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स्वर्ग-नरक और ज्योतिष: Astrology Talk
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Astrology Talk: मन को मारो नहीं, सुधारो। शरीर में सच्चा हीरा आत्मा है। बीती की चिंता मत करो। सबसे कीमती रत्न ज्ञान रत्न है। सबसे बड़ा वह है, जिसमें सबसे अधिक गुण हैं। सबसे मिथ्या बात अहंकार की बात है। आत्मा का भगवान से मिलन ही सर्वश्रेष्ठ मिलन है। सबसे बड़ी विजय देह अभियान को परास्त करने में है। समय का मूल्य समझोगे, तो स्वयं मूल्यवान बनोगे। क्रोध रूपी भूत को उदारता से ही
जीता जा सकता हैं। विनाश से डरो नहीं, विकर्मों का विनाश करो। हारे हुए शत्रु के प्राण लेना ठीक नहीं।

भाग्य क्या है और ज्योतिष की बात हम क्यों करते हैं? यदि नहीं, तो हम कर्म क्यों करते हैं? प्रत्येक जीव को समझ लेना चाहिए कि वह शरीर नहीं आत्मा है। शरीर नश्वर है, आत्मा शाश्वत है। शरीर, इंद्रियां, मन, बुद्धि, जीव, आत्मा और परमात्मा आदि तत्त्वों को ही अध्यात्म कहते हैं। प्रकृति ने मनुष्य को एक अनोखा गुण दिया है – विचार। इसी के कारण मनुष्य अन्य जीव-जंतुओं से भिन्न है और इसी कारण उसे हमेशा यह जानने की उत्कंठा रही है कि वह कौन है? अंतरिक्ष क्या है? समय क्या है? पदार्थ क्या है? आत्मा क्या है आदि? अध्यात्म ज्ञान वह रहस्य है, जिसको जान लेने पर मनुष्य जीवन-मरण के रहस्यों से परिचित हो जाता है। अध्यात्म में प्रवेश हेतु कुछ शक्तियों को जाग्रत करना आवश्यक है। सत्संग, मनन, श्रद्धा, प्रेम, विश्वास और अभ्यास जैसी शक्तियों के द्वारा इस मार्ग पर आसानी से पांव रखा जा सकता है।

स्वर्ग-नरक और ज्योतिष: Astrology Talk
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आध्यात्मिक उद्देश्य में लगे हुए मनुष्यों के लिए गुरु की सहायता अनिवार्य एवं अपरिहार्य है। गुरु में ‘गु का अर्थ अंधकार है एवं ‘रु का अर्थ प्रकाश है। ये वे है , जो अपने अत:करण से बोलते हैं। इस ब्रह्मंड
में भगवान शिव ही एक मात्र गुरु हैं। वह समय-समय पर, किसी न किसी रूप में, शिष्यों को साधना का गुप्त मार्ग प्रदर्शित कर, गुप्त रहस्यों को समझा कर, तिरोहित हो जाते हैं। शास्त्र में कहा गया है: ‘यस्मान्महेश्वर: साक्षात् कृत्वा मानुषविग्रहम। कृपया गुरुरूपेण मग्ना प्रोद्धरति प्रजा:।। अर्थात, स्वयं महेश्वर ही मनुष्य रूप धारण कर के, कृपापूर्वक, गुरु रूप में, माया से बंधे जीवों का उद्धार करते हैं। इसलिए, जो भी सच्चे गुरु के पास गया, उसने गुरु को भगवान कहा है। वेदांत दर्शन की व्याख्या करते हुए, जगतगुरु शंकराचार्य ने दुखों के निवारण का उपाय ‘मोक्ष को बताया है। उन्होंने मोक्ष
की परिभाषा स्पष्ट करते हुए बताया कि ‘सत्य ज्ञान की स्थायी अनुभूति ही ‘मोक्ष है। नि:संदेह सूर्य के बिना जीवन की कल्पना असंभव है। यह स्थूल और सूक्ष्म सृष्टि का आधार तथा काल पुरुष की आत्मा है। अतएव अध्यात्म का कारकेश है ग्रह राज सूर्य। पंचम भाव का कारक ग्रह है देव गुरु बृहस्पति तथा नवम भाव के दो कारक ग्रह हैं ग्रह राज रवि और देव गुरु बृहस्पति। इस कारण ग्रह राज रवि और देव गुरु बृहस्पति दोनों सात्विक तथा आध्यात्मिक ग्रह हैं।

सत्य को जानने के लिए चार मार्ग बताये गये हैं: ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग एवं सांख्य योग। ज्ञान योग के अनुसार ”तत्वमसि अर्थात तू (वही) है; अर्थात यह आत्मा ही ब्रह्म है। लेकिन, सांसारिक
संबंधों और शारीरिक आवश्यकताओं के कारण, इस योग और मनुष्य के बीच बड़ा व्यवधान रह जाता है। भक्ति योग में एक के बदले दो की मान्यता है। एक भक्त है और दूसरा भगवान। सारा संसार भगवान का ही रूप है। भगवान ने इच्छा की कि मैं एक से अनेक हो जाऊं और वह सूक्ष्म रूप से प्रत्येक प्राणी और पदार्थ में समा गया। इस योग में भी एक कठिनाई है; पूर्ण रूप से एक पर विश्वास करने की। कर्म योग में मनुष्य केवल अपने कर्म से ही बंधन मुक्त हो जाता है। उसे केवल इस बात का अभ्यास करना है कि वह फल की इच्छा न करे। फल उसके अनुकूल हो, या प्रतिकूल, कर्म में आसक्त नहीं होना है। कर्म में किसी प्रकार का हठ नहीं होना चाहिए। सांख्य योग से आज के वैज्ञानिक एकमत हैं कि सभी प्राणी एवं पदार्थ सूक्ष्म कणों से बने हैं और प्रत्येक कण ऊर्जा का स्रोत है। यदि सभी कणों की ऊर्जा का उपयोग किया जाए, तो थोड़ा सा पदार्थ भी अणु बम बन जाता है; अर्थात् यह शरीर ऊर्जा का केंद्र है। इस योग के अनुसार यह शरीर केवल एक जैविक प्रतिक्रिया के कारण उत्पन्न हुआ है। इसका न आदि है, न अंत; अर्थात न तो पहले यह किसी रूप में था और न ही इसका पुनर्जन्म होगा। मृत्योपरांत शरीर के कण वायु और पृथ्वी में मिल जाते हैं और सृष्टि की रचना चलती रहती है। इस योग के अनुसार इस शरीर का उद्देश्य केवल सृष्टि की रचना में भाग लेना है। अत: कलियुग में शायद कर्म योग और सांख्य योग अधिक व्यावहारिक हैं। आत्मा बुद्धि से सूक्ष्म है।
बुद्धि ही आत्मा का बोध करा सकती है। ज्ञानी पुरुष निराकार रूप का ही चिंतन करते हैं। रास्ता कठिन है। लेकिन वे भी कबीर, गुरु नानक, संत रविदास आदि की तरह संसार सागर से पार हो गये। साकार की भक्ति करने वाले भगवान के चतुर्भुज रूप का ध्यान लगाते हैं। मीरा, तुलसीदास, सूरदास की तरह वे भी तर गये।

स्वर्ग-नरक और ज्योतिष: Astrology Talk
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मनुष्य योनि में जन्म लेना ही जीवन-मरण के चक्रों से मुक्त हो कर अपने इष्ट देव में एकाकार हो जाना है।़ ऋषियों-मनीषियों ने सांसारिक सिद्धियों से परे अविनाशी एवं अपरिवर्तनीय आनंद के ज्ञान को खोजने एवं पाने के महत्त्व पर ही प्रकाश डाला है। आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश करने हेतु
सर्वप्रथम जगत गुरु शिव की उपासना करना आवश्यक है। तत्त्वों का ज्ञान ही सच्चा अध्यात्म ज्ञान है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि ‘जो भी मुझे तत्त्व से जान लेता है, वह मेरे में समा जाता है। मेरे कर्म और जन्म दिव्य हैं। जो इनको तत्त्व से जान लेता है, उसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता, अर्थात्
मोक्ष मिल जाता है। अत: आत्मा और परमात्मा को तत्त्व से जानो। गीता के 18वें अध्याय के 51-52-53वें श्लोक में भगवान कृष्ण उस तत्वदशील के लक्षण बताते हैं, जो मोक्ष का अधिकारी बनता है। ‘बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।। विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस:। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रित:।। अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम। विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कृपते।। विशुद्ध बुद्धि हो, धैर्य हो, संयमी हो, विषयों से रहित हो, राग द्वेष से रहित हो, एकांत वास पसंद करता हो, थोड़ा खाये, मन, शरीर, वाणी पर काबू हो, समाधिस्थ हो, वैरागी हो, अहंकार, ताकत, गर्व, काम, क्रोध, अनावश्यक संग्रह से मुक्त हो, ममतारहित तथा प्रशांत चित्त

स्वर्ग-नरक और ज्योतिष: Astrology Talk
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स्वर्ग और नरक – ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है- ‘धर्म शास्त्रों तथा वेद-पुराणों में यह स्पष्ट है कि पाप कर्मों के उपरांत मनुष्य यमराज के भयंकर लोक में जाता है और फिर पशु, पक्षी आदि तिर्यक योनि में जन्म लेता है। पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर, उस जीव का जन्म शुभाशुभ मुहूर्त, ग्रह और
नक्षत्रों की रश्मियों में होता है तथा इस जन्म के कर्मों के आधार पर उस जीवरूपी प्राणी का अंत शुभाशुभ मुहूर्त, ग्रह और नक्षत्रों की रश्मियों की प्रेरणा से होता है। उसके शरीर में स्थित पंच महाभूतों के अधिष्ठाता देवता उस जीव द्वारा पूर्व जन्म में किये गये शुभ और अशुभ कर्मों को देखते हैं। धर्म, अर्थ और काम- इन तीन पुरुषार्थों को जो मनुष्य प्राप्त करता है, वह स्वत: ही मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। पंच महाभूत, जैसे त्वचा, अस्थि, मांस, मज्जा, शुक्र इत्यादि सभी धातुएं निष्प्राण देह को त्याग देती हैं। केवल एक मात्र धर्म उसका अनुसरण करता है, जो इहलोक और परलोक में हमेशा साथ निभाता है। ज्योतिष शास्त्र इस विषय को और अधिक स्पष्ट कर के, कुंडली में ग्रह और राशियों कि स्थिति द्वारा, स्वर्ग और नरक के मार्ग को प्रकाशित करता है। इसके अनुसार लग्न भाव मनुष्य का इस जगत में अवतरण का स्थान है, जबकि द्वादश भाव मनुष्य के इस जगत से गमन का स्थान है।
कुंडली का द्वादश भाव लग्न से द्वादश स्थान पर होता है, जो अनेक प्रकार के व्यय के साथ-साथ जीवन के व्यय को प्रकट करता है। अष्टम और तृतीय भाव (अष्टम से अष्टम स्थान पर) जीवन की आयु के स्थान हैं, मगर द्वादश भाव जीवन के क्षय, या समाप्ति का स्थान है। फलदीपिका, अध्याय 14
श्लोक 21, 22 के अनुसार: ‘जब द्वादशेश सौम्य नवांश मे, सौम्य राशि में या सौम्य ग्रहों से युक्त हो, तो मनुष्यों का मरण अक्लेश होता है और क्रूर ग्रहों या क्रूर राशि से संबंध होने पर कष्टों से होता है। अगर द्वादशेश स्व, उच्च या मित्र राशि में हो, या सौम्य वर्ग में हो, या सौम्य ग्रहों के संग हो, तब मनुष्य के मरण के पश्चात ऊर्ध्व गति, अर्थात स्वर्ग या मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत होने पर अधोगति होती है। कुछ ऐसी मान्यता भी है कि अगर द्वादशेश शीर्षोदय राशि (मिथुन, कन्या, तुला,
वृश्चिक और कुंभ) में है, तो स्वर्ग की प्राप्ति और अगर पृष्ठोदय राशि (मेष, वृष, कर्क, धनु, मकर) में है, तब नरक की प्राप्ति होती है। सर्वार्थचिंतामणि, अध्याय 8, श्लोक 23, 24 के अनुसार द्वादश भाव में शुभ ग्रह स्व या उच्च राशि में हो और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तथा देव लोक नामक अंश में हो, तब जातक स्वर्ग प्राप्त करता है। अगर बृहस्पति दशम भाव का स्वामी हो कर द्वादश भाव में हो और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, तब भी जातक स्वर्ग प्राप्त करता है। जब बुध और चंद्रमा पर पापी ग्रहों का प्रभाव होता है, तो मनुष्य अपनी अज्ञानता के वशीभूत हो कर अपने कर्मों के परिणामों के बारे में चिंतन नहीं करता। लंकापति रावण और महाराज कंस इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। रावण की कुंडली में चंद्रमा पर शनि और केतु का प्रभाव ऐसा है कि उसकी बुद्धि, शिक्षा और उसका पुरुषार्थ उसकी रक्षा करने में असमर्थ रहे। विद्वान होने के पश्चात भी रावण दुष्ट, पापी और नराधम कहलाया। उसकी कुंडली में द्वादशेश बुध
षष्ठ भावगत मीन राशि (नीच) में स्थित हो कर अधोगति (नरक) दे रहा है। इसी प्रकार कंस की कुंडली में चंद्रमा-राहु का योग तृतीय भाव में है और द्वादशेश बृहस्पति शत्रु राशिस्थ द्वितीय भावगत है। यह योग अधोगति की अभिव्यंजना करता है। श्री रामानुजाचार्य, पं. मोतीलाल नेहरु और श्री अरविंद के संबंध में द्वादशेश बुध का योग सूर्य और शुक्र के संग दशम भावगत सूर्य की उच्च राशि मेष में और द्वितीय भावगत सूर्य की स्व राशि सिंह में है। इन तीनों ग्रहों (सूर्य, बुध, शुक्र) की युति वैष्णव योग
बनाती है। सूर्य स्वयं आत्मा का रूप है और आत्मा तत्त्व ज्ञानी है। इसकी स्व और उच्च राशियां अध्यात्मवादी भी हैं। अत: द्वादशेश बुध की इन राशियों में स्थिति निश्चय ही ऊर्ध्व गति की द्योतक है।

ज्योतिष और मोक्ष:

स्वर्ग-नरक और ज्योतिष: Astrology Talk
Astrology and Moksha:

अध्यात्म में प्रगति करने के लिए कर्म, ज्ञान, भक्ति के मार्ग बताये गये हैं। कुंडली में पंचम भाव से ज्ञान, नवें भाव से धर्म और भक्ति, दसवें भाव से कर्म तथा बारह भाव से मोक्ष का पता लगता है। पंचम स्थान: पंचम यदि नवम या लग्नेश के स्वामी से संबंध रखता है, या पंचमेश शुभ ग्रहों के साथ हो, तो जातक ज्ञानी होता है। गुरु नानक की कुंडली में नवमेश मंगल, पंचमेश बृहस्पति एक दूसरे को देख रहे हैं। आदि शंकराचार्य की कुंडली में पंचमेश मंगल नवम में गया है। नवम स्थान: यह धर्म तथा भक्ति का प्रतीक है। नवमेश बली हो, या दशमेश के साथ हो, अथवा दशमेश नवमेश का परिवर्तन योग हो, तो व्यक्ति धर्माचरण करता है। नवम तथा द्वादश भावों का आपस में संबंध हो, तो विदेश यात्रा होती है। यदि शुभ ग्रहों के माध्यम से उच्चतर का संबंध हो, तो स्वर्ग-अपवर्ग मिलते हैं। महर्षि रमन
की कुंडली में नवमेश बुध है, जो द्वादशेश भी है। द्वितीय घर में शुभ ग्रह शुक्र के साथ है, बृहस्पति नवम घर को देख रहा है। दशम स्थान: दशम में बलवान ग्रह हो, नवम- दशम का आपस में संबंध हो, दशम और लग्न का आपस में संबंध हो, तो जातक शुभ कर्म करता है और दयावान, आस्तिक होता है। महात्मा बुद्ध की कुंडली में दशम में बलवान सूर्य और मंगल हैं। साथ में शुभ ग्रह बृहस्पति तथा शुक्र हैं। शांति के उपासक महात्मा बुद्ध हर जीव के प्रति बड़े दयावान थे। राजाधिराज युधिष्ठिर की कुंडली में दशम में उच्च का सूर्य है। उनके कर्म सदैव अकलंकित रहे। द्वादश भाव: बारह भाव में बृहस्पति हो, लग्न तथा बारहों भावों का संबंध हो, व्ययेश दशमेश तथा नवमेश से संबंध रखता हो, तो वह पुरुष मोक्ष की तरफ अग्रसर होता है। स्वामी विवेकानंद की कुंडली में धनु लग्न है। लग्नेश बृहस्पति को
व्ययेश मंगल देख रहा है। लग्न के पास बुध और शुक्र ग्रह हैं।

आध्यात्मिकता की परिभाषा

स्वर्ग-नरक और ज्योतिष: Astrology Talk
definition of spirituality

ज्योतिष में आध्यात्मिकता की परिभाषा एक वाक्य में नहीं दी जा सकती है, क्योंकि योगी, तपस्वी, वैरागी, संन्यासी, या किसी विशेष पंथ के अनुगामी, जो परस्पर विरोधी भी कहे जाते हैं, सबही अपने को अध्यात्म पंथी मानते हैं। भोगों में आसक्ति इंद्रिय सुख के कारण होती है और विरक्ति विवेक
द्वारा इंद्रिय सुख को त्यागने से होती है। जन्म लग्न जाति, आयु, भोग का संकेत देता है। इस विवेक को ही आध्यात्मिकता की संज्ञा दी जा सकती है। ग्रहों से शुभ-अशुभ योग होते हैं, उनमें जो बलवान् हो और जिसका बल अधिक हो, वही फल देता है तथा वही योग का कर्त्ता या कारण होता है। ‘अष्टमं ह्यायुष: स्थानं अष्टमादष्टमं च यत। तयोरपि व्ययस्थानं मारकस्थानमुच्यते।। जन्म लग्न से जो आठवां स्थान है, उसे आयु स्थान कहते हैं। इस आठवें स्थान से जो आठवां स्थान(अर्थात लग्न से तीसरा) होता है, उसे भी आयु स्थान कहते हैं। इन दोनों (आठवां और तीसरा) स्थानों में जो दो
व्यय स्थान (सातवां और दूसरा) हैं, उन्हें मारक स्थान कहते हैं। इस प्रकार जन्म लग्न से सातवां और दूसरा, ये दोनों स्थान मारक स्थान हैं। महर्षि पराशर ने ‘सादृश्य सिद्धांत तथा ‘भाव से भाव सिद्धांत का वैसे तो पृथक-पृथक, किंतु बड़ा सटीक प्रतिपादन किया है। सादृश्य सिद्धांत के अनुसार परस्पर विरोधी अथवा विभिन्न बातों के कुछ विशेष तत्त्वों में पायी जाने वाली समानता या फिर अनेकता में एकता भाव को फल कथन में विशेष प्रमुखता देनी चाहिए, क्योंकि जब एक ही तथ्य के द्योतक एकाधिक ग्रहों का किसी भी प्रकार का संबंध (युति, दृष्टि, राशि परिवर्तन, केंद्र, त्रिकोण, स्थिति इत्यादि) स्थापित हो जाता है, तब उस तथ्य से संबंधित घटनाएं घटित हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त ‘भावात्भा व:, या फिर ‘भावात् भावम, अर्थात ‘भाव से भाव सिद्धांत के अनुसार जो संकेत पंचम भाव, भावक और भावेश देते हैं, वही संकेत पंचम से पंचम, अर्थात् नवम भाव, भावक और भावेश देते हैं। इसी प्रकार जो संकेत नवम भाव, भावक और भावेश देते हैं, वही संकेत नवम से नवम, अर्थात पंचम
भाव, भावक और भावेश देते हैं। पंचम भाव से इष्ट देव, या कुल देव, या फिर आराध्य देव के प्रति प्रेमानुराग, आस्था तथा समर्पण शक्ति और नवम भाव से धार्मिक अनुरक्ति, भाव भक्ति तथा आध्यात्मिक शक्ति का विचार किया जाता है, क्योंकि नैसर्गिक पंचमेश है, ग्रह राज रवि और नैसर्गिक नवमेश है। वैदिक साहित्य में देव गुरु बृहस्पति को पूजा-पाठ, प्रार्थना और उपासना का स्वामी कहा गया है। लौकिक ज्ञान प्रदान करने वाले को गुरु और पारलौकिक (गूढ़) ज्ञान प्रदान करने वाले को सद्गुरु कहा गया है। देव गुरु बृहस्पति को सद्गुरु कहा गया है, जिसका नैसर्गिक
स्वभाव आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करना है। दैत्याचार्य शुक्र और देव गुरु बृहस्पति दोनों को क्रमश: दानवों और देवताओं के मध्य आचार्य तथा पुरोहित के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। शुक्र को संजीवनी विद्या में निपुण कहा गया है। नैसर्गिक कुंडली में इसे दोनों मारक स्थानों (सप्तम उद्योग, धंधा, काम, व्यवसाय तथा पत्नी और द्वितीय विद्या, बुद्धि, दक्षता, धन तथा कुटुंब) का अधिपति माना गया है। ज्योतिष शास्त्र में इसे स्त्री ग्रह कहा गया है।

सरल आध्यात्मिक उपाय – व्यक्ति यदि आध्यात्मिक उपायों का आश्रय ले तो दशा, अंतर्दशा, गोचर में चल रहे विपरीत ग्रह भी शांत हो जाते हैं। जिनको कर के कोई भी व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है तथा ग्रह बाधाओं को दूर करने में समर्थ हो सकता है। चीटियों को शक्कर, चिड़ियों को चावल, पक्षियों को बाजरा, मछलियों को मीठे आटे की गोलियां अक्सर देते रहने से स्वत: नव ग्रह बाधाओं से निवृत्त हो सकते हैं। नित्य प्रति भोजन में पहली रोटी गाय के लिए निकालनी चाहिए। गाय को नित्य गुड़, रोटी देने से ग्रह पीड़ाएं दूर हो जाती हैं। नित्य प्रति अपने भोजन में से, या अलग से भी रोटी या पूरी कुत्ते को देनी चाहिए। इससे केतु ग्रह की बाधा दूर हो जाती है। प्रात: उठने के बाद घर में
यदि माता-पिता एवं बड़े हों, तो उन्हें प्रणाम कर चरण स्पर्श करें। इसके पश्चात ही शौच-स्नान करना चाहिए। ऐसा करने से गुरु ग्रह की कृपा प्राप्त होती है। बुधवार को भगवान गणेश जी पर दूब घास ”ओम् गं गणपतये नम: ”मंत्र से चढ़ाने से बुध ग्रह की बाधा दूर होती है। यदि महादशा चल रही हो, तो विष्णु सहस्र नाम का नित्य, या बुधवार को सुनना चाहिए। नित्य प्रात: उठते ही अपने इष्ट देव का स्मरण कर अपने दोनों हाथों को देख कर निम्न मंत्र पढ़ लेना चाहिए। ‘कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये
सरस्वती। करमूले तु गोविन्द: प्रभाते करदर्शनम।। नित्य प्रति एक पात्र में जल ले कर उसमें गंगा जल, लाल चंदन या रोली, लाल पुष्प डाल कर, भगवान सूर्य नारायण को जल अर्घ्य देना चाहिए। इससे सूर्य देव की कृपा प्राप्त होती है। शय्या पर से उठ कर, पृथ्वी पर पैर रखने से पूर्व, पृथ्वी माता का अभिवादन करें तथा निम्न मंत्र का पाठ करें। इसे पृथ्वी देवी प्रसन्न होती हैं। ‘समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शम् क्षमस्व मे। यदि संभव हो, तो नित्य प्रति शिव जी
पर जल, दूध चढ़ाना चाहिए। छोटा स्फटिक या पारे का शिव लिंग अपने गृह मंदिर में भी स्थापित कर सकते हैं और उन पर जल चढ़ा सकते हैं। सोमवार को तो भगवान शिव पर जल-दूध अवश्य ही चढ़ाना चाहिए। इससे चंद्र, शनि, राहु की बाधाएं दूर हो जाती हैं।

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