कोई फाइल चार्ज नहीं, कोई ढ़की कीमत नहीं, ईजी फायनेंस उपलब्ध’, ‘अपने सपनों को सच करें’ हाउसिंग लोन सुविधा उपलब्ध, ‘टीवी आसान किस्तों पर’, ‘फ्रिज दीवाली छूट के साथ, ईजी इंस्टालमेंट में घर ले जाएं’, रु. 999 में बजाज चेतक घर ले जाएं शेष 36 माह में चुकाएं, ‘सरकारी कर्मचारी को कोई सिक्योरिटी नहीं, आसान मासिक किश्तों में उपलब्ध कूलर, थ्री-इन-वन, म्यूजिक सिस्टम, वॉशिंग मशीन, रु. 9999 में बेस्ट फैमिली राइड मारूति आपकी शेष अपनी सुविधा से छत्तीस माह में नाम मात्र का ब्याज’ जैसी न जाने कितनी स्कीमें अपनी लुभावनी भाषा, मनमोहक वादे और सुविधा तथा आराम के नारों के साथ प्रत्येक दैनिक पत्र एवं पत्रिकाओं पर एक बड़े हिस्से पर नजर आ रही है।

आप सुबह समाचार पत्र खोलिए एक न एक लाल-पीला कागज भी उसके बीच में मिल जाएगा, जिसमें ऐसी ही किसी स्कीम की चर्चा होगी। लोकल केबल पर हर तीस मिनट में ऐसी ही कोई न कोई स्कीम आकर्षक विज्ञापन के रूप में आपको आमंत्रण देती मिल जाएगी। आप या आपकी पत्नी-बच्चों का मन जरा सा डिगा नहीं कि घर में नया टीवी, फ्रिज, फर्नीचर, कूलर, स्कूटर और कार के लिए कर्ज देने वाली सरकारी-अर्ध सरकारी अथवा प्राइवेट फाइनेंस कंपनियां घर का दरवाजा खटखटाती नजर आएंगी। लेकिन इस खटखटाहट को अगर आपने सुन लिया तो रमेश जी जैसा हाल हो सकता है।

रमेश जी एक इंटर कॉलेज में लेक्चरर हैं। अपना घर है, पत्नी है, दो बच्चे हैं। पिछली दीवाली को पत्नी जिद कर बैठी की वॉशिंग मशीन लेनी है वह भी एलजी की। बाजार घूमा अठारह हजार की मशीन लेना थोड़ा कठिन लगा, क्योंकि ठीक-ठाक मासिक वेतन होने के बावजूद बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और गृहस्थी के खर्च से बचता ही कितना। दुकानदार ने ऑफर दिया कि एक पैकेज आया हुआ है, जिसमें वॉशिंग मशीन, फ्रिज और टीवी एक साथ लेने पर मात्र 30,000 ही व्यय होंगे और केवल दस हजार अभी देकर शेष सुविधानुसार चौबीस या छत्तीस महीनों में दे सकते हैं। मात्र 12,000 में फ्रिज और टीवी दोनों। ऑफर सचमुच फायदेमंद लगा। वैसे भी घर में छोटा 14 इंच टीवी था। पत्नी ने दरियादिली दिखाई, छोटा टीवी बहन जी को दे देंगे। रमेश जी को भी लगा कि ऑफर स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं, बस जमा पूंजी आठ हजार रुपये तथा पत्नी की जोड़ी बटोरी ब्लैक मनी के 2000 देकर तीनों चीजें घर ले आए, लेकिन जब ब्याज सहित बाकी रकम कितनी चुकानी है यह हिसाब लगाया गया तो वह चौबीस हजार बैठी।

अब दस हजार तो जमा हो ही गए थे, चलो दो हजार महीने कर के दो साल में चुका देंगे, पत्नी की आंखों में तो तीन-तीन नई चीजें घर लाकर पड़ोसियों पर रौब जमाने की ललक तैर रही थी। रमेश जी भी क्या कहते तीनों चीजें घर ले आए। तीन-चार माह तो किश्तें समय से चुकता होती रही, किंतु पांचवे महीने संयोग से साली की शादी आ गई। जाना तो था ही आने जाने और उपहार का खर्चा बीस-पच्चीस हजार से कम क्या बैठना था। सिवा प्राविडेंट फंड से उधार लेने के और कोई चारा नहीं था।

अगले महीने से ही उसकी किश्त भी मासिक आय से कटना शुरू हो गई, उस पर भी संयोग से मकान की पिछली दीवार भी न जाने कैसे धसक गई, जिसे तुरंत मरम्मत कराना पड़ा और उसमें भी आठ-दस हजार तुरंत समाप्त हो गए, वह रकम भी आवश्यक खर्च समझ कर चाचा जी से उधार लेनी पड़ी। उस माह क्या अगले सात-आठ महीने तक रमेश जी सम्हल नहीं पाए और टीवी, वॉशिंग मशीन वाली किश्त बराबर लेट होती गई। छ: माह बाद ही फाइनेंस कंपनी का नोटिस आ गया, जिसमें छ: महीने किश्त न जमा हो पाने के कारण चौबीस प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज लगाकर रमेश जी की ओर लगभग अठारह हजार रकम निकल रही थी, साथ ही यह निर्देश भी था कि यदि इसमें से ओवर ड्यू रकम तुरंत नहीं चुकाई गई तो मात्र 6 माह प्रतीक्षा के बाद हम कानूनी कार्यवाही को बाध्य होंगे।

इसी तरह की कहानी प्रशांत की भी है। नई-नई शादी और प्रतिमाह बारह हजार की मासिक आय के जुनून में प्रशांत ने पत्नी को रिझाने के लिए न केवल नया फ्लैट खरीदने में अपनी पिछली सारी जमा पूंजी खर्च कर डाली वरन उसे फरनिस्ड और डेकोरेट करने के चक्कर में पांच-छ: फाइनेंस कंपनियों से अच्छा-खासा कर्ज भी ले डाला। अब हालात यह है कि घर का खर्च ठीक से न चल पाने के कारण और सामान्य आवश्यकताएं भी पूरी न हो पाने के कारण श्रीमती जी छ: माह से मायके में हैं और प्रशांत किसी तरह गुजर बसर कर अपनी मासिक आय का तीन चौथाई हिस्सा फाइनेंस कंपनियों को दिये जा रहे हैं।

‘कर्ज की पीते थे मय और सोचते थे यह रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन’ या ‘कर्ज ले घी पी मौजकर’ जैसी मनोवृत्ति कहने-सुनने में कितनी भी मस्ती भरी लगती हो, लेकिन सच यही है कि कर्ज के भंवर जाल में एक बार फंस कर निकल पाना आसान नहीं होता।

दरअसल जब आप अपनी किसी जरूरत को पूरा करने के लिए कर्ज लेने का विचार करते हैं तब हम इस सत्य को भुला बैठते हैं कि आगे आने वाले समय में केवल आपके खर्चे बढ़ सकते हैं, वरन आकस्मिक परिस्थितियां जैसे- बीमारी, मकान की मरम्मत, किसी निकट संबंधी की मृत्यु, विवाह आदि-आदि भी आपके मासिक क्या वाॢषक बजट को लड़खड़ाने के लिए आ सकती है। एक और सत्य जिसकी ओर हमारा ध्यान नहीं जा पाता वह यह है कि कर्ज की अगर किश्त चुकानी है तो एक निश्चित रकम प्रति माह हमारी मासिक आय से कम हो ही जानी है, दूसरी ओर हमारी आवश्यकताओं में वृद्धि ही होनी है और उनमें निश्चित रूप से कुछ ऐसी आवश्यकताएं भी होगी जिनकी पूॢत करना अनिवार्य ही होगा।

बीस वर्ष पहले के और आज के समय में एक विशेष परिवर्तन हुआ है। आप याद करें तो आपको बीस वर्ष पहले का शायद ही कोई ऐसा विज्ञापन याद आए जिसने इतनी दयानतदारी से ऋण स्कीमों की घोषणा की हो, जितनी आज की जा रही है। इसका कारण स्पष्टत: पश्चिम के देशों की वह धारणा है, जिसके अंतर्गत वर्तमान को सर्व सुख सुविधायुक्त बनाने की जीवनशैली तुरंत सारी उपभोक्ता वस्तुओं को जुटाने की सिफारिश करती है और व्यक्ति इंस्टालमेंट पर सब कुछ खरीद कर स्वयं को गिरवी रख देता है और जाहिर है कि भारत इस दृष्टि से एक बड़ा उपभोक्ता बाजार तो है ही लेकिन यह नीति भारत जैसे विकासशील देश के लिए कितनी सार्थक है इस पर तो विचार करना ही होगा। अच्छा तो यह हो कि बजाय किश्तों पर लेने की मनोवृत्ति विकसित करने के एक निश्चित रकम प्रति माह बैंक में जमा करें, रिकरिंग डिपाजिट स्कीम के अंतर्गत और फिर एक निश्चित समय के बाद उसे ब्याज सहित निकाल कर मनोवांछित वस्तु की खरीदारी करें।

इस प्रक्रिया में थोड़ा सा संयम तो अपनाना ही होगा, लेकिन इसके कई लाभ हैं। पहली बात तो यह कि दुकानदार को किश्त चुकाने का मानसिक बोझ नहीं रहता, दूसरी बात यह कि यदि कोई आकस्मिक व्यय सामने आ जाए तो उसके लिए धन जुटाने में सुविधा रहती है, लेकिन इससे भी 

ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि तकनीक के गुणात्मक विकास के कारण जो वस्तु आज दस हजार की है वही दो साल बाद आठ हजार की रह जाती है, साथ ही उसकी उन्नत किस्म का उत्पादन भी सम्मुख होता है। उदाहरण के लिए टीवी सेट को ही लें, अभी बहुत दिन पुरानी बात नहीं है जब प्रसिद्ध कंपनियों के रंगीन टीवी सेट कम से कम पंद्रह-सोलह हजार में बिक रहे थे, जबकि आज फिलिप्स, अकाई, सलोरा के अधिक सुविधायुक्त टीवी सेट्स दस से बाहर हजार में आसानी से उपलब्ध हैं। यही बात कमोबेश सभी आधुनिक उत्पादनों पर लागू है। तो मात्र थोड़ा सा संयम आपको दुहरा लाभ देता है। एक ओर आप सुकून के साथ पैसा जमा कर उस पर थोड़ा-बहुत ब्याज कमाते हैं तो दूसरी ओर जिस वस्तु को आप खरीदना चाहते हैं, उसका मूल्य भी कम से कम बीस प्रतिशत तो कम हो ही जाता है। इसलिए आधुनिक सुख-सुविधाओं की वस्तुओं की इच्छा कीजिए, लेकिन परिवार के सामने इन सत्यों को उजागर कर उनसे सहयोग लेकर पहले अपेक्षित राशि जमा करिये फिर उस उत्पादन को खरीद कर उसका आनंद उठाइए और अपनी डिक्शनरी से कर्ज शब्द को मिटा डालिए, इसी में आनंद है और इसी में सुख।

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