Ankaha Rishta
Ankaha Rishta

Hindi Kahani: अंजलि और अनुभव की मुलाकात कॉलेज के पहले दिन हुई थी। दोनों एक ही कक्षा में थे — हिंदी साहित्य के छात्र। अंजलि शांत स्वभाव की थी, किताबों में खोई रहने वाली, प्यारी सी मुस्कान बिखेरती हुईं।अनुभव थोड़ा चुलबुला, लेकिन दिल का साफ। पहले दिन से ही दोनों की बातचीत शुरू हो गई। नोट्स शेयर करना, लाइब्रेरी में साथ पढ़ना, साहित्यिक कविताएं लिखना, नुक्कड़ नाटक में भाग लेना, कैंटीन में चाय पीना — ये सब धीरे-धीरे रोज़ की आदत बन गई।

अंजलि को लगने लगा कि अनुभव उसके लिए कुछ खास है। लेकिन अनुभव कभी कुछ कहता नहीं था। वो साथ रहता, मदद करता, हंसाता और उसके असाइनमेंट्स करवाता— लेकिन कभी “रिश्ता” या “प्यार” जैसे शब्दों को ज़ाहिर नहीं किया। अंजलि बड़ी उलझन में थी। क्या ये दोस्ती है? या दोस्ती से ज्यादा कुछ और?

एक दिन अंजलि ने हिम्मत करके पूछ ही लिया — “अनुभव, हम क्या हैं, हमारा रिश्ता क्या है ?” अनुभव मुस्कराया, थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला — “हम अच्छे दोस्त हैं, और तुम मेरे लिए बहुत खास हो।”

अंजलि को जवाब मिला, लेकिन दिल को सुकून नहीं मिला। वो चाहती थी कि अनुभव साफ कहे — “हाँ, मैं पसंद करता हूं, तुमसे प्यार करता हूँ ” या “नहीं, मैं सिर्फ दोस्त हूँ”। लेकिन अनुभव हमेशा बीच में रहता — न पूरी तरह पास, न पूरी तरह दूर।

समय बीतता गया। दोनों साथ थे, लेकिन रिश्ता अधूरा था। अंजलि ने कई बार कोशिश की बात करने की, लेकिन अनुभव हर बार टाल देता। कभी कहता — “अभी पढ़ाई ज़रूरी है”, कभी — “रिश्तों को नाम देना ज़रूरी नहीं”।

अंजलि अब समझने लगी थी — ये जो रिश्ता है, वो “सिचुएशनशिप” है। न दोस्ती पूरी तरह, न प्यार। एक ऐसा बंधन जिसमें भावनाएँ हैं, साथ है, लेकिन स्पष्टता नहीं।

एक दिन कॉलेज में एक नया लड़का आया —सिद्धार्थ । वो भी साहित्य का प्रेमी था। अंजलि और सिद्धार्थ की बातें होने लगीं।
वो कविताओं के माध्यम से भी अपनी बातें कहने लगा।
अनुभव ने देखा, लेकिन कुछ कहा नहीं। अंजलि ने सोचा — शायद अब अनुभव को थोड़ा फर्क पड़ेगा और वो अंजलि को अपने दिल की बात साफ साफ कहेगा। लेकिन अनुभव फिर भी चुप रहा।

सिद्धार्थ ने अंजलि से स्पष्ट कहा — “मुझे तुम्हारी मुस्कान पसंद है, और मैं तुम्हें जानना चाहता हूँ।”  
अंजलि को पहली बार किसी ने सीधे दिल की बात कही थी। वो खुश थी, लेकिन अंदर कहीं अनुभव की याद भी थी।

कुछ दिनों बाद, अनुभव ने अंजलि से पूछा —  “तुम सिद्धार्थ के साथ ज़्यादा समय बिताने लगी हो?”  
अंजलि ने कहा — “हाँ, क्योंकि वो मुझे समझता है और साफ बात करता है।”
अनुभव चुप हो गया। अंजलि ने फिर पूछा — “अब भी तुम नहीं बताओगे कि हम क्या थे?” अनुभव ने धीमे स्वर में कहा — “शायद मैं डरता था, तुम्हें खोने से। लेकिन अब समझ आया कि अनकहा रिश्ता भी एक दिन खो जाता है।”

अंजलि की आँखों में आँसू थे। उसने कहा —”मैंने बहुत इंतज़ार किया, लेकिन अब मैं आगे बढ़ रही हूँ।”
अनुभव ने मुस्कराकर कहा — “शायद तुम्हारे लिए यही सही है।”

अंजलि और सिद्धार्थ का रिश्ता धीरे-धीरे आगे बढ़ा। अनुभव पीछे रह गया — एक अधूरे रिश्ते की याद बनकर।

“सिचुएशनशिप” एक ऐसा भावनात्मक बंधन होता है जिसमें दो लोग साथ होते हैं, लेकिन रिश्ते को नाम नहीं देते। इसमें उम्मीदें होती हैं, लेकिन स्पष्टता नहीं। यह कहानी बताती है कि रिश्तों में संवाद और स्पष्टता कितनी ज़रूरी है। अनकहे रिश्ते कभी-कभी दिल तोड़ जाते हैं, क्योंकि दिल को नाम चाहिए, दिशा चाहिए।