भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने पर उनका राज्य अभिषेक किया गया जिस कारण अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाकर उनका स्वागत किया था। यह तो सर्वविदित है, लेकिन इसी दिन समुन्द्र मंथन के दौरान महालक्ष्मी देवी प्रकट हुई थी व सभी देवताओं ने उन्हें भगवान विष्णु जी की पत्नी स्वीकार कर दोनों का विवाह करवाया था।
दैव्यराज हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान मानता था। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद पक्का विष्णुभक्त था। हिरण्यकशिप के बहुत समझाने पर भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो अनेक बार उसे मारने के उपाय असफल होने के बाद जब उसे मारने के लिए वार किया तो भगवान नृसिंह ने वहां प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का वध कर दिया था। तब राक्षसराज के अत्याचारों से मुक्त प्रजा ने दीपक जलाकर खुशियां मनाई थीं। महाप्रतापी और दानवीर राजा बलि ने घोर तपस्या और बाहुबल के दम पर तीनों लोकों पर जब विजय पा ली तो देवतागण घबराकर विष्णु जी की शरण में गए। ऐसे में विष्णु जी वामन रूप धारण कर बलि के पास गए और दान में तीन पग भूमि मांग ली जिसे राजा बलि ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। तब विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को माप लिया लेकिन बलि की दानवीरता से प्रभावित हो उन्होंने उसे पाताल लोक लौटाने के साथ यह आश्वासन दिया कि उसकी स्मृति में प्रतिवर्ष पृथ्वीवासी दीवाली मनाया करेंगे।
दीवाली से एक दिन पहले चर्तुदशी को अत्याचारी राक्षस नरकासुर को भगवान श्रीकृष्ण ने मारकर लोगों को उसके अत्याचारों से मुक्त किया था जिस कारण अगले दिन अमावस्या को दीपक जलाकर खुशियां मनाई थी।
बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध सत्रह वर्षों बाद जब अपने नगर कपिलवस्तु वापिस लौटे थे तो उनके अनुयायियों ने बुद्ध के स्वागत में लाखों दीए जलाकर दीवाली मनाई थी और अपने प्रथम प्रवचन के दौरान ‘अप्पो दीपो भव’ की शुरूआत करके दीवाली मनाने को प्रेरित किया।
पंजाब को अमृतसर में स्थित प्रसिद्ध ‘स्वर्ण मंदिर’ यानि गोल्डन टैंपल का निर्माण भी दीवाली के दिन ही शुरू हुआ था। इसके अतिरिक्त सिखों के छठे गुरू हर गोविदं सिंह जी मुगल सम्राट जहांगीर की कैद से मुक्त होकर कार्तिक अमावस्या वाले दिन वापस अमृतसर लौटे थे।
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन 1883 में अज़मेर में अपने प्राण त्यागे थे, इसीलिए आर्यसमाज में यह दिन विशेष महत्व रखता है।
स्वामी रामतीर्थ दीवाली के दिन ही इस धरती पर अवतीर्ण हुए थे और सन 1906 में इसीदिन उन्होंने अपना शरीर त्यागा था।
कहते हैं कि इस दिन देवी लक्ष्मी ने राक्षसों का धरती से अंत करने के लिए महाकाली का रूप धारण किया था। काफी रक्तपात के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ तो भगवान शिव के स्पर्श मान से ही वे शांत हो गई थी तब से उनके शांत स्वरूप लक्ष्मी की पूजा की शुरूआत हुई।
मुगल सम्राट अकबर के शासन में उनके दौलतखाने के सामने चालीस गज ऊंचे बांस पर एक बहुत ही विशाल आकाशदीप दीवाली के दिन लटकाया जाता था । इसके अलावा जहाॅंगीर और अंतिम मुगल सम्राट से सजाया जाता था और कई तरह के मनोंरजक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे।
यह भी मान्यता है कि कार्तिक अमावस वाले दिन से पितरों की रात्रि आरम्भ होती है अतः वे सब पथ-भ्रमित ना हो जाएं इसीलिए दीयों को जलाकर प्रकाश फैलाया जाता है।
चिकित्सा क्षेत्र में औषधि क्षेत्र से जुड़े लोग दीवाली के पर्व को वातावरण की शुद्धता से जोड़ते हैं। उनका मानना है कि हजारों लाखों की संख्या में जलते दीपों की रोशनी में अंधेरे में विद्यमान अनेक विकार नष्ट हो जाते हैं।
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