एक पौराणिक मान्यता आज भी प्रचलित है कि हमारी यह पृथ्वी एक विशालकाय सर्प के हजारों फनों पर टिकी है, जो भगवान विष्णु की शय्या है। इसे शेषनाग के नाम से जाना जाता है। शेषनाग दक्षपुत्री कद्रू के पुत्र माने जाते हैं। इनके तक्षक और वासुकि दो भाई थे। सर्पों में सर्वप्रथम शेषनाग का उद्भाव माना जाता है शिव के गले का खास अलंकार सर्प तक्षक माना जाता है।

सर्पों की श्रेणियां

नागों और सर्पों के संदर्भ में पौराणिक विश्वास यह है कि ब्रह्मïजी के मानसपुत्र प्रजापति कश्यपजी की चार पत्नियां थीं। इनमें से एक के पुत्र देवगण हुए, दूसरी के दैत्य, तीसरी के गरुड़ और चौथी पत्नी के सर्प तथा नाग। उस तरह सुर, असुरों के साथ ही सर्पों और नागों का भी उद्भव कहा गया है। यूं तो सर्पों तथा नागों की अनेक श्रेणियां हैं, इनमें शेष, तक्षक, अनंत, वासुकि, पिंगल, शंखपाल, महापद्ïम, कार्कोटक, कालिया, अश्वतर, सुबुद्ध, मंदिसार, पृथुश्रवा, घृतराष्ट्र, हेममाली, जलेन्द्र, वज्र दृष्ट्र तथा विषंदृट्र आदि खास प्रजातियों की चर्चा मिलती है।

ब्रह्मï जी का वरदान

सर्पों का आवाह्वन अर्चना, हवन प्रत्येक यज्ञ में मुख्यरूप से होता है, किंतु नागपंचमी अथवा श्रावण मास की शुक्लपंचमी को नागपूजा के लिए एक खास निश्चित त्योहार है जिसका प्रमाण हमें स्कंद पुराण एवं भविष्यपुराण आदि में मिलता है। वाराहपुराण के अनुसार श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन ही ब्रह्मïजी ने नागों को पूजे जाने का वरदान दिया था। 

श्रावण महीने की शुक्ल पंचमी को नागपूजा का विधान है, इस दिन पांच नागों-अनंत, वासुकि, तक्षक, कार्कोटक और पिंगल की अर्चना होती है, इसलिए इसे नागपंचमी कहा जाता है- पूजयेन्नाग पंचकम्।

इस मौके पर घर के दोनों द्वारों पर गोबर के द्वारा नागों का रूप बनाकर उनकी उपासना का नियम है। गोबर की जगह पर हल्दी अथवा चंदन से अथवा सोना, चांदी अथवा लकड़ी के सर्प की मूर्ति निर्मित कर लगवाएं अथवा सर्पों की आकृति बनाएं। इस दिन जितेन्द्रिय संयम से रहें। दही, दूध, कुशा, गंध, दुग्ध, पंचामृत, फूल, घृत, फल और खीर से आचार्य को भोजन कराएं तथा स्वयं भी यही भोजन करें।

भविष्यपुराण 

भविष्यपुराण के अनुसार बारह नागों की अर्चना करें तथा प्रत्येक महीने की शुक्लपंचमी को भी एक-एक नाग की आराधना करें। इस भांति बारह मासों में बारह नागों अर्थात् अनंतर्पिणी, वासुकि, शेष, पद्म, कंबल, पिंगल, अश्वतर, कर्कोटक, घृतराष्ट्र, शंखपाल, तक्षक, कालिया की अर्चना करें। लगातार 12 सालों तक नागपंचमी की उपासना व्रत करने के बाद उद्यापन करें। सोने या चांदी का नाग बनाकर दान करें। नागपंचमी के दिन अर्चना करने वाले लोगों को जमीन नहीं खोदनी चाहिए तथा न ही सर्पों के प्रति किसी प्रकार का दुर्व्यवहार करना चाहिए।

भविष्यपुराण में एक और दृष्टत आया है, जिसमें कहा गया है कि ‘सर्प के काटने से जिस मानव की मौत होती है, उसकी सद्गति नहीं होती।’ आत्मा निर्विष सर्प की योनि में जन्म लेती है नागपंचमी के व्रत से मृतात्मा की सर्पयोनि से भी छुटकारा मिलता है, इसलिए जिस घर में सर्प के काटने से किसी की मौत हुई हो, वे भी मृतात्मा की मुक्ति हेतु यह व्रत करें। ‘ओम् कुरुकुल्ये हूं फट् स्वाहा’ मंत्र जप करने से सर्प विष नष्ट होता है।

प्रचलित लोककथा

नागपंचमी के बारे में लोककथा भी प्रचलित है। एक ब्रह्मïण के सात पुत्रवधुएं थीं। श्रावण के आते ही छ: बहुओं के भाई बुलाने आते तथा वे सब मायके चली जातीं, किंतु सबसे छोटी बहू के कोई भाई नहीं था, इसलिए वह नहीं जा पाती। इस पर सभी जेठानियां उसे ताना कसती। एक बार सब बहुएं स्नान करने तालाब पर गईं। वहां भी सब बहुओं ने छोटी बहू के भाई-बहन और माता-पिता के न रहने के वजह खिल्ली उड़ाई। तालाब के पास ही सर्पों का एक जोड़ा निवास करता था। सर्प और सर्पिणी बड़ी बहुओं की बातें सुन रहे थे। उस समय सर्पिणी गर्भवती थी। सर्प ने उससे कहा ‘कि इस समय तुम्हें सहायता की जरूरत है। मायके के सुख से वंचित इस छोटी बहू को कुछ दिनों के लिए तुम्हारी सहायता के लिए लाता हूं। बच्चे के जन्म के पश्चात्ï इसे छोड़ आऊंगा।’ सर्पिणी ने अपनी सम्मति दे दी।

एक दिन छोटी बहू घर से दूर गाय चरा रही थी। उसी समय सर्प ने एक युवक का रूप धारण किया तथा उसके पास जाकर कहा- ‘मैं तुम्हारा भाई हूं। सालों पश्चात लौटने पर जानकारी मिली कि मेरी बहन यहां है, इसलिए मैं तुमसे मिलने चला आया। एक दिन मैं तुम्हारे घर आऊंगा तथा तुम्हें ले चलूंगा। कहकर युवक चला गया।’

एक दिन जब परिवार के समस्त लोग खाना खा चुके, तो उनकी बची जूठन को छोटी बहू ने एकत्र कर एक स्थान पर रख दिया तथा बर्तनों को धोने के लिए बाहर चली गई। वापस लौटने पर उसने देखा कि जूठन अपनी जगह नहीं है। इस मध्य सर्पिणी ने जूठन खा ली और छोटी बहू की प्रतिक्रिया जानने के लिए छिपकर बैठ गई। छोटी बहू कहने लगी कि कौन इतना भूखा था कि जूठा भोजन भी खा लिया। उसे मुझसे शुद्ध भोजन मांग लेना चाहिए था। यह सुनकर सर्पिणी अत्यधिक खुश हुई। उसी दिन उसने सर्प से कहा कि ‘वह जाकर छोटी बहू को ले आए।’ सर्प ने सुंदर युवक का वेष धारण किया तथा छोटी बहू के घर गया। वहां उसने अपना परिचय बड़े भाई के रूप में दिया एवं छोटी बहू को लेकर चल पड़ा। रास्ते में सर्प ने अपना वास्तविक परिचय दिया तथा बताया कि तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं है। जब मैं बिल में प्रवेश करने लगूं तो मेरी पूंछ पकड़कर तुम भी प्रवेश कर जाना। छोटी बहू ने वैसा ही किया। भीतर प्रविष्टï होने पर छोटी बहू ने देखा कि सर्पिणी स्वर्ण निर्मित भवन में रत्न जड़ित डोले में सुख से सो रही है। कुछ दिनों पश्चात सर्पिणी ने सात बच्चों को जन्म दिया। जन्म लेते ही सर्प-शिशुओं ने इधर-उधर रेंगना आरंभ कर दिया। छोटी बहू दीपक लेकर उन बच्चों को देखने लगी। इतने में ही एक बच्चा बहू के पैर पर चढ़ गया। इससे छोटी बहू भयभीत हो गई तथा दीपक उसके हाथ से गिर गया जिससे बच्चे की पूंछ जल गई। बड़े होने पर छह बड़े भाई उसे ‘पूंछ कटा’ कहकर चिढ़ाने लगे। इससे व्याकुल होकर पूंछ कटा ने बदला लेने के लिए छोटी बहू को डसने का निश्चय किया। वह छोटी बहू के घर आ गया। उस दिन ‘नागपंचमी’ थी। छोटी बहू व्रत रखकर नागों की पूजा-आराधना करने में व्यस्त थी। सर्पों की उपासना करते देख पूंछ कटा सर्प की समस्त नाराजगी खत्म हो गई। उस सर्प शिशु ने अर्चना में अर्पित नैवेद्य दुग्ध और केले को ग्रहण किया। उसने छोटी बहू को कीमती वस्त्र और स्वर्णाभूषण दिए और पुत्रवती होने का आशीर्वाद भी दिया। तत्पश्चात मणियों की एक माला देते हुए कहा कि ‘तुम नागकुल से सदैव निर्भय रहोगी और आज श्रावण की नागपंचमी के दिन जो महिलाएं हमारी भाई के रूप में अर्चना करेंगी, हम उनकी रक्षा करेंगे।’ मान्यता है कि तभी से स्त्रियां नाग को भाई मानकर पूजा करती हैं।

नागपंचमी के विभिन्न रूप

आजकल नागपंचमी के अनेक रूप देखने को मिलते हैं, अलग-अलग प्रदेशों में भांति-भांति के लौकिक पर्व प्रचलित हैं। कुश्ती-दंगल इत्यादि शारीरिक व्यायाम और खेल कूदों का भी यह दिन माना जाता है। उत्तर प्रदेश आदि में यह त्योहार गुड़ियों के उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। आज के दिन से लड़कियां गुड़ियों का खेल खेलना बंद कर देती हैं। रंग-बिरंगी गुड़िया लेकर लड़कियां चौराहे पर डालती हैं तथा उनके भाई डंडे से उन गुड़ियों को पीटते हैं स्थान-स्थान बच्चों के मनोरंजन हेतु बाजार और मेले लगते हैं। हालांकि इसका कोई शास्त्रीय और वैज्ञानिक आधार नहीं मिलता, इसके पीछे यही भावना अवलोकित होती है कि आज के दिन से खेल-कूदों का विसर्जन (समापन) कर अध्ययन और कृषि आदि प्रयोजनों में समय का सदुपयोग करें।

राजस्थान में नागपंचमी संबंधी अनेक लोक विश्वास और कथाएं प्रसिद्ध हैं खासकर मीणा जनजाति समाज में विश्वास है कि मरने के बाद यदि व्यक्ति को देवयोनि मिलती है, तो व्यक्ति सर्प का रूप धारण करता है। मीणों के साथ गुरासिया भी नागपूजा करते हैं। नागमूर्ति अक्सर आकाश के नीचे किसी देवरे पर स्थापित की जाती है। अनेक वफर पुरुष गोगाजी, तेजाजी, कृलाजी नागों के रूप में पूजे जाते हैं।

शेषनाग और गुजरात में इस पूजा का खास महत्त्व है। भुज में भुजंगेश्वर का मंदिर है जिन्हें पश्चिम बंगाल, बिहार, केरल आदि प्रदेशों में भी यह पर्व श्रद्धा-विश्वास के साथ मनाया जाता है।  

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