आमतौर पर देखा गया है कि बड़ों की बातों का असर बच्चों के कोमल मन में बहुत जल्दी पड़ता है। इसीलिए कहा जाता है कि बड़े लोगों को बच्चों के सामने हर बात सोच समझ कर करनी चाहिए। लेक्किन इस बात से अंजान पैरेंट्स अक्सर अपनी सारी अच्छी बुरी बातों की चर्चा बच्चों के सामने करने लगते हैं जिसे सुनकर बच्चे भी अपने मन में एक छवि कायम कर लेते हैं जोकि कई बार उन्हें भयभीत भी कर देती है। कुछ ऐसे ही कोरोना की चर्चा आजकल इतनी जयदा हो रही है कि बच्चे इस वायरस के डर से दहशत में आ गए हैं।
आज सुबह टीवी में एक 6 साल की बच्ची को कोरोना के डर से रोते हुए और पापा को ड्यूटी में जाने से रोकते हुए देखा तो मन में एक अजीब डर कायम होने लगा। बच्ची अपने डॉक्टर पिता को हॉस्पिटल जाने से मना करते हुए बोल रही थी कि पापा बाहर मत जाओ नहीं तो कोरोना पकड़ लेगा। बात देखने में भले ही मामूली सी क्यों न लग रही हो लेकिन ये एक बड़ा सच है कि किसी बभी बात का बुरा असर बच्चों के मन में गलत असर डाल सकता है। इसलिए बच्चों को दहशत से निकालने के लिए पैरेंट्स को भी किसी तरह की बातें सोच समझ कर करनी चाहिए।
कोरोना इन्फेक्शन को बढ़ने से रोकने के लिए सभी स्कूल बंद कर दिए गए हैं और बच्चे पार्क में खेलने के लिए भी नहीं जा पा रहे हैं ऐसे में वो घर की चार दीवारी में अपने आप को कैद समझने लगे हैं। ऐसे में यह ध्यान रखने की जरूरत है कि बच्चों के मन में कोई दीर्घकालीन डर न बैठ जाए। हम सभी को अपने घर में कोरोना के बारे में बात करते हुए सावधानी बरतनी चाहिए –
बच्चों में जागरूकता हो डर नहीं
पैरेंट्स को चाहिए कि बच्चों को कोरोना के बारे में जागरूक करें लेकिन उससे बचने के उपाय बताकर न कि उन्हें डराकर। जहां तक संभव हो बच्चों को खतरे के बारे में पूरी जानकारी दें, उनके सवालों के शांतिपूर्वक जवाब दें।
इन बातों का रखें ध्यान
- घर में , रिश्तेदारों ये या फोन कॉल पर किसी से भी कोरोना के विषय में बात करते हुए खुद को सकारात्मक रखें।
- बच्चे पैरेंट्स की हर एक बात पर बारीकी से गौर करते हैं इसलिए यदि पैरेंट्स चिंता करेंगे तो वो भी परेशान हो जाएंगे।
- बच्चों की उत्सुकता को समझें और उनके सवालों को टालने की जगह ध्यान से सुनकर उनकी जिज्ञासा को कम करें।
- कोरोना वायरस के लिए किसी देश को दोष देने वाली भाषा का इस्तेमाल बच्चों के सामने भूलकर भी न करें।
- वायरस से जुड़ी नकारात्मक खबरें टीवी या इंटरनेट पर देखने की सीमा तय करें क्योंकि एक ही विषय पर ज्यादा सोचने से चिंता बढ़ जाती है।
- बच्चों के सामने किसी के बारे में पूर्वागृह न बनाएं उन्हें वायरस से जुड़ी तथ्यपरक और उनकी उम्र के अनुसार जानकारी ही दें।
