Summary: डर और चुप्पी से बढ़ती है दूरी
टीनएज बच्चों से डरकर बात करना आज के माता-पिता की सच्चाई है, जो रिश्तों में चुप्पी और भावनात्मक दूरी बढ़ा रही है।
Teenage Parenting Challenges: वर्तमान समय में बहुत से माता-पिता अपने बच्चों से बात करने में डर और अत्यधिक सतर्कता का अनुभव करते हैं। अपने टीनएज बच्चों से बात करते समय डर इस बात का की कहीं हमारे किसी बात को बच्चा अपने दिल पर ना ले ले जो कि उसके अंदर भावनात्मक तनाव का कारण बने। सतर्कता इस बात के लिए कि कहीं बच्चा हमारी बातों को अनदेखा न करें या फिर हमारे साथ गलत भाषा का प्रयोग न करने लगे। आइए जानते हैं इस लेख में बच्चों से बात करते हुए माता-पिता के डर का करण।
टीनएजर से बात करते हुए माता-पिता का डरना

टीनएजर से बात करते हुए माता-पिता के डर के कई कारण है उनमें से कुछ मुख्य कारण है:
आए दिन टीनएजर में तनाव और आत्महत्या की खबरों का अखबार, टीवी या सोशल मीडिया पर दिखाना। इन खबरों के कारण माता-पिता के मन में इस बात का डर और चिंता होना कहीं उनकी किसी बात का बुरा मान बच्चा कोई गलत कदम ना उठा ले।
टीनएज के दौरान बच्चों के व्यवहार में बहुत से बदलाव होते हैं, जिस कारण बच्चा ज्यादा उग्र व्यवहार दिखता है। माता-पिता टीनएजर के बदलते हुए बाहर के कारण उनसे बात करने से डरते हैं। कहीं बच्चा हमें उल्टा जवाब ना दे, कहीं वह हमारे साथ चिल्ला कर बात ना करें।
माता-पिता के अंदर टीनएजर से डर का कारण उनके शरीर और व्यवहार में होने वाले बदलाव भी हैं। माता-पिता टीनएजर में हो रहे बदलाव को समझने और समझाने दोनों से बचते हैं। यही कारण है कि पेरेंट्स और बच्चे के रिश्ते का संतुलन बिगड़ा है।
टीनएज में बच्चे की चुप्पी का कारण
टीनएज बच्चों के लिए सिर्फ उम्र नहीं बल्कि उनके शरीर और मन दोनों में बदलाव का समय है। इस बदलाव को ना समझ पाने के कारण कई बार बच्चा खुद को दूसरों से अलग-थलग महसूस करता है। उसे लगता है उसकी भावनाओं को समझा ही नहीं जाता। वह अपने अंदर हो रहे शारीरिक और हार्मोनल बदलाव को नहीं समझता और इस तनाव से बच्चा चाहे तो अकेले लड़ता है या गलत संगत में पड़ जाता है।
टीनएज में अपने अंदर हो रहे बदलाव को ना समझना या उसके बारे में बात ना कर पाना कई बार उनके अंदर अकेलेपन और चुप्पी या उग्रता का कारण होता है।
पेरेंट्स अपने और टीनएजर दोनों के डर को कैसे कम करें
चुप्पी या डर पेरेंट्स की हो या टीनएजर की दोनों ही सही नहीं है। आईए जानते हैं ऐसे में माता-पिता अपने और बच्चे दोनों के डर को कैसे कम करें।
हर रोज की बात: माता-पिता हर रोज अपने टीनएजर के साथ बैठकर कम से कम 20 मिनट बात करें। अपने बातों के दौरान तुलना या शिकायत ना करें। ऐसा करने से बच्चे का दिमाग आपसे जुड़ाव से ज्यादा खुद के बचाव पर ज्यादा ध्यान देता है। नतीजतन बच्चा आपकी बात सुनता है पर भावनात्मक रूप से वह आपसे जुड़ता नहीं है।
हर समय उपदेश नहीं: बच्चा माता-पिता से बात करना चाहता है पर वह डरता है उनके उपदेश से। माता-पिता बच्चों से बात करते समय उपदेशक वाक्य से बच्चे। जैसे कि तुम्हें आगे की पढ़ाई विज्ञान से ही करना है कि जगह कहें तुम मुझे बताओ, तुम्हें किस विषय में अधिक रुचि है। फिर मैं उस विषय के अनुसार तुम्हें करियर विकल्प की जानकारी दे सकता हूं। ताकि तुम आगे की पढ़ाई के लिए सही विकल्प का चुनाव कर सको।
साफ नियम बनाएं: माता-पिता अपने बच्चों से साफ शब्दों में कहें आपकी सभी बातों को सुना और समझा जाएगा लेकिन शांत और सही भाषा के साथ।
