Early Testing for Better Growth in Preterm Babies
Early Testing for Better Growth in Preterm Babies

Overview:प्रीटर्म बेबीज़ में न्यूट्रिशन की कमी: कैसे टेस्ट दिला सकते हैं उन्हें लाइफ की सही शुरुआत

समय से पहले जन्मे बच्चों में पोषण की कमी एक आम लेकिन गंभीर चुनौती है। गर्भावस्था के अंतिम हफ्तों में बनने वाले ज़रूरी पोषक तत्व—जैसे आयरन, विटामिन, कैल्शियम, ग्लूकोज़ और ज़िंक—इन शिशुओं में अक्सर कम होते हैं। इससे उनके विकास, वजन, मेटाबॉलिज़्म और ब्रेन ग्रोथ पर असर पड़ता है।

World Prematurity Day: समय से पहले जन्मे बच्चे यानी प्रीटर्म शिशु अक्सर कई स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करते हैं, जिनमें सबसे बड़ी चुनौती है—पोषण की कमी। गर्भावस्था के अंतिम हफ्तों में शिशु के शरीर में आयरन, कैल्शियम, विटामिन और अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्व जमा होते हैं, लेकिन प्रीटर्म बच्चों को यह समय पूरा नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप उनके विकास, प्रतिरोधक क्षमता, दिमागी वृद्धि और समग्र स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।
सही समय पर किए गए लैब टेस्ट इन कमियों का जल्दी पता लगाकर डॉक्टरों को सही दिशा में इलाज शुरू करने में मदद करते हैं, जिससे शिशु को स्वस्थ विकास की मजबूत नींव मिलती है।

प्रीटर्म शिशुओं में पोषण की कमी कई कारणों से अधिक देखी जाती है

Early Testing for Better Growth in Preterm Babies
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प्रीटर्म शिशुओं में पोषण की कमी कई कारणों से होती है। गर्भावस्था की आखिरी तिमाही में आयरन, कैल्शियम, विटामिन और मिनरल्स का संग्रह होता है, लेकिन समय से पहले जन्म के कारण ये पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाते। तेज़ विकास के कारण इन्हें सामान्य शिशुओं की तुलना में अधिक पोषण की जरूरत पड़ती है। ग्लूकोज़ का स्तर भी अस्थिर रहता है—कमी होने पर हाइपोग्लाइसीमिया और ज्यादा मिलने पर हाइपरग्लाइसीमिया का खतरा बढ़ जाता है। विटामिन D, विटामिन A और ज़िंक जैसी माइक्रोन्यूट्रिएंट की कमी आम है, जिसका असर हड्डियों, फेफड़ों, दृष्टि, त्वचा और संपूर्ण विकास पर पड़ता है। इसके अलावा, इन शिशुओं की पाचन प्रणाली पूरी तरह विकसित नहीं होती, जिससे पोषक तत्वों का अवशोषण भी कम हो जाता है।

लैब टेस्ट कैसे करते हैं शुरुआती चरण में पोषण की कमी का पता

आधुनिक मेडिकल टेस्ट प्रीटर्म शिशुओं में पोषक तत्वों की कमी को बहुत जल्दी पहचानने में मदद करते हैं, भले ही बच्चा अभी लक्षण न दिखा रहा हो। मेटाबोलिक प्रोफाइलिंग ऊर्जा स्तर, ग्लूकोज़ बैलेंस और मेटाबोलिक फंक्शन का शुरुआती संकेत देती है, जबकि ग्लूकोज़ मॉनिटरिंग हाइपोग्लाइसीमिया और हाइपरग्लाइसीमिया दोनों को रोकने में सहायक है। विटामिन A, D, E, K और B-कॉम्प्लेक्स के टेस्ट यह बताते हैं कि किस विटामिन की कितनी सप्लाई ज़रूरी है। वहीं मिनरल्स और इलेक्ट्रोलाइट्स—कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, सोडियम और पोटैशियम—के टेस्ट न्यूरोलॉजिकल विकास, बोन हेल्थ और फ्लूड बैलेंस को ट्रैक करते हैं। जिंक और आयरन की जांच से एनीमिया, विकासगत समस्याओं और स्किन रैशेज का जोखिम समय रहते पकड़ा जा सकता है। इसके साथ ही, साप्ताहिक ग्रोथ मॉनिटरिंग—वजन, लंबाई, सिर का घेराव और फीडिंग पैटर्न—किसी भी नकारात्मक ट्रेंड को जल्दी पकड़कर पोषण योजना को सही दिशा देने में मदद करती है।

Input By-

डॉक्टर वर्षा बिरला हेड ऑफ़ डिपार्मेंट, क्लिनिकल बायोकेमेस्ट्री, ग्लोबल रेफरेंस लैब,मैट्रोपोलिस हेल्थ केयर लिमिटेड

मेरा नाम मोनिका अग्रवाल है। मैं कंप्यूटर विषय से स्नातक हूं।अपने जीवन के अनुभवों को कलमबद्ध करने का जुनून सा है जो मेरे हौंसलों को उड़ान देता है।मैंने कुछ वर्ष पूर्व टी वी और मैग्जीन के लिए कुछ विज्ञापनों में काम किया है । मेरा एक...