जानिए कैसे मनता है देश-विदेश में दशहरा

दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन ‘दश’ व ‘हरा’ से हुई है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा राक्षसराज रावण के दस सिरों को काट उसकी मृत्यु के रूप में आंतक की समाप्ति से है। इस कारण इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। दशहरे से पूर्व हर वर्ष शारदीय नवरात्र के समय मातृरूपिणी देवी नवधान्य सहित पृथ्वी पर अवतरित होती हैं। क्रमश: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री रूप में मां दुर्गा की लगातार नौ दिनों तक पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि नवरात्र के अंतिम दिन भगवान राम ने चंडी पूजा के रूप में मां दुर्गा की उपासना की थी और मां ने उन्हें युद्ध में विजय का आर्शीवाद दिया था। इसके अगले दिन दशमी को भगवान राम ने रावण का अंत कर उस पर विजय पायी, तभी से शारदीय नवरात्र के बाद दशमी को विजयदशमी के रूप में मनाया जाने लगा।

भगवान राम ने रावण को युद्ध में परास्त कर दिया। इसके बाद से प्रतिवर्ष आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन पूरे देश में रावण का पुतला जलाया जाता है। इसी परंपरा के साथ दशहरा का समापन होता है लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में इस पर्व को मनाने के तरीके भी अनेक हैं।

रोहिड़ा का दशहरा

आमतौर पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले सूर्यास्त के बाद ही जलाए जाते हैं। लेकिन राजस्थान के माउंट आबू से 50 किलोमीटर दूर रोहिड़ा देश का इकलौता ऐसा स्थान है जहां रावण रात के 12 बजे तक जलता है। इसके पीछे यहां के लोगों की सदियों पुरानी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। दरअसल रावण को अहंकार का प्रतीक माना जाता है। रावण ब्राह्मण था और प्रकांड विद्वान भी। रावण जो अहंकार का प्रतीक है उसका दहन यहां रात के 12 बजे किया जाता है क्योंकि यह समय महाकाल का होता है और ऐसा माना जाता है कि इस वक्त रावण का दहन होने से रावण यानी अंधकार हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाता है। यह पूजा डेढ़ घंटे तक चलती है। चारों दिशाओं का पूजन कर प्रार्थना की जाती है कि हर दिशा का अहंकार दूर हो और सब जगह प्रकाश फैले। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक दस दिशाएं होती हैं और सभी दिशाओं की पूजा की जाती है। रावण दहन से पहले यहां भव्य शोभा यात्रा निकाली जाती है। शोभा यात्रा में भगवान राम की सेना, महाराणा प्रताप की सेना और छत्रपति शिवाजी की भी सेना होती है। छत्रपति शिवाजी घोड़े पर सवार होते हैं। शोभा यात्रा के दौरान गीत-संगीत का दौर चलता रहता है।

दशहरा के विविध स्वरूप 6

कुल्लू का दशहरा

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा सबसे अलग और अनोखे अंदाज में मनाया जाता है। यहां इस त्योहार को दशमी कहते हैं। आश्विन महीने की दसवीं तिथि को इसकी शुरुआत होती है। कुल्लू का दशहरा परंपरा, रीति-रिवाज और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्त्व रखता है। जब पूरे भारत में विजयादशमी की समाप्ति होती है उस दिन से कुल्लू की घाटी में इस उत्सव का रंग और भी अधिक बढ़ने लगता है। कुल्लू में विजयदशमी मनाने की परंपरा राजा जगत सिंह के समय से चली आ रही है। यहां के दशहरे को लेकर एक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार एक साधु की सलाह पर राजा जगत सिंह ने कुल्लू में भगवान रघुनाथ जी की प्रतिमा की स्थापना की थी। कहते हैं कि राजा जगत सिंह किसी रोग से पीड़ित था। अत: साधु ने उसे इस रोग से मुक्ति पाने के लिए रघुनाथ जी की स्थापना की सलाह दी। अयोध्या से लाई गई मूर्ति के कारण राजा धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा और उसने अपना संपूर्ण जीवन एवं राज्य भगवान रघुनाथ को समर्पित कर दिया।

कुल्लू के दशहरे में आश्विन महीने के पहले पंद्रह दिनों में राजा सभी देवी-देवताओं को धालपुर घाटी में रघुनाथ जी के सम्मान में यज्ञ करने के लिए न्योता देते हैं। सौ से ज्यादा देवी-देवताओं को रंग-बिरंगी सजी हुई पालकियों में बिठाया जाता है। इस उत्सव के पहले दिन दशहरे की देवी हिडिंबा कुल्लू आती हैं तथा राजघराने के सभी सदस्य देवी का आशीर्वाद लेने आते हैं।

रथ यात्रा का भी आयोजन होता है। इस दिन रथ में रघुनाथ और सीता जी तथा हिडिंबा जी की प्रतिमाओं को रखा जाता है।

उत्सव के छठे दिन सभी देवी-देवता यहां आकर मिलते हैं जिसे ‘मोहल्ला’ कहते हैं, रघुनाथ जी के इस पड़ाव पर सारी रात लोगों का नृत्य-संगीत चलता है। सातवें दिन रथ को नदी के किनारे ले जाया जाता है जहां लंका दहन का आयोजन होता है तथा कुछ जानवरों की बलि दी जाती है।

इसके पश्चात् रथ को पुन: उसके स्थान पर लाया जाता है और रघुनाथ जी को रघुनाथपुर के मंदिर में पुन: स्थापित किया जाता है। इस तरह विश्व विख्यात कुल्लू का दशहरा हर्षोल्लास के साथ संपूर्ण होता है। कुल्लू नगर में देवता रघुनाथ जी की वंदना से दशहरे के उत्सव का आरंभ होता है और दशमी के दिन इस उत्सव की शोभा देखने लायक होती है।

दशहरा के विविध स्वरूप 7

मैसूर का दशहरा 

मैसूर का दशहरा काफी विख्यात है। भारत के प्रमुख स्थानों में से एक इस स्थान पर भी विजयदशमी बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। मैसूर का दशहरा ऐतिहासिक, धार्मिक संस्कृति और आनंद का अद्भुत सामंजस्य प्रस्तुत करता है। हालांकि इस उत्सव के दौरान आयोजित होने वाले सभी कार्यक्रम लुभावने होते हैं लेकिन इस उत्सव में 12 हाथी शामिल न हों तो यह उत्सव अधूरा सा लगेगा। सबसे खास बात तो यह है कि इस उत्सव में शामिल होने वाले सभी 12 हाथियों की अपनी अलग विशेषता होती है।

दशहरा उत्सव के आखिरी दिन यहां ‘जंबो सवारी’ आयोजित की जाती है। यह सवारी मैसूर महल से प्रारंभ होती है। इसमें रंग-बिरंगे, अलंकृत कई हाथी एक साथ एक शोभा यात्रा के रूप में चलते हैं और इनका नेतृत्व करने वाला विशेष हाथी अंबारी है, जिसकी पीठ पर चामुंडेश्वरी देवी की प्रतिमा सहित 750 किलो का ‘स्वर्ण हौदा’ रखा जाता है। यह सवारी बन्नीमंडप पहुंचकर समाप्त होती है। बन्नीमंडप से मैसूर महल की दूरी लगभग 3 किलोमीटर है। 

मैसूर का दशहरा मैसूर नगर के इतिहास से जुड़ा है जो मध्यकालीन दक्षिण भारत के अद्वितीय विजयनगर साम्राज्य के समय से शुरू होता है। इस पर्व को वाडेयार राजवंश के लोकप्रिय शासक कृष्णराज वाडेयार ने दशहरा का नाम दिया था। वर्तमान में इस उत्सव की लोकप्रियता देखकर कर्नाटक सरकार ने इसे राज्योत्सव का सम्मान प्रदान किया है। राजा वाडेयार की इच्छा थी कि इस उत्सव को आने वाली पीढ़ियां याद रखें तथा उसी प्रकार से मनाएं, जिस प्रकार विजयनगर के शासक मनाया करते थे। अत: इसके लिए उन्होंने निर्देशिका भी तैयार की थी, जिसमें लिखा था कि किसी भी कारण से दशहरा मनाने की परंपरा टूटनी नहीं चाहिए। कहा जाता है कि दशहरा से ठीक एक दिन पहले राजा के पुत्र नंजाराजा की मृत्यु हो गई थी परंतु फिर भी राजा वाडेयार ने बिना किसी अवरोध के ‘दशहरा उत्सव’ का आयोजन किया और अपनी परंपरा को कायम रखा तथा उनके बाद वाडेयार राजघराने के वंशजों ने भी इस परंपरा को जीवित रखने की कोशिश जारी रखी। वर्तमान समय में मैसूर का दशहरा एक अंतर्राष्ट्रीय उत्सव बन गया है और इस उत्सव में शामिल होने के लिए देश-विदेश से अनेक पर्यटक मैसूर आते हैं। 

दशहरा के विविध स्वरूप 8

बस्तर का दशहरा

बस्तर में दशहरा को मां दंतेश्वरी की आराधना में समर्पित एक पर्व माना जाता है। मां दंतेश्वरी बस्तर के निवासियों की आराध्य देवी हैं, जो दुर्गा का ही एक रूप हैं। बस्तर में दशहरा का त्योहार श्रावण मास की अमावस्या से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है। इसका समापन आश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाड़ी पर्व से किया जाता है।

बंगाल का दशहरा 

यहां यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है, यह उत्सव संपूर्ण बंगाल में पांच दिनों तक मनाया जाता है। देवी दुर्गा की भव्य प्रतीमा पंडालों में स्थापित की जाती है। षष्ठी के दिन दुर्गा जी का पूजन एवं प्राण-प्रतिष्ठा आदि का आयोजन किया जाता है। इसके उपरांत सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी के दिन प्रात: और सायंकाल दुर्गा पूजा होती है। दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। स्त्रियां देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं और एक दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके पश्चात् देवी की प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है।

तमिलनाडु का दशहरा

देश के दक्षिण राज्य तमिलनाडु में दशहरा नौ दिनों तक मनाया जाता है। इस अवसर पर देवी लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा की जाती है। यहां कोई भी नया कार्य, जैसे- शिक्षा, संगीत और नृत्य सीखने के लिए दशहरा शुभ समय माना जाता है।

दशहरा के विविध स्वरूप 9

गुजरात का दशहरा 

गुजरात में भी दशहरे को नवरात्र के रूप में मनाया जाता है। नवरात्र के नौ दिनों तक यहां पारंपरिक नृत्य गरबा की धूम होती है। गरबा नृत्य इस उत्सव की शान है। देवी मां की आरती के बाद डांडिया रास का आयोजन पूरी रात चलता है।

उत्तर प्रदेश का दशहरा

उत्तर प्रदेश में दशहरे की रौनक देखते ही बनती है। अयोध्या और बनारस में इस अवसर पर विशेष आयोजन और तैयारियां की जाती हैं। आश्विन मास में यहां रामलीला, नवरात्र और रावण दहन का आयोजन होता है। रामनगर की रामलीला की ख्याति जगत प्रसिद्ध है। देश-विदेश के हजारों पर्यटक यहां आते हैं। बनारस में नवरात्र की छटा निराली है। घट स्थापना से शुरू हुआ यह उत्सव दस दिन तक चलता है। मंदिरों में दुर्गा पूजा के लिए सुसज्जित पंडाल बनाए जाते हैं। इनमें देवी के नौ स्वरूपों की स्थापना की जाती है और नौवें दिन उन्हें गंगा में विसर्जित कर दिया जाता है। दसवें दिन रावण के पुतले का दहन समारोह होता है।

कश्मीर का दशहरा

कश्मीर में सनातन धर्मी इस पर्व को विशेष महत्त्व देते हैं। नवरात्र के उपवास का विधान तो है ही साथ ही नवरात्र में मां भवानी के दर्शन की भी अटूट परंपरा है। जम्मू के कटरा स्थित वैष्णव धाम में इन दिनों विशेष रौनक रहती है। 

दशहरे को विजयदशमी के अलावा भारत के विभिन्न प्रांतों में बिजोया या आयुध पूजा के रूप में भी मनाने की परंपरा है। वर्षों से अपनी परंपरा और संस्कृति का पालन करते हुए हम बड़े उत्साह से इस पर्व का आयोजन करते आ रहे हैं।

विदेशों में दशहरा

विजयदशमी का त्योहार न केवल भारत में बल्कि अन्य देशों में भी बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भारत के साथ-साथ इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, चीन और थाइलैंड में भी दशहरा काफी उत्साह से मनाया जाता है। विजयदशमी नेपाल में बहुत बड़े स्तर पर मनाया जाता है। यह यहां का सबसे बड़ा त्योहार है। नेपाल या गोरखा सेनाएं बहुत ही अद्भुत ढंग से दशहरा मनाती हैं। मां काली तथा मां दुर्गा की पूजा नौ दिनों तक की जाती है। विजयदशमी वाले दिन राज दरबार में राजा प्रजा को अबीर, चावल, दही का टीका लगाते हैं।  

यह भी पढ़ें –ज्योतिष में रत्नों का महत्त्व