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Lifestyle diseases
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Lifestyle Diseases: आपको खुद से ज्यादा अपने लाडले की फिक्र रहती है तभी तो उनको छींक आती है तो जान आपकी चली जाती है। इसलिए उसे हमेशा हेल्दी रखने के लिए आप उसके पीछे दूध का ग्लास लेकर घूमते रहती हैं। यह बीमारियों का डर कहें या अंधविश्वास, कई माताएं ताबीजों के शरण में भी जाती हैं। केवल इसलिए कि बच्चा हमेशा हंसते-मुस्कुराते रहे। उसे दुनिया की कोई तकलीफ ना होने पाए। लेकिन शहरीकरण के दौर में लोगों की लाइफस्टाइल जितनी अधिक तेजी से विकसित हो रही है उससे भी अधिक तेजी से बीमारियों ने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं। तभी तो स्मार्टफोन हाथ में आता नहीं है कि बच्चों में गेमिंग के एडिक्शन की लत और मोटापे की समस्या सबसे बड़ी चिंता बन जाती है। तभी तो आए दिन मोटापे, एन्ज़ाइटी आदि बीमारियां सुर्खियों में रहने लगी हैं। हैरानी तो अब इस बात पर भी लोगों को नहीं होती है कि बच्चे भी अब डायबीटिज के शिकार हो रहे हैं। जबकि यह बड़ों की बीमारी मानी जाती थी।
तो आखिर क्या वजह है कि अनसुनी बीमारियों व हेल्थ समस्याओं ने बच्चों को भी अपने गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया है?
इन सारी समस्याओं की एक ही जड़ है- खराब लाइफस्टाइल। गुड़गांव के कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल के कन्सल्टेंट-पीडिऐट्रिक्स डॉ हिमांशु बत्रा कहते हैं कि शहर की खराब जीवनशैली ने बच्चों में मोटापा, दमा, एनीमिया, एन्जाइटी और स्किन प्रॉब्लम जैसी समस्याओं को आम बना दिया है। अब तो बच्चों में डायबीटिज की समस्याएं दिखने लगी हैं।

क्या कर सकती हैं आप?

शहरीकरण के इस दौर में आप शहर को तो छोड़ सकती नहीं। तो ऐसे में क्या कर सकती हैं आप?
समाधान निकाल सकती हैं। डॉक्टर के पास जाने का विकल्प हर बीमारी की सबसे अंतिम उपाय है। उस अंतिम उपाय को अपनाने से पहले अपने स्तर पर हर बीमारी का समाधान करने की कोशिश करें। क्योंकि यह सारी बीमारियां आपकी लाइफस्टाइल से जुड़ी हुई हैं जो आपके खाने की चीजों, सोने-जागने की टाइमिंग, बैठने-खड़े होने के तरीके और रोजाना के दिनचर्या पर निर्भर करती हैं। इस कारण आप अपने व बच्चे के रहने के तरीके में बिल्कुल थोड़ा सा बदलाव कर इन गंभीर बीमारियों से अपने बच्चे को बचा लेंगी। तो इन 5 गंभीर बीमारियों को आज ही अपने बच्चे की लाइफस्टाइल में सुधार कर उनसे दूर करिए-

मोटापा

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Obesity

यह वर्तमान समय की सबसे गंभीर बीमारी है जो अपने साथ कई और बीमारियों को साथ लेकर आती है। जैसे कि डायबीटिज, दमा, हाई बल्डप्रेशर आदि। मोटापे की यह समस्या दिन भर टीवी, स्मार्टफोन या लैपटॉप के सामने बैठकर चिप्स, पेस्ट्री या अन्य तरह के फास्टफूड खाने की वजह से मुख्य तौर पर उभर रही है। मोटापे के साथ सबसे बड़ी समस्या जो उभर कर आती है वह है- स्कूल में शर्मिंदगी को झेलना।
मोटापे के कारण स्कूल या दोस्तों के बीच बच्चा मजाक का पात्र बनता है जिसके कारण उसे कई जगहों पर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है। इस कारण ही डिप्रेशन जैसी समस्याएं बच्चे को घेर लेती हैं। अब तो बड़ों से ज्यादा बच्चों में डिप्रेशन की समस्या बिल्कुल आम होते जा रही है जबकि पहले ऐसा माना जाता था कि बच्चों से ज्यादा खुश इस दुनिया में कोई नहीं रहता।
तो क्या करें?
इन गंभीर बीमारियों से अपने बच्चे को बचाने के लिए उनके अतिरिक्त खानपान पर आपको केवल रोक लगाने की जरूरत है। खासकर फास्टफूड और प्रिजर्व्ड फूड पर पूरी तरह से रोक लगाएं। इन सब चीजों के बजाय बच्चों को घर पर बनी चीजें दें-
1) घर पर भीगे चने फ्राय कर के दें। ये हेल्दी होते हैं और कैल्शियम से भरपूर होते हैं। पेट से संबंधी समस्याएं नहीं होती और पेट हमेशा साफ रहता है।
2) कोल्ड्रिंक्स और फ्लेवर्ड मिल्क की जगह घर पर बनाना शेक या बादाम शेक बनाकर दें। ये हेल्दी होते हैं और शुगरफ्री होते हैं।
3) ग्रीन सब्जियों को घर पर ही फ्राई कर के पनीर के साथ सर्व करें या रोटी के साथ रोल बनाकर दें।
4) आउटडोर गेम्स खेलने के लिए प्रोत्साहित करें।
5) अगर बच्चा आउटडोर गेम नहीं खेलना चाहता तो कोई भी डांस क्लास या मार्शल आर्ट की क्लास ज्वायन करा दें।
इन सब चीजों को स्टेप बाय स्टेप करें। आपको एक से दो महीने में ही फर्क नजर आ जाएगा।

एनीमिया

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Anemia

एनीमिया गरीब महिलाओं की बीमारी मानी जाती थी। इसके अलावा यह उन लड़कियों को होती है जो डाइटिंग पर रहती हैं जैसे – जो मॉडलिंग करती हैं। लेकिन कभी किसी ने सोचा था कि यह बच्चों को भी होने वाली मुख्य बीमारी बन जाएगी??
नहीं। यह किसी ने नहीं सोचा था।
यह बीमारी मुख्य तौर पर शरीर में आयरन की कमी की वजह से होती है और आयरन बच्चों के सही विकास के लिए सबसे ज़रूरी पोषक तत्वों में एक है। 7 से 12 महीने के बच्चे को रोज़ाना 11 एमजी, 1 से 3 साल के बच्चों को 7 एमजी, 4 से 8 साल तक के बच्चों को 10 एमजी और 9 से 13 साल के बच्चों को 8 एमजी आयरन की ज़रूरत होती है। वहीं 14 से 18 साल के लड़कों और लड़कियों को क्रमश: 11 और 15 एमजी आयरन की ज़रूरत होती है। आयरन खून में हीमोग्लोबिन बनाता है जो पूरे शरीर में ऑक्सीजन का संचार करता है। ऐसे में जब शरीर में आयरन की कमी खून में हीमोग्लोबिन की कमी का कारण बनती है जो शरीर में खून की कमी को जन्म देती है। खून की इस कमी के साथ बच्चों में कमजोरी, कुपोषण, पतलापन, कम भूख लगना, चिड़चिड़ापन और इंफेक्शन की समस्या पैदा होती है।
क्या करें ?
इन सारी समस्याओं से अपने बच्चे को बचाने के लिए बच्चे को एक साल की उम्र से ही आयरन से भरपूर भोजन देने लगें। इसके लिए-
1) रोज खाने में रेड मीट, चिकन, मछलियों, बीन्स और हरी पत्तेदार सब्ज़ियां उन्हें खिलाएं।
2) पांच साल के बच्चों को रोज़ाना 710 एमएल से अधिक दूध ना पीने दें।
3) उनकी डायट में विटामिन सी से भरपूर चीजें शामिल करें। इसके लिए नींबू पानी पिलाएं और टमाटर खिलाएं। विटामिन सी शरीर को डायटरी आयरन अवशोषित करने में मदद करता है।

दमा

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Asthma

इस बीमारी में सांस लेने की समस्या होती है। यह एक तरह से एलर्जिक रिऐक्शन है जो प्रदूषण या धूल से एलर्जी के कारण होती है। शहर की प्रदूषित वायु ने बच्चों में यह बीमारी बिल्कुल आम बना दी है। इसमें बच्चों को खांसी, सांस लेने में परेशानी और सांस फूलने की समस्या होती है।
क्या करें?
1) दमा जैसी बीमारी से बच्चे को बचाने के लिए उन्हें किसी भी तरह के प्रदूषण के संपर्क में ना आने दें।
2) घर से बाहर जाते समय बच्चों को एन95 या एन99 मास्क पहनने कहें।
3) जब बाहर अधिक प्रदूषण हो तो बच्चे को घर से बाहर ना निकलने दें।
4) बच्चे के बेड शीट्स और चादरों को सप्ताह में एक बार गर्म पानी से धोएं।

एंजायटी

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Anxiety

एंजायटी या फिर कहें तनाव में आना। यह एक तरह की मानसिक समस्या है जो बहुत अधिक चिंता करने से होती है। यह सोचने वाली बात है कि अब बच्चों को ऐसी कैसी चिंता होती है की वह एन्ज़ाइटी (चिंता) के शिकार हो जाते हैं। लेकिन यह अब बच्चों में काफी आम समस्या हो गई है जिसके कारण मूड स्विंग, डिप्रेशन, ईटिंग डिस्ऑर्डर, अटेंशन ‌डेफ़िसिट हाइपरऐक्टिविटी डिस्ऑर्डर (एडीएचडी) जैसी समस्याएं भी बच्चों में होने लगी है। ऐसा टेक्नोलॉजी और दिखावटी लाइफस्टाइल में पीछे छूट जाने की डर की वजह से हो रहा है।
क्या करें ?
1) जैसे ही आपको अपने बच्चे में एन्ज़ाइटी के लक्षण दिखें तो जल्द से जल्द ट्रीटमेंट शुरू करा दें। इससे आप आधुनिक लाइफस्टाइल के सबसे नुकसानदायक प्रभाव से उसे बचा लेंगी।
2) उनके हालात को समझने की कोशिस करें।
3) उनकी बातों को सुनें।
4) उनसे बात करें।

त्वचा की समस्याएं

यह समस्या खराब जल और दिन भर एसी में बैठने के कारण से होती है। शहरों के अधिकतर घरों में एसी लगे हुए हैं। पीने के लिए वाटर प्यूरीफायर लगे हैं लेकिन नहाने के लिए आने वाला पानी कई बार फिल्टर नहीं होता जिस कारण गंदे जल के संपर्क में आने से बच्चों की सेंसिटिव स्किन खराब हो जाती है। इसी से स्किन एलर्जी की समस्या पैदा होती है। खासकर छोटे बच्चों को ड्राई स्किन, डायपर रैशेज, एटॉपिक डर्मेटाइटिस या खुजली जैसी समस्याएं होती हैं।  
क्या करें?
1) इसके लिए बच्चों को गर्म पानी से नहलाएं या बबल बाथ कराएं।
2) नहलाने के बाद उनकी त्वचा की अच्छे तेल या बॉडी लोशन से मालिश करें।
3) दिनभर में पर्याप्त मात्रा में पानी पिलाते रहें, ताकि उनकी बॉडी व स्किन, दोनों हाइड्रेटेड रहें।

तो इन सारी बीमारियों के लक्षणों पर ध्यान दें और अपने लाइफस्टाइल में सुधार करते हुए अपने बच्चों को एक अच्छी हेल्दी लाइफ दें। ताकि वे एक खुशनुमा बचपन हासिल कर सकें। क्योंकि आपकी थोड़ी सी मेहनत बच्चों को जिंदगी भर की बीमारी से दूर रखेगी और उन्हें ताउम्र हेल्दी बनाएगी। इसके लिए आपको केवल अपनी लाइफस्टाइल में केवल थोड़ा सा बदलाव करने की जरूरत है। तो आज से ही अपने बच्चे की लाइफस्टाइल पर थोड़ा ध्यान दें और उसे कम्फर्टेबल जोन से बाहर ले जाकर मेहनत करने के लिए प्रेरित करें। शरीर द्वारा की गई थोड़ी से मेहनत उन्हें कई बड़ी बीमारियों से राहत देगी।

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