House Wife Importance
House Wife Importance

House Wife Importance: बचपन से यही देखते और सुनते आए हैं कि पुरुष कमाने के लिए और स्त्री घर चलाने के लिए होती है लेकिन आज जब समय बदल रहा है तो स्त्रियां भी पुरुषों की तरह नौकरी कर रही हैं। फिर घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारी केवल उन्हीं पर क्यों है?

पेशे से पत्रकार और नई कविता के प्रखर स्वर रघुवीर सहाय की एक कविता है, ‘पढ़िये गीता’ जिसकी
शुरू की पंक्तियां हैं- ‘पढ़िए गीता/बनिए सीता फिर इन सबमें लगा पलीता/किसी मूर्ख की हो परिणीता/निज घरबार बसाइए। यहां साहित्य पर कोई चर्चा या बहस नहीं होनी है, इन पंक्तियों से आपको केवल इतना याद दिलाना है कि स्त्री चाहे ‘परिणीता’ हो या फिर ‘मिसेज’, उसकी स्थिति 50 साल पहले भी वही थी और
आज भी वही। अब स्थिति ज्यादा खतरनाक हो गई है। उसके ऊपर दोहरी जिम्मेदारी है। पहले केवल, वह घर संभालती थी, अब वह घर और बाहर दोनों संभाल रही है। स्त्रियां काफी हद तक आज आजाद हैं, वे
पढ़-लिख रही हैं, अपने पसंदीदा क्षेत्रों में कार्यरत हैं, आर्थिक निर्भर बन रही हैं लेकिन इस आजादी के लिए उन्हें कितने समझौते करने पड़ते हैं इसे फिल्म ‘मिसेज’ में काफी हद तक दिखाने का प्रयास किया
गया है।

फिल्म की नायिका ऋचा शादी के लिए अपनी टीचिंग जॉब छोड़ देती है। उसकी शादी एक गायनेकोलोजिस्ट से होती है। उसे लगता है कि एक डॉक्टर होने के नाते दिवाकर काफी आधुनिक विचारधारा का व्यक्ति होगा और वह महिलाओं के नौकरी करने के फैसले को बढ़ावा देता होगा।
लेकिन चीजे इसके विपरीत होती हैं, उसकी सास पीएचडी होने बावजूद एक घरेलू औरत बनकर रह जाती है। इस पर ऋचा का ससुर बड़े गर्व के साथ उसे कहता है कि तुम्हारी सास पीएचडी है लेकिन घर के लिए उसने अपने करियर को छोड़ दिया। सोचिए अगर वह कहीं पढ़ा रही होती तो कितनी लड़कियों के भविष्य को बनाने का काम कर रही होती। पति की आर्थिक मदद होती सो अलग!
देखिए, यहां घरेलू से आप यह अंदाजा न लगाएं कि हम उन महिलाओं के विरोध में हैं जो घर में रहती हैं, उनका अपना योगदान है। दिक्कत यह है कि उनके इस योगदान की कोई गणना या वेतनमान तय नहीं है। घर के
सभी कार्यों को उसका कर्तव्य बताकर ‘इमोशनल फूल’ बनाने का प्रयास किया जाता है। कभी आपने अपने घर के पुरुषों से पूछा है कि उन्हें सप्ताह में दो या फिर एक दिन की छुट्टी जरूर मिलती है। लेकिन आप उस दिन भी पति-बच्चों और सासससुर के पसंद का नाश्ता बना रही होती हैं।
12 बजे आपका नाश्ता होता है तो 3 बजे आप खाना खाती हैं। फिर शाम की चाय और पकोड़े और रात में वही डिनर। आपके पास इस बीच व्यायाम या आराम करने तक का समय नहीं होता है। शादी के आठ-दस
साल तो इसी में खप जाते हैं, जब कमांड आपके हाथ में आती है तो घुटनों में दर्द, कमर में मोच सब शुरू हो जाता है।

House Wife Importance
ek phaldar vriksh hai mrs

फाबरॉइड, थायरॉयड, शुगर, बीपी भी पीछेपीछे हो लेते हैं। इसलिए खुद को घरेलू कहलाना बंद करिए। खुद के लिए एक दिन की छुट्टी मुकर्रर कीजिए क्योंकि यह आपका वर्कह्रश्वलेस है, कोई कर्तव्य नहीं। फिल्म ‘मिसेज’ हर लड़की को देखनी चाहिए, इसलिए देखें कि शादी के बाद आपको कितने समझौते करने पड़ते हैं।
लड़कों पर केवल आर्थिक जिम्मेदारी बढ़ती है लेकिन लड़कियों पर सास-ससुर को हमेशा खुश रखने की जिम्मेदारी, पति के पसंद की बीवी बनी रहने का दबाव और रिश्तेदारों के साथ बनाकर रखने का बोझ,
यह सारे उसके खाते में लिख दिए जाते हैं। इससे वह भाग भी नहीं सकती है क्योंकि एशियाई देशों में शादी एक व्यवस्था कम, कर्मकांड ज्यादा है, जिसमें कोई एक भी चीज छूटने पर आपको पाप लग सकता है।
हमारे यहां यह पाप लड़कियों को ज्यादा लगता है। पति का नाम लेने से उसकी उम्र कम हो जाती है, बिछिया न पहनने से उसका मन इधर-उधर भागने लगता है।
क्रच में बच्चा पालने से वह गैर-जिम्मेदार मां बन जाती है। अपनी आजादी और आराम के लिए लड़कियों को काफी मेहनत करनी पड़ती है। उन्हें खैरात में तो कोई एक गिलास पानी भी न दे। अगर वे ऑफिस से आने
के बाद किचन में जाना नहीं चाहती हैं तो इसके लिए उन्हें एक मेड रखनी होगी जिसका खर्चा भी उन्हें ही उठाना होगा। आपकी किस्मत बहुत अच्छी रही तो सास कभी-कभार खाना बना देगी, पोता या पोती को भी संभाल लेगी लेकिन उसके बाद बोनस में भर-भरकर आपको ताने मिलेंगे। बच्चा हम देखते हैं, खाना भी
बना ही देते हैं फिर भी थक जाती है! माता-पिता लड़की को पढ़ाते हैं और दहेज के रूप में वर को घर, गाड़ी, खूब सारा दान-दहेज और एक कमाऊ लड़की देते हैं। ससुराल में पहले भले ही सब दाल-रोटी खाते हों लेकिन बाद में उनका मेनू सेट हो जाता है। अब उन्हें गर्म रोटी ही खानी है। यह बिलकुल ऐसा ही है

जैसे एक माली गमले में जब पौधा लगाता है तो दिन-रात उसे पानी व खाद से सींचता है लेकिन बाद में किसी और को दे देता है। माली को तो लगा कि गमले में उसकी जड़ें अच्छे से बढ़ नहीं रही थीं। एक बड़ी जमीन उसे मिलेगी तो वह पर्याप्त पानी और पोषण के साथ बड़ा होगा लेकिन कई बार पौधा सूख भी जाता है।
क्या ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती कि जिस तरह लड़की अपनी गृहस्थी बनाने के लिए घर छोड़ती है, लड़का भी अपना घर छोड़ दे। दोनों अपने माता-पिता की जिम्मेदारी निभाएं, इसमें कोई खराबी तो नहीं है। ऐसा भी हो सकता है कि दोनों के माता-पिता साथ रहें लेकिन इसके सबसे पहले लड़की के माता-पिता खुद को इस अपराधबोध से निकालें कि वह लड़की के घर रह रहे हैं। बेटी की शादी आपके लिए बोझ या कर्तव्य नहीं बल्कि
एक उत्सव होना चाहिए। जिसे वह जीवन भर सेलिब्रेट कर सके।

ek phaldar vriksh hai mrs
ek phaldar vriksh hai mrs

मिसेज होना लड़कियों के सेलिब्रेशन होना चाहिए एक कर्तव्य या जिम्मेदारी नहीं। क्या आप जानते हैं हमारी घर की ‘मिसेज’ कौन है, वह एक फलदार वृक्ष है। ऐसा फलदार वृक्ष जो आपके घर आकर आपकी सभी जिम्मेदारियों को उठाती है बल्कि उसे निभाने का प्रयास भी करती है। इस फलदार वृक्ष को सम्मान
और समान दर्जा देकर पोषित करें।

हर माता-पिता के लिए उनकी बेटी की शादी बोझ या कर्तव्य नहीं बल्कि एक उत्सव होना चाहिए। जिसे वह जीवन भर सेलिब्रेट कर सके।