यहां श्री कृष्ण को अपना बिजनेस पार्टनर बनाते हैं लोग, हर मनोकामना होती है पूरी: Sanwariya Seth Temple
Sanwariya Seth Temple

Sanwariya Seth Temple: कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों से हमेशा जुड़े रहते हैं। भक्त उनसे जो भी मांगते हैं, वे उनकी इच्छा पूरी कर देते हैं। अपने भक्तों की हर एक मनोकामना पूरी करने वाले ऐसे ही श्रीकृष्ण विराजे हैं राजस्थान के सुप्रसिद्ध सांवलिया सेठ मंदिर में। यह मंदिर विश्व प्रसिद्ध है। दुनिया भर के लोग यहां श्रीकृष्ण को सांवलिया सेठ के रूप में पूजते हैं और उनके दर्शन करने आते हैं। सांवलिया सेठ की महिमा इतनी खास है कि लोग उन्हें अपना बिजनेस पार्टनर तक बनाते हैं।  

इसलिए श्रीकृष्ण को कहा जाता है ‘सेठ’

Sanwariya Seth Temple
The temple of Sanwaliya Seth is situated in Chittorgarh.

सांवलिया सेठ का मंदिर चित्तौड़गढ़ में स्थित है। किवदंतियों के अनुसार सांवलिया सेठ की इसी मूर्ति की पूजा मीरा बाई गिरधर गोपाल के रूप में करती थीं। मीरा बाई अक्सर संतों के साथ भजन कीर्तन करती हुई भ्रमण करती थीं। इस दौरान उन्हें पता चला कि दयाराम नामक एक संत के पास भी उन्हीं की तरह कृष्ण की मूर्तियां हैं। और वह उन्हीं की मंडली के साथ भजन करने लगीं। एक बार मुगल शासक औरंगजेब की सेना मंदिरों को ध्वस्त करती हुई मेवाड़ तक आ पहुंची। जब मुगलों को इन कृष्ण मूर्तियों के बारे में पता चला तो वे इन्हें खोजने लगे। इस​की जानकारी जब संत दयाराम को हुई तो उन्होंने मूर्तियों को बागुंड-भादसौड़ा में एक वट वृक्ष के नीचे ​जमीन में गाड़ दिया। कहा जाता है कि 1840 में मंडफिया गांव के एक निवासी भोलाराम गुर्जर को इन मूर्तियों को लेकर सपना आया। जिसके बाद वट वृक्ष के नीचे उसी स्थान पर खुदाई की गई। खुदाई में वहां एक जैसी चार कृष्ण मूर्तियां मिलीं, हालांकि इन मूर्तियों के आकार में अंतर था। तब सर्वसम्मति से सबसे बड़ी मूर्ति को भादसोड़ा लाया गया। यहां मेवाड़ राजपरिवार के भींडर ठिकाने ने सांवलिया जी का मंदिर बनवाया और मूर्ति की यहां प्राण प्रतिष्ठा की। मंझली मूर्ति को उसी स्थान पर विराजित किया गया, जहां से ये प्रकट हुई थी। सबसे छोटी मूर्ति को ग्वाले भोलाराम के गांव मंडफिया में विराजा गया। चौथी मूर्ति खुदाई के दौरान खंडित हो गई थी, इस कारण उसे वापस उसी स्थान पर पधरा गया। सांवलिया को सेठ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वे भक्तों को सूद समेत चढ़ावा लौटा देते हैं।

इसलिए बनाते हैं सेठ को बिजनेस पार्टनर

भक्त सांवलिया सेठ को सच्चे मन से जितना देते हैं, सेठ उन्हें उससे कई गुणा वापस लौटा देते हैं।
Whatever the devotees give to Sanwaliya Seth with a true heart, Seth returns them many times more than that.

कहा जाता है कि भक्त सांवलिया सेठ को सच्चे मन से जितना देते हैं, सेठ उन्हें उससे कई गुणा वापस लौटा देते हैं। यही कारण है कि सांवलिया सेठ की व्यापार जगत में बहुत ख्याती है। व्यापारी यहां सांवलिया सेठ को अपना बिजनेस पार्टनर बनाते हैं। इतना ही नहीं अनगिनत लोगों ने सांवलिया सेठ को नियमित अपनी प्रतिमाह की कमाई के हिस्से में पार्टनर बना रखा है। कहा जाता है कि अगर सच्चे मन से सांवलिया सेठ से कुछ मांगा जाता है तो वे उसे जरूर लौटाते हैं। इतना ही नहीं ​आप सेठ को जितना चढ़ाते हैं, उससे कई गुणा वह आपको लौटा देते हैं। यही कारण है कि हर साल इस मंदिर को करोड़ों का दान मिलता है।  

कैसे पहुंचे सांवलिया सेठ मंदिर

सांवलिया सेठ का मंदिर करीब 450 साल पुराना है। चित्तौड़गढ़ में विराजित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए आप ट्रेन से सफर कर सकते हैं। यह चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन से करीब 40 किलोमीटर की दूरी पर है। वहीं इसके सबसे नजदीक उदयपुर का डबोक एयरपोर्ट है, जो यहां से करीब 65 किलोमीटर दूर है। जयपुर से यह मंदिर करीब 338 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 

मैं अंकिता शर्मा। मुझे मीडिया के तीनों माध्यम प्रिंट, डिजिटल और टीवी का करीब 18 साल का लंबा अनुभव है। मैंने राजस्थान के प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थानों के साथ काम किया है। इसी के साथ मैं कई प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबों की एडिटर भी...