बड़े मंदिरों में और जिनके घरों में भी ठाकुरजी की विधिवत सेवा होती है, वहां पांच-छह दिन पहले से ही तैयारियां प्रारंभ हो जाती हैं।

  • सबसे पहले प्रभु को भोग लगाने के लिए अत्यन्त सुन्दर सामग्री (विभिन्न प्रकार की मिठाइयां, नमकीन और मेवा) तैयार होने लगती हैं। जिसमें दो से तीन दिन लग जाते हैं। इसी के साथ-साथ सभी जगह प्रभु की सजावट की तैयारी शुरू हो जाती हैं। हर वर्ष कुछ नई सजावट का प्रयत्न किया जाता है, ताकि आने वाले दर्शनार्थी दर्शन में नवीनता का अनुभव कर आनन्दित हो सकें।
  • हर वर्ष आज के शुभ दिन प्रभु के नए वस्त्र और साज बनते हैं। जन्माष्टमी के पहले दिन रीति के अनुसार प्रभु को लाल रंग का नया वस्त्र धराया जाता है, जो उनके प्रति भक्तों के प्रेम का प्रतीक होता है और जन्म के दूसरे दिन जिसे नन्द उत्सव के नाम से जाना जाता है, उस दिन केसरिया रंग का वस्त्र धराया जाता है, क्योंकि केसरिया रंग आनन्द का प्रतीक होता है। जब प्रभु सुरक्षित रूप से नन्द बाबा के घर पहुंच जाते हैं, तब दूसरे दिन सारे गोकुल में उनके आगमन से आनन्द की लहर दौड़ जाती है। वहां के सब ब्रजवासी नन्द बाबा के घर उन्हें बधाई देने पहुंचते हैं। तब ठाकुरजी को पंचामृत (दूध, दही, घी, चीनी, शहद) से स्नान करवा के शुद्ध जल से स्नान करवाया जाता है। तत्पश्चात् प्रभु को पीताम्बर (केसरिया वस्त्र) पहनाया जाता है और उसके पश्चात् सुन्दर हीरे-जवाहरातों से, सुगंन्धित पुष्पों से, सुसज्जित सुन्दर पालने में बिराज कर रेशम की कोमल डोरी से पालना झुलाया जाता है। नन्द बाबा ने उस दिन हॢषत होकर जैसे सबको मनमानी बधाई बांटकर संतुष्ट किया था उसी परंपरा का पालन करते हुए जिनके घर में ‘बाल कृष्ण लालÓ की सेवा होती है, वो भी किसी न किसी रूप में अपने यहां आए हुए भक्तों को बधाई बांटकर आनन्दित होते हैं।
  • आज के दिन उपवास रखने का बहुत महत्त्व माना जाता है। परन्तु इस उपवास को रखने का ढंग भी भक्तों का अपनी-अपनी भावना के अनुरूप होता है। कुछ भक्त रात को बारह बजे जन्म होने तक सिर्फ पानी पर ही रहते हैं। अन्य कुछ केवल फल-फूल ही ग्रहण करते हैं और कुछ सेंधा नमक (व्रत में उपयोग आने वाला) के साथ साबूदाना और सामा के चावल की खिचड़ी या कुट्टू का आटा, राजगिरा का आटा या सिंघाड़े का आटा भी प्रयोग करते हैं, क्योंकि ये सब फलिहारी की गिनती में आते हैं।
  • आज के दिन उपवास करने की भावना के पीछे एक विशेष कारण यह माना जाता है कि देवकी जी कारागृह में प्रसव पीड़ा  की वेदना सहती हैं, इसलिए कोई भक्त पूरे दिन अन्न ग्रहण नहीं करते और कृष्ण जन्म के बाद जैसे नन्द बाबा की बहन सुनन्दाजी ने अपनी अपार खुशी और हर्ष को थाल बजाकर प्रकट किया था, उसी परंपरा के अनुरूप भी प्रभु के जन्म के बाद बुआ व बहनों से थाल बजवाया जाता है और उन्हें बधाई स्वरूप भेंट देते हैं।
  • जन्माष्टमी की एक विशेषतम बात है कि प्रभु के जन्म की बधाइयां बड़े मंदिरों में और घरों में एक महीना पहले से ही गाई जाने लगती है। गीता में प्रभु ने स्वयं अपने मुखारविन्द से कहा कि संगीत मेरा ही दूसरा रूप है और इसीलिए चारों वेदों में सामवेद मेरा सबसे प्रिय वेद है, क्योंकि उसमें संगीत की ही शिक्षा और ज्ञान है। इसीलिए प्रभु के परम प्रिय अष्ट सखाओं (सूरदास जी, कुम्भन दास जी, कृष्णादासजी, परमानन्द दास जी, गोविन्द स्वामी, नंददास जी, चतुर्भुज दास जी, छीतस्वामी) के द्वारा लिखे गए बधाई के पदों का गायन किया जाता है, जो विशेष रागों पर आधारित होते हैं। इन बधाइयों को गाने का मुख्य उदïेश्य है अपने प्राण प्रिय प्रभु को रिझाना और प्रसन्न करना।

वैसे तो नन्द उत्सव जन्माष्टमी के अगले दिन होता है, जिसमें प्रभु को विशेष रूप से माखन मिश्री और हल्दी वाले दही का भोग लगता है। हल्दी डालने का अभिप्राय है कि ये एक ऐन्टी सैप्टिक का काम करता है और जब नन्द बाबा के यहां नन्द उत्सव वाले दिन हजारों की गिनती में गोप-गोपी दूध, दही और हल्दी की मटकियां भर-भर लाए थे और उत्साह में एक दूसरे पर डाल डाल रहे थे जिससे उनके आंगन में दूध, दही और हल्दी की कीच मच गई थी।

पर हल्दी के ऐन्टी सैप्टिक होने के कारण चोट लगने पर भी सबका बचाव हो गया। और तभी से परंपरागत रूप से उस दिन हल्दी वाले दही का भोग अवश्य लगता है। नन्द उत्सव का आयोजन राधा अष्टमी के पहले दिन तक भक्त अलग-अलग अपने घरों में कर सकते हैं और हाॢदक आनन्द का लाभ ले सकते हैं।

विशेष महत्त्व- जन्माष्टमी वाले दिन प्रभु एक बालक रूप में माने जाते हैं, इसलिए जैसे आप लौकिक में अपने बच्चे के लिए सबके आशीर्वाद की कामना करते हैं, उसी प्रकार जन्माष्टमी वाले दिन ज्यादा से ज्यादा लोगों को आप दर्शन के लिए अपने घर निमत्रण दें ताकि आपके बाल स्वरूप कृष्ण को अधिक से अधिक गोप-गोपियों का आशीर्वाद मिल सके और वही आशीर्वाद प्रभु आप पर बरसाते हैं। जिन्हें निमंत्रण मिला हो वे भी अवश्य जाएं ताकि आशीर्वाद के बदले में प्रभु कृपा का फल पाएं।

इसलिए जन्माष्टमी और नन्द उत्सव दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। हिंदुओं के लिए भगवान कृष्ण के उत्सवों में सर्वोच्च है। बहुत से भक्त जो प्रथम बार अपने घर में लड्ïडू गोपाल की सेवा प्रारंभ करते हैं, वो जन्माष्टमी के दिन को विशेष मानकर उसी दिन शुरू करते हैं। और उस भक्त के ठाकुरजी का वो दिन पाटोत्सव कहा जाता है।

विशेष- श्रीकृष्ण के जन्म के विषय में जो बात शायद बिरले लोगों की जानकारी में होगी वो ये है, जिसे पुष्टिमार्ग के एक आचार्यश्री ने बताया कि भगवान कृष्ण का जन्म 18 जुलाई, 3228 है।

अंतिम समय 18 फरवरी, 3102 है इसके अनुरूप प्रभु श्री कृष्ण ने 126 वर्ष और पांच महीने इस पृथ्वी पर वास किया। 

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