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ज्योतिर्लिंग, रावणेश्वर महादेव: Ravaneshwar Mahadev
Ravaneshwar Mahadev

Ravaneshwar Mahadev: शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है पूर्वी भारत में देवधर के ‘रावणेश्वर महादेव’। उनके देवधर में आवास की कथा बेहद रोचक और अद्ïभुत है। लंकापति रावण की मां शिवभक्त थी। एक बार वो मिट्टी का शिवलिंग बनाकर पूजा कर रही थीं। शिव की स्तुति करके उन्होंने जलाभिषेक के लिए जैसे ही लिंग पर पानी डाला, वह घुल गया। तब रावण ने विचार किया कि यदि वह शिव को लंका में रहने के लिए राजी कर ले तो उसकी मां को शिव के नाशवान प्रतीक रूप की पूजा नहीं करनी पड़ेगी। वह साक्षात शिव की पूजा करने लगेंगी।
अपने नेक विचार को कार्य रूप देने के लिए रावण कैलाश पर्वत गया और वहां तपस्या करने लगा। शिव खुश हुए, तो उसने शिव से लंका में रहने का अनुरोध किया। शिव ने लंका में रहने की बात नहीं मानी, पर सांत्वना के तौर पर अपने बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक उसे दे दिया। इस शर्त के साथ कि वह लंका जाते हुए रास्ते में ठहर कर ज्योतिर्लिंग को कहीं जमीन पर न रखे अन्यथा लिंग वहीं अचल होकर रह जाएगा।
उधर देवताओं में खलबली मच गई। वे जानते थे कि ज्योतिर्लिंग लंका में पहुंच गया तो फिर वे रावण का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। तब देवताओं ने ज्योतिर्लिंग को लंका न पहुंचने देने की साजिश रची। जल के देवता वरुण ने रावण के शरीर में प्रवेश करके अपना खेल दिखाया। रावण को लघुशंका लगी। वह आकाशमार्ग से नीचे धरती पर आया। धरती पर उसे एक ब्राह्मïण मिला, जो दरअसल छद्म वेश में भगवान विष्णु थे। रावण ने ब्राह्मïण से ज्योतिर्लिंग कुछ देर के लिए पकड़ने का अनुरोध किया और निवृत होने चला गया। लौटा तो ब्राह्मïण यहां नहीं था। ज्योतिर्लिंग धरती पर पड़ा था। रावण ने उसे उठाने के लिए अपना सारा जोर लगा लिया पर वह टस से मस नहीं हुआ। रावण को अपनी चूक समझ में आई। उसने शिव से क्षमा याचना की। इसके बाद शिव की पूजा करने रोज वहीं आने लगा। शिव के जलाभिषेक के लिए वह गंगोत्री के गोमुख से गंगाजल लेकर आता। कुछ समय बाद वहां चन्द्रकूप नामक कुआं खोदा गया, जिसमें सभी पवित्र नदियों और सरोवरों का पानी रखा जाने लगा। ज्योतिर्लिंग के स्थान पर बने रावणेश्वर महादेव के मंदिर के आगे यह कुआं अब भी मौजूद है।
रावण के मारे जाने के बाद के यह स्थान उपेक्षित हो गया था। बहुत समय बाद पास के जंगल में शिकार करने वाले बैजू नाम के एक शिकारी ने शिवलिंग देखा और वह उसकी पूजा करने लगा। उसके नाम पर बैजनाथधाम पड़ गया।
देवधर की यात्रा सावन के महीने में होती है। यह पटना से 210 किलोमीटर दूर सुलतानगंज से शुरु होती है। पटना से 210 किलोमीटर पूर्व में स्थित सुलतानगंज में गंगा अपने प्रवाह के विपरीत उत्तरोन्मुखी हो जाती है। ऐसा मात्र एक और स्थान पर अर्थात वाराणसी में होता है। इस परिवर्तन के कारण सुल्तानगंज में गंगा का पानी विशेष रूप से पवित्र माना जाता है। यात्रा करने वाले देवधर में ज्योतिर्लिंग के जलाभिषेक के लिए सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर जाते हैं।
सुल्तानगंज से कुछ आगे गंगा नदी के एक द्वीप में ‘अजगैबीनाथ ‘ का मंदिर है। इसका निर्माण बाबा हरिनाथ ने कराया। वे शिव के परम भक्त थे और सुल्तानगंज से पानी लेकर देवधर आया करते थे। एक बार उन्हें रास्ते में एक ऐसा बूढ़ा आदमी मिला, जो प्यास से तड़प रहा था। हरिनाथ ने उसे पानी पिलाया, तो वह उनका सारा पानी पी गया। देवधर में चढ़ाने के लिए एक बूंद भी नहीं बची तब हरिनाथ पानी लेने वापस सुल्तानगंज जाने लगे। तभी आकाशवाणी उनके कान में पड़ी कि शिव उनसे खुश हैं उन्हें देवधर जाने की जरूरत नहीं। वे सुल्तानगंज में ही पूजा कर लें। सुल्तानगंज के पास ही एक द्वीप में हरिनाथ को शिव की एक मूर्ति मिली। मूर्ति चूंकि विचित्र तरीके से मिली थी, इसलिए उसका नाम ‘अजगैबीनाथ’ पड़ गया।
देवधर के यात्री सुल्तानगंज से जल प्राय: कांवरों में ले जाते हैं। पहले वे अजगैबीनाथ जाकर जल चढ़ाते हैं। फिर लौटकर सुल्तानगंज आते हैं।

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