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बच्चों को सुरक्षा देने के चक्कर में माता पिता उन्हें अधिकार देना भूल जाते हैं। यही है पीकॉक पेरेंटिंग। इस पेरेंटिंग का बच्चों पर पॉजिटिव की जगह नेगेटिव असर पड़ता है।
Peacock Parenting: यह बात बिलकुल सही है कि बच्चों के लिए माता पिता से बेहतर कोई नहीं सोच सकता। लेकिन कभी-कभी पेरेंट्स का यही प्यार बच्चों के लिए बंधन बन जाता है। बच्चों को सुरक्षा देने के चक्कर में माता पिता उन्हें अधिकार देना भूल जाते हैं। यही है पीकॉक पेरेंटिंग। इस पेरेंटिंग का बच्चों पर पॉजिटिव की जगह नेगेटिव असर पड़ता है। जिससे वे कई परेशानियों का सामना करते हैं।
क्या नार्सिसिस्टिक हो सकते हैं पेरेंट्स

यह बात बहुत अजीब है लेकिन कई बार पेरेंट्स भी नार्सिसिस्टिक हो सकते हैं। पीकॉक पेरेंटिंग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसमें पेरेंट्स बच्चों को अपनी मर्जी से कुछ नहीं करने देते। बल्कि उन्हें हमेशा अपनी इच्छा के अनुसार चलने के लिए प्रेरित करते हैं। कई मनोचिकित्सक इसे ‘सेल्फिश पेरेंटिंग’ कहते हैं। क्योंकि इसमें पेरेंट्स बच्चों के सपनों को अनदेखा करके अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में जुटे रहते हैं।
ऐसे चर्चा में आई यह पेरेंटिंग स्टाइल
पीकॉक पेरेंटिंग उस समय चर्चा में आई जब ब्रिटिश मनोचिकित्सक कैथलीन सैक्सटन ने अपनी किताब ‘माई पैरेंट द पीकॉक: डिस्कवरी एंड रिकवरी फ्रॉम नार्सिसिस्टिक पेरेंटिंग’ में इसका जिक्र किया। जिसके बाद से लोगों ने इसपर ध्यान दिया। ऐसे पेरेंट्स हमेशा अपने बच्चों को पढ़ाई और अन्य क्षेत्रों में अव्वल रहने के लिए बहुत ज्यादा प्रेशर करते हैं। इसके बदले में वे बच्चों से प्रशंसा की उम्मीद भी करते हैं। वे चाहते हैं कि जो रास्ते उन्होंने अपने बच्चों के लिए चुने हैं, बच्चे उसके लिए हमेशा उनके आभारी रहें।
कहीं आप तो नहीं हैं पीकॉक पेरेंट
मेयो क्लिनिक के अनुसार नार्सिसिस्टिक पर्सनालिटी डिसऑर्डर एक मानसिक स्वास्थ्य स्थिति है। इससे पीड़ित लोग खुद को बहुत महत्व देते हैं। कई बार पेरेंट्स को इस बात की जानकारी ही नहीं होती है कि वे पीकॉक पेरेंटिंग कर रहे हैं। ऐसे में अनजाने में वे बच्चों की इच्छाओं को मार देते हैं। उन्हें समझने की जगह, अपने टारगेट देना शुरू कर देते हैं। ट्रॉमा कोच कैंडिस तमारा ने अपने एक वीडियो में बताया कि कैसे कुछ लक्षणों से आप पीकॉक पेरेंटिंग को पहचान सकते हैं।
1. नहीं लेते जिम्मेदारी
पीकॉक पेरेंट्स जिम्मेदारी लेने से बचते हैं। अगर उनके कारण कोई गलती भी होती है तो भी वे माफी नहीं मांगते। न ही वास्तविकता को स्वीकार करते हैं। उनके अपने तर्क होते हैं, जिन्हें वे सही मानते हैं। ऐसे पेरेंट्स न अपनी गलती मानते हैं और न ही कमियों को स्वीकार करते हैं।
2. गैसलाइटिंग में माहिर
गैसलाइटिंग में माहिर होते हैं पीकॉक पेरेंट्स। वे अपनी बातों से बच्चों को हमेशा भ्रमित करते हैं। अगर बच्चा कोई फैसला लेते हैं तो ऐसे पेरेंट्स बच्चों को यह महसूस करवाते हैं कि वे गलत थे। ऐसे में बच्चों का आत्मविश्वास कम होने लगता है।
3. नहीं मानते कोई सीमाएं
पीकॉक पेरेंट्स कभी भी सीमाओं का ध्यान नहीं रखते। वे बच्चों को कोई प्राइवेसी नहीं देते हैं। वे उनपर पूरा हक समझते हैं और उन्हें कोई फैसला नहीं लेने देते हैं। अगर बच्चे उनकी सीमाएं बताते हैं तो पेरेंट्स इसे अनादर मानने लगते हैं। इसे विद्रोह मानते हैं।
4. बच्चों के समय की चाहत
पीकॉक पेरेंट्स अपने बच्चों के समय पर भी अपना पूरा हक समझते हैं। अगर बच्चा उनके बताए रास्ते पर नहीं चलता है तो उन्हें लगता है कि वह समय बर्बाद करता है। ऐसा सिर्फ बच्चों के लिए नहीं होता, बल्कि वयस्क होने पर भी माता पिता ऐसा ही सोचते हैं।
