man ek mahasagar hai
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Life Spiritual Lesson: मनुष्य का मन एक हिमखंड जैसा होता है। हिमखंड का बहुत सारा भाग समुद्र में छिपा होता है। केवल थोड़ा-सा ऊपर का सिरा दिखाई देता है। दिखने वाला भाग छोटा है और न दिखने वाला बहुत बड़ा। ज्ञात छोटा और अज्ञात बड़ा।

विरोधी विचार आदमी के मन में पैदा होते रहते हैं। एक मन कहता है- यह काम करूं और दूसरा मन कहता है- वह काम करूं। शायद हर आदमी के मन में ऐसा प्रश्न उठता होगा और हर व्यक्ति यह सोचता होगा कि कितने मन हैं अहिंसा के मार्ग में चलने वाले व्यक्ति के मन में कभी-कभी विचार आ जाता है हिंसा करने का और हिंसा के मार्ग में चलने वाले व्यक्ति के मन में कभी-कभी विचार उठ जाता है हिंसा न करने का। कितने
विरोधी भाव हमारे मन में पैदा होते रहते हैं?
सहज ही प्रश्न होता है- आदमी के मन कितने हैं? यह जो मानसिक अनेकाग्रता का प्रश्न है, मानसिक परिवर्तनशीलता, मानसिक चंचलता और विविधता का प्रश्न है, वह हमारे लिये एक मोड़ है। यहां से हम अज्ञात
की खोज में प्रस्थान कर सकते हैं। यहां एक प्रश्न होता है और उस प्रश्न का समाधान अज्ञात में होता है। यदि सब कुछ ज्ञात मन ही करता तो इतने प्रकार के मन नहीं होते। ज्ञात के सिवाय भी कोई दूसरी दुनिया है और वह है अज्ञात की दुनिया। अज्ञात की दुनिया को खोजने पर हमारे व्यवहार की व्याख्या हो सकती है। एक प्रकार से उसने आत्मा की दिशा में प्रस्थान कर दिया, स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की दिशा में प्रस्थान कर दिया।
फ्रायड ने कहा था- ‘मनुष्य का मन एक हिमखंड जैसा होता है। हिमखंड का बहुत सारा भाग समुद्र में छिपा होता है। केवल थोड़ा-सा ऊपर का सिरा दिखाई देता है। जितना दिखाई देता है हिमखंड, उतना ही
नहीं है। बहुत बड़ा है। दिखने वाला भाग छोटा है और न दिखने वाला बहुत बड़ा। ज्ञात छोटा और अज्ञात बड़ा।

यूंग ने मन की तुलना एक महासागर से की है। उसमें ज्ञात मन केवल एक द्वीप जैसा है। अज्ञात मन महासागर जैसा है और ज्ञात मन महासागर में होने वाले एक छोटे टापू जैसा है। हम अपने सारे व्यवहार और आचरण की
व्याख्या ज्ञात मन के माध्यम से करना चाहते हैं। यह कभी संभव नहीं होगा। जब ज्ञात और अज्ञात-दोनों मनों की समष्टिï करेंगे तो संपूर्ण व्याख्या होगी।

 Life Spiritual Lesson
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मनोविज्ञान ने मन के तीन विभाग किए हैं-

अद्ïस (id) मन, अहं (ego) मन, अधिशास्ता (Supereco) मन। पहला विभाग है मन ‘अद्ïस’। इस विभाग में आकांक्षाएं पैदा होती हैं। जितनी प्रवृत्यात्मक आकांक्षाएं और इच्छाएं हैं, वे सब इस मन में पैदा होती हैं। इसमें अचेतन का भाग अधिक है, चेतन का भाग कम। दूसरा विभाग है
‘अहं मन। समाज-व्यवस्था से जो नियंत्रण प्राप्त होता है, उससे आकांक्षाएं नियंत्रित हो जाती हैं, परिमार्जित हो जाती हैं। उन पर अंकुश जैसा लग जाता है। मन में जो आकांक्षा या इच्छा पैदा हुई, ‘अहं मन’ उसे क्रियान्वित नहीं करता। तीसरा विभाग है ‘अधिकशास्ता मन’। यह ‘अहं मन’ पर भी अंकुश रखता है, उसे नियंत्रित करता है।

चेतना की दृष्टिï से उसके दो रूप सामने आते हैं-व्यक्त चेतना और अव्यस्त चेतना। मनोविज्ञान में इन्हें चेतन और अचेतन कहा गया है। ‘फ्रायड’ ने मन के दो संभाग बतलाए- चेतन मन और अचेतन मन। ‘यूंग’
ने इस अवधारणा को बदल दिया। उन्होंने कहा-मन के दो संभाग ठीक नहीं हैं, क्योंकि मन के आधार पर बहुत निर्णय नहीं लिए जा सकते। मन बहुत जल्दी बदल जाता है।
फ्रायड ने कहा- अचेतन मन में गंदगी भरी पड़ी है, कूड़ा भरा पड़ा है। वह दमित इच्छाओं का भंडार है। जो वासनाएं, इच्छाएं, आकांक्षाएं दमित हो जाती हैं, वे अचेतन में चली जाती हैं। वहां दबी पड़ी रहती हैं और
स्वप्न के रूप में उभर कर सामने आती रहती हैं। यूंग ने इसका भी प्रतिवाद किया। उन्होंने कहा- अचेतन मन केवल दमित अच्छाओं का भण्डार नहीं है। इसमें बहुत सारे अच्छे संस्कार भी हैं। दमित इच्छाएं हैं तो साथ-साथ में अच्छाइयां भी हैं। स्वरूप बदल गया।