे वहां से धीरे-धीरे महालक्ष्मी देवी के चेहरे तक पहुंचती हैं। 

इस मंदिर की स्थापना इस तरह की गई है कि हर वर्ष केवल दो दिन ही सूर्य की किरणें महालक्ष्मी देवी के शरीर का स्पर्श करती हैं।  

द्वितीय शक्तिपीठ- श्री रेणुका माता (माहुर)

श्री परशुराम जी की माता के रूप में पहचानी जाने वाली रेणुका माता महाराष्ट्र के कई परिवारों की कुलदेवी भी हैं। रेणुका माता का यह मंदिर 13वीं शताब्दी में देवगिरी के यादव कालीन राजा द्वारा स्थापित किया गया बताया जाता है। माहुरगढ़ में ही श्री दत्तात्रय का जन्म हुआ था, ऐसी दंतकथा भी इस मंदिर से जुड़ी हुई है। इस मंदिर के बारे में प्रचलित एक कथा के अनुसार माता पार्वती ने कुब्ज देश के राजा के यहां जन्म लिया। राजा ने अपनी पुत्री का नाम रेणु रखा। शंकर का अवतार माने जाने वाले जमदग्नि ऋषि के साथ रेणुका का विवाह हुआ। जमदग्नि के आश्रम में अनेक शिष्य अध्ययन करते थे। सभी की मनोकामना पूर्ण करने वाली कामधेनु गाय जमदग्नि ऋषि के पास थी। राजा सहस्त्रार्जुन को कामधेनु गाय के प्रति मोह हो गया। राजा ने जमदग्नि ऋषि से कामधेनु मांगी। ऋषि ने उन्हें कामधेनु देने से मना कर दिया। सहस्त्रार्जुन ने उनके आश्रम पर हमला कर जमदग्नि ऋषि को मार डाला और कामधेनु को अपने कब्जे में ले लिया। उसके बाद जमदग्नि के पुत्र परशुराम वहां आए और आश्रम में हुई घटना को देखकर परशुराम ने क्षत्रियों के समूल नाश करने की प्रतिज्ञा की। किंतु इससे पूर्व पिता को अग्नि देने के लिए कोरी भूमि चाहिए थी, इधर-उधर भटकने के बाद अंत में वह माहुरगढ़ पहुंचा जहां पहुंचने के बाद वहां रहने वाले दत्तात्रय ने परशुराम को कोरी भूमि दिखायी और परशुराम से कहा कि यहीं अपने पिता का अंतिम संस्कार करो। परशुराम ने बाण मारकर मातृतीर्थ तथा सर्वतीर्थ का निर्माण किया।      तीर्थ के पानी से अपने पिता जमदग्नि ऋषि के पार्थिव शरीर को नहलाकर उनका अंतिम संस्कार किया। पति के साथ रेणुका देवी ने भी अपना जीवन समाप्त कर लिया। अंतिम संस्कार की विधि  दत्तात्रेय ने की। परशुराम को अपनी मां रेणुका की याद सताने लगी। वह दुखी होकर शोक करने लगा, इसी वक्त आकाशवाणी हुई कि तुम्हारी मां जमीन पर आकर तुम्हे दर्शन देगी, सिऌर्फ तुम पीछे मत देखना, लेकिन अपनी मां को तुरंत देखने की परशुराम की उत्सुकता इतनी ज्यादा बढ़ गई कि उसने पीछे मुड़कर देखा, उस वक्त रेणुका माता का केवल मुंह ही जमीन से बाहर आया था, इसलिए परशुराम को सिर्फ अपनी माता का मुख ही दिखायी दिया, इसलिए माहुर में सिर्फ रेणुका माता के मुख की ही पूजा होती है। परशुराम को अपनी माता के दर्शन पहाड़ी पर हुए, इसलिए उस पहाड़ी को मातापुर नाम दिया गया।  

तृतीय शक्तिपीठ- श्री तुलजाभवानी माता (श्री क्षेत्र तुलजापुर)

महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में श्री तुलजाभवानी देवी का तुलजापुर क्षेत्र एक पूर्ण शक्तिपीठ है। यह देवी भगवती (भवानी) के रूप में प्रसिद्ध है। स्वराज्य संस्थापक छत्रपति शिवछत्रपति की कुलदेवी के रूप में स्थापित हैं तुलजा भवानी। मंदिर का कुछ हिस्सा हेमाडपंथी शैली में बनाया गया है। इतिहासकारों तथा पुरात्वविदों के अनुसार यह मंदिर राष्ट्रकूट या यादवकालीन माना जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि यह मंदिर 17वीं या 18वीं  शताब्दी का है। छत्रपति शिवाजी अपने प्रत्येक युद्घ से पूर्व माता से आशीर्वाद प्राप्त करने यहां आते थे।

एक प्रचलित कथानुसार कृतयुग में करदम नामक एक ब्राह्मण साधु थे, जिनकी अनुभूति नामक अत्यंत सुंदर व सुशील पत्नी थी। जब करदम की मृत्यु हुई तब अनुभूति ने सती होने का प्रण किया, पर गर्भवती होने के कारण उन्हें यह विचार त्यागना पड़ा तथा मंदाकिनी नदी के किनारे उन्होंने तपस्या प्रारंभ कर दी। इस दौरान कूकर नामक राजा अनुभूति को ध्यान मग्न देखकर उनकी सुंदरता पर आसक्त हो गया तथा अनुभूति के साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया। इस दौरान अनुभूति ने माता से याचना की और मां अवतरित हुईं। मां के साथ युद्ध के दौरान कूकर एक महिष रूपी राक्षस में परिवर्तित हो गया और महिषासुर कहलाया। मां ने महिषासुर का वध किया और यह पर्व ‘विजयादशमी’ कहलाया। मां भवानी देवी अनुभूति की पुकार सुन उसकी रक्षा हेतु तुरंत प्रकट हुई थीं, इसलिए मां को ‘त्वरिता’ नाम से भी जाना जाता है, जिसे मराठी में तुलजा भी कहते हैं।

अर्ध शक्तिपीठ- सप्तशृंगी देवी (नासिक) 

जगदंबा देवी के 51 शक्तिपीठ हैं, इन शक्तिपीठों में से महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती इन तीनों स्थानों के त्रिगुणात्मक, साक्षात् ब्रह्मस्वरूपिणी धर्मपीठ, ओंकार स्वरूप अधिष्ठान अर्थात् सप्तशृंगी गढ़ पर स्थित मां सप्तशृंगी देवी का जागृत मंदिर है।   

सप्तशृंगी देवी की महत्ता प्राचीन काल से ही सुनने को मिलती रही है। उत्तर काल में संत निवृत्तीनाथ, संत ज्ञानेश्वर, पेशवा की सरकार, दाभाडे, होलकर आदि देवी भक्तों का इस शक्तिपीठ से बहुत निकट का संबंध था, ऐसा बताया जाता है। इस पवित्र मंदिर के आसपास सघन जंगल है। सप्तशृंगी देवी के साथ-साथ गढ़ पर सूर्यकुंड, जलगुफा, शिवतीर्थ, तांबुलतीर्थ, मार्कण्डेय ऋषि का मठ जैसे पवित्र तीर्थस्थल हैं। सप्तशृंग गढ़ पर पर्व काल तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। गढ़ पर गुढीपाडवा, चैत्रोत्सव, जन्माष्टमी, नवरात्र, कोजागिरी, लक्ष्मीपूजन जैसे महत्त्वपूर्ण उत्सव हर वर्ष हर्षोल्लास तथा भक्तिभाव से मनाए जाते हैं। 

शुंभ-निशुंभ तथा महिषासुर जैसे राक्षसों का विनाश करने के बाद तप, ध्यान करने के लिए देवी ने पहाड़ी पर कुछ दिनों तक निवास किया। सह्याद्री के ऊंची पहाड़ी पर सात शिखर हैं, इसीलिए इस स्थान का नाम सप्तशृंगगढ़ पड़ गया। यह स्थल देवी मूल पीठ माना जाता है। मंदिर में स्थापित सप्तशृंगी देवी की मूर्ति 18 हाथों वाली है। सप्तशृंगी देवी को श्री ब्रह्मस्वरूपिणी देवी भी कहते हैं। ब्रह्मा जी के कमंडल से निकली गिरिजा महानदी का दूसरा रूप सप्तशृंगी देवी हैं। नासिक के तपोवन में भगवान श्रीराम, सीता माता तथा लक्ष्मण जी जब वनवास के लिए आए थे, उस वक्त उन्होंने सप्तशृंगी देवी का दर्शन किए थे, ऐसी आख्यायिका है।

इस स्थान पर शारदीय नवरात्र और चैत्रीय नवरात्र पर भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है।  

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