Silent Stress in Children
Silent Stress in Children Credit: Istock

Summary: बच्चों का अनकहा तनाव समझें

बच्चे अक्सर ऐसा तनाव महसूस करते हैं जिसे वे शब्दों में नहीं कह पाते। यह साइलेंट स्ट्रेस उनके व्यवहार, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास पर गहरा असर डालता है।

Silent Stress in Children: अक्सर बड़े लोगों को लगता है बच्चे को क्या परेशानी हो सकती है। उसे समय पर अच्छा खाना, खेलना और कपड़े सब मौजूद हैं। ऐसे में बच्चा क्यों ही तनाव में आएगा। लेकिन बच्चों के अंदर भी कई ऐसी अनकही बातें या भावनाएं होती हैं जो उनके अंदर तनाव का कारण बनती है। हम बड़े अपने भावनाओं को शब्दों में एक-दूसरे को बताकर अपना तनाव कम कर लेते हैं, लेकिन बच्चे ऐसा नहीं कर पाते। वह अपने डर, उलझन और भावनाओं को नहीं बता पाते। आइए जानते हैं इस आर्टिकल में आप किस तरह अपने बच्चों के अनकहे डर और चिंता को संभाल सकते हैं।

बच्चों में साइलेंट स्ट्रेस क्या है: साइलेंट स्ट्रेस, बच्चों के अंदर वह तनाव है, जिसे बच्चा महसूस तो करता है पर उसे बताने के लिए उसके पास शब्दों का अभाव है। सरल भाषा में कहे तो वह अभी नहीं जानता कि वह अपने डर या नाराजगी को किस तरह अपने माता-पिता से कहे। यही डर उसके तनाव का कारण बनता है।

क्यों नहीं बता पाते बच्चे अपने डर के बारे में: 6 से 12 साल के बच्चों की शब्दावली उतनी विकसित नहीं होती कि वह अपने सभी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त कर पाए। जैसे की डांट खाने या पीटने के डर को वह बता सकते हैं। लेकिन उस डर के कारण जो चुप रहने की आदत या अपने बातों को ना बताने की आदत बन चुकी है, उसे वह शब्दों में नहीं बता पाते।

माता-पिता की अनदेखी से वह समझ सकते हैं कि उनकी बातों को सुना नहीं जा रहा, पर वह शब्दों में नहीं कह पाते कि उन्हें भी गंभीरता से लिया जाए। अपने भावनाओं को व्यक्त न कर पाना बच्चों में साइलेंट स्ट्रेस का कारण बनता है।

Silent Stress in Children
Silent Stress in Children

अगर बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव आता है। जैसे पहले बच्चा बहुत बोलता था अब चुप रहता है या पहले से अधिक डरने लगा है। पहले मिलनसार था अब अलग-थलग रहता है। बच्चे की नींद में परेशानियां बढ़ने लगी हैं, जैसे की रात में सोते समय डरना या नींद का बार-बार टूट जाना। बच्चों का बार-बार पेट दर्द, सिर दर्द की शिकायत करना। पढ़ाई में मन ना लगाना। स्कूल जाने से मना करना। छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ना या गुस्सा करना। पहले से बहुत ज्यादा या बहुत कम खाना। दोस्तों के साथ खेलने से मना करना। अगर आपके बच्चे में इनमें से चार या पांच संकेत भी नजर आ रहे हैं तो पेरेंट्स इस पर ध्यान देने की जरूरत है।

  1. बच्चों पर जरूर से ज्यादा पढ़ाई और रिजल्ट का दबाव डालना।
  2. लगातार बच्चों की तुलना घर, परिवार, दोस्त, पड़ोस के दूसरे बच्चों से करना।
  3. घर में लगातार तनाव पूर्ण माहौल का बने रहना जैसे माता-पिता का बच्चे के सामने बहस या झगड़ा करना या परिवार में अप्रिय घटना का होना।
  4. बच्चों पर दूसरों से अच्छा बनने का दबाव बनाना।
  5. बच्चों का स्क्रीन टाइम ज्यादा होना जिसके कारण बच्चों के नींद और दिमाग पर असर पड़ना।

यह सभी कारण बच्चों के तनाव को बढ़ा सकते हैं।

  1. घर का सेफ माहौल बनाएं: माता-पिता घर का माहौल बच्चों के परवरिश के लिए तनाव मुक्त बनाएं।
  2. माता-पिता बच्चों की बातों को अनसुना ना करें। बच्चे की बातों को सुने और प्रतिक्रिया भी दे। बच्चे की तुलना दूसरे बच्चे से ना करें। ऐसा करना उनके आप विश्वास को काम करता है।
  3. बच्चों के साथ हर रोज 15 मिनट टॉकटाइम रखें। इस दौरान बच्चों की भावनाओं से जुड़ने की कोशिश करें।
  4. बच्चे की गलती पर तुरंत डांटने या चिल्लाने की बजाय शांत रहकर समझाएं।
  5. उन्हें भावनात्मक शब्द और भावनाओं के प्रति जागरूक करें। ताकि जरूरत पड़ने पर वह उसे बता सके।

बच्चों को बच्चों की तरह रहने दे ना कि उन्हें अपनी सफलता की तरह देखें।

निशा निक ने एमए हिंदी किया है और वह हिंदी क्रिएटिव राइटिंग व कंटेंट राइटिंग में सक्रिय हैं। वह कहानियों, कविताओं और लेखों के माध्यम से विचारों और भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं। साथ ही,पेरेंटिंग, प्रेगनेंसी और महिलाओं से जुड़े मुद्दों...