क्या मैं कोई लैब में डिजाइन किया गया हूं? या फिर बड़े-बड़े वैज्ञानिकों की रिसर्च के बाद बनाया गया कोई प्रोडक्ट हूं। पेरेंट्स बच्चों से जिस तरह की उम्मीदें रखते हैं उसके बाद हर बच्चा मन ही मन सोचता है, कि काश मैं कह पाता, मम्मी-पापा मैं आपका बच्चा हूं प्रोडक्ट नहीं!
बच्चों पर सब कुछ करने का प्रेशर डालकर, आप कम उम्र में उनका स्ट्रेस बढ़ा रहे हैं। अगर आप चाहते हैं कि बच्चा सुपरहिट बने तो, पहले खुद सुपर पेरेंट्स बनें।
क्या आप वह सब कर सकते हैं जिसकी उम्मीद बच्चों से लगा रही हैं?
अगर बच्चा कहे कि, ‘उसके मम्मी पापा को देखो’! तब अक्सर हम बच्चों को यह सिखाते हैं कि जो मिल रहा है उसमे खुश रहो। लेकिन माता पिता बच्चों की तुलना करते हैं कि, ‘मिस्टर शर्मा की बेटी को देखो, क्लास में फर्स्ट आई है, बड़ी बुआ के बेटे को देखो, नेशनल गेम्स खेलता है और पढ़ाई में गोल्ड मेडल लाता है”
सोचिए अगर बच्चा आपसे कहे कि, “सोनू के पापा को देखो सीए हैं, राहुल की मम्मी को देखो, कितनी एक्टिव है। अब आप कैसा महसूस करेंगे?
इसलिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि बच्चों को अच्छा करने के लिए प्रेरित करें। लेकिन उनकी तुलना कभी किसी के साथ मत करिए।
खुद से दो प्रश्न करें
हर माता-पिता को खुद से दो प्रश्न करने चाहिए। पहला आप में कौन से 2 गुण हैं जो आप चाहते हैं कि आपके बच्चे मैं हों।
दूसरा आप में कौन से दो दोष है जो आप चाहते हैं कि बच्चे में कभी ना आए ?
फिर इसकी अच्छाई बुराई समझाते हुए, बच्चे को अच्छा करने और बुराई छोड़ने के लिए प्रेरित करें।
राइट पैरेंटिंग के लिए
पेरेंट्स हमेशा बच्चे को समझाने का प्रयास करें और डर ना दें। बहुत ज्यादा प्यार बहुत ज्यादा डांट दोनों ही बच्चे के लिए नुकसानदायक है। कम उम्र में हर जरूरत ना पूरी करें। बच्चे के सामने कभी पैसे और स्टेटस का घमंड या इसकी वजह से आप दूसरों से बेहतर है ना दिखाएं। केवल रोकने-टोकने और गलत बात पर मारने से पेरेंट्स की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। माता-पिता दोनों मिलकर तय करें कि उन्हें बच्चे की परवरिश कैसे करनी है? बच्चों के सामने लड़ना, असभ्य भाषा का प्रयोग करना और ऊंची आवाज में बात करना गलत है। बच्चे को लोगों की इज्जत करना सिखाए। उन्हें अपने कल्चर से, फैमिली से, धर्म से, समाज से, जोड़े। उन्हें सही और गलत का भेद करना सिखा कर अच्छा नागरिक बनने की प्रेरणा दें।
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