Meditation Techniques: जिसमें मन में सोचना कुछ न पड़े और हरकत हो उसको बोलेंगे क्रिया। और जिस क्रिया को सोचकर करना पड़े वो हो गया कर्म।
क्रिया रूप से कौन? जिसमें हमने मन से कुछ किया, मन में एक संकल्प जगाया तो मन में एक वृत्ति उठी कि ये करना है। जैसे पैर थक गए पैर बदलना है, तो पैर बदलने की सोच जब उठी, तो पैर बदले। ये हुआ कर्म लेकिन कान खुले हैं, नाक खुली है, स्पर्श इंद्रिय खुली है, अब इसमें सोचने की जरूरत नहीं कि मुझे सर्दी शरीर में लगे ऐसा मैं विशेष संकल्प करूं तो मुझे सर्दी लगे। सर्दी लगती जाएगी, सोचना नहीं पड़ेगा इसमें। पैर बदलने के लिए सोचना पड़ेगा। आंख खुली है, अब आंख बंद कर लूं तो आंख बंद कर ली। आंख बंद करना तो कर्म हो गया, पर ये जो पलकें झपकी जा रही हैं ये कर्म नहीं है, ये क्रिया हो गई।
जिसमें मन में सोचना कुछ न पड़े और हरकत हो उसको बोलेंगे क्रिया। और जिस क्रिया को सोचकर करना पड़े वो हो गया कर्म। अब पलकें झपकी जा रही हैं तुम ध्यान से देखो, ध्यान के तो महाराज इतने तरीके हैं जिसका कोई हिसाब नहीं है। एक ध्यान यह है कि तुम दीवार की ओर मुंह करके बैठ जाओ कोई दृश्य सामने न हो। तुम दीवार की ओर मुंह करके बैठ जाओ, जैसे रात के सूफी ध्यान में मोना बार-बार दीवार की ओर जाए, बार-बार वहीं जाए। हमने पूछा, ‘वहां क्या था?’ बोली, ‘वहां क्या, अंदर ही कुछ नहीं था।

वहां क्या होता।’ दीवार की ओर आंखें करके कुछ नहीं करना, बस अपनी वृत्ति को अपनी पलकों पर केंद्रित करना। जितनी दफे पलक झपकी जाएं, उतनी दफे बिना तुम्हारे ज्ञान के न झपकी जाएं। जैसे पलकें अभी भी झपक रही हैं, पर उस ओर तुम्हारे मन का ध्यान नहीं है। मन की एकाग्रता के लिए धारणा, धारणा का एक तरीका, दीवार की ओर मुंह करके बैठ जाओ और एक बार भी पलक झपकी बिना तुम्हारे मन के जाने न होती हो।
अभी भी सुनते-सुनते जब पलक झपक रही है तो तुम्हें मालूम हो रही है कि पलक झपकीं। पलकें पहले नहीं झपक रही थीं? बोलो! बोलो! हमारे कहने के बाद झपक रही हैं। अच्छा, तुम चाहो कि पलकें न झपकें, तो यह भी नहीं हो सकता। वो भी नहीं हो सकेगा।
बच्चे अक्सर खेल खेलते हैं। बच्चों को देखा, आमने-सामने बैठ जाएंगे, वो कहते हैं दोनों आंखें खोलकर बैठो और जो पहले पलक झपक गया वो हार गया। अब दोनों बच्चे बैठते हैं, आंख में आंख गड़ायी हैं। और इतनी बारीकी से पलक झपकी जाती हैं कि दूसरा कहता है तुमने झपकीं और वह कहता कि नहीं झपकीं। इतनी बारीकी से, इतनी सूक्ष्मता से, माने अंदर तो सोच रखा है कि पलक नहीं झपकाएंगे। लेकिन पलक को तो झपकना है, वह झपक ही जाएंगी।
