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सभ्यता, संस्कृति और अध्यात्म का एक अनोखा मेला, जिसे हम श्रावणी मेला के नाम से जानते हैं,  ​का आरम्भ जुलाई से होता ​ है। शिव के जितने रूप हैं और उनकी भक्ति के जितने स्वरूप हैं वे सब इस मेले में देखने को मिलते हैं। पूरा देश सत्यम् शिवम सुंदरम हो जाता है। ‘बोल बम’ का जयकारा पूरे एक महीने तक चलता है और हमारे देश की एकता और पवित्रता की झलक भी हमें मिल जाती है। जो रौनक कुंभ मेले में दिखती है कमो-वेश वही उत्साह और उमंग श्रावणी मेले में भी दिखती है।  हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र मास से आरंभ होने वाला वर्ष का पांचवा महीना श्रावण का होता है। आषाढ़ की पूर्णिमा से श्रावणी मेले का आरंभ होता है। सवा महीने चलने वाले इस मेले में कांवरियों की संख्या लाखों तक पहुंच जाती है। हजारों भक्त ऐसे भी हैं जो न जानें कितने वर्षों से कांवड़ लेकर जाते हैं। अब तो महिलाएं भी इस यात्रा में शामिल होने लगी हैं।

वैसे तो यह मेला शिव से जुड़े कई तीर्थस्थलों में लगता है, लेकिन झारखंड के देवघर का मेला देशभर में सर्वाधिक प्रसिद्ध  है। बिहार के सुल्तानगंज (भागलपुर) से भक्तगण गंगाजल लेकर अपनी यात्रा आरंभ करते हैं और झारखंड के देवघर अर्थात् बाबाधाम में भगवान शिव को जल अर्पित कर यात्रा को समाप्त करते हैं। सुल्तानगंज गंगा नदी के तट पर स्थित है। यहां बाबा अजबैगीनाथ का विश्व प्रसिद्घ मंदिर है। उत्तरवाहिनी गंगा होने के कारण सावन में लाखों कांवड़िये देशभर से यहां गंगाजल लेने आते हैं। सुल्तानगंज से जल लेकर देवघर तक लगभग 115 कि.मी. की दूरी भक्तगण चार से पांच दिनों में तय करते हैं। कांवड़ में गंगाजल लेकर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों का जलाभिषेक करने की यह परंपरा ‘कांवड़ यात्रा’ कहलाती है और भक्त ‘कांवड़ियां’। कांवड़िये अपने कांवड़ को फूलों से, घुंघरूओं से सजाते हैं और साथ ही उसमें दो जलपात्र भी लगाते हैं, जिनमें गंगाजल भरा होता है। इसे कंधे पर लेकर कई किलोमीटर की पैदल यात्रा वे उत्साह के साथ पूरी करते हैं। पूरे एक महीने सुल्तानगंज से लेकर बाबाधाम अर्थात् देवघर की ओर जाने वाली सड़कें भगवाधारियों से भर जाती हैं और गूंजते हैं तो सिर्फ बोल बम के नारे। कांवड़िये और उनके कांवड़ दोनों ही भगवा रंग में रंगे होते हैं।

पिछले कुछ वर्षों से श्रावणी मेले में बढ़ती भीड़ को देखते हुए, जिला प्रशासन की तरफ से भी भक्तों की सुविधा हेतु काफी इंतजाम किए जाते हैं।आजकल दिल्ली जैसे बड़े और व्यस्ततम शहर में भी इस महीने बड़ी संख्या में कांवड़ियों की पैदल यात्रा देखने को मिलती है। हरिद्वार, उत्तराखंड, बनारस के मंदिरों में भी भोलेनाथ के जलाभिषेक के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है। खासकर सोमवार के दिन। 

कहते हैं, श्रावण मास में जब समस्त देवी-देवता विश्राम करते हैं तब शिव-पार्वती के साथ पृथ्वी लोक पर विराजमान होकर अपने भक्तों के कष्ट’ हरते हैं।  ऐसी मान्यता है कि भोलेनाथ कांवड़ से जल चढ़ाने से सर्वाधिक प्रसन्न होते हैं। कहा जाता है, कि जब समुद्रमंथन के बाद 14 रत्नों के साथ विष भी निकला था तो भोलेनाथ ने उस विष का पान कर विश्व की रक्षा की थी। विषपान करने से उनका कंठ नीला पड़ गया था और इसी विष के प्रकोप को कम करने के लिए शिवलिंग पर जल चढ़ाया जाता है। इस जलाभिषेक से प्रसन्न होकर भगवान शिव अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। कंधे पर कांवड़ लेकर ‘बोल बम’ का नारा लगाते चलना पुण्यदायक माना जाता है। ‘आनंद रामायण’ में इस बात का उल्लेख मिलता है कि श्रीराम ने कांवड़ियां बनकर सुल्तानगंज की उत्तरावाहिनी गंगा के जल से देवघर स्थित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक किया था। और तभी से जल चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई। श्रीराम को पहला कांवड़िया भी माना जाता है। बैद्यनाथ मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक माना जाता है। इसे बाबाधाम भी कहते हैं।

लोक आस्था के अनुसार श्रावण मास में शिव शंभु बैद्यनाथ धाम और अजबैगीनाथ धाम में साक्षात् विद्यमान रहते हैं, जहां उनकी पूजा द्वादश ज्योतिर्लिंग और अजबैगीनाथ महादेव के रूप में होती है। इसकी मान्यता के पीछे एक कहानी भी है, जो लंकापति रावण से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार रावण भोलेनाथ को प्रसन्न करने हेतु हिमालय पर तप कर रहा था। वह एक-एक करके अपने सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ा रहा था। नौ सिर चढ़ाने के बाद जब रावण अपना दसवां सिर काटने वाला था। भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए एवं वर मांगने को कहा। तब रावण ने भगवान शंकर से कैलाश छोड़कर लंका चलने की इच्छा व्यक्त की, इस पर भोलेनाथ ने कहा कि, ‘वह उनके शिवलिंग को ले जा सकता है, वह भी उनका ही अंश है।’ रावण शिवलिंग को लेकर जाने को हुआ, तभी भोलेनाथ ने एक शर्त रख दी, जिसके अनुसार रावण शिवलिंग को धरती पर नहीं रख सकता, यदि वह ऐसा करता है तो शिवलिंग उसी धरती पर स्थापित हो जाएगी।

रावण शिवलिंग को लेकर लंका की ओर बढ़ता है। रास्ते में उसे ‘चिताभूमि’ में लघुशंका लग जाती है। तभी उसे एक बालक दिखाई देता है। उस बालक को शिवलिंग थमाकर रावण लघुशंका करने चला जाता है। पौराणिक कथानुसार भगवान विष्णु ने वरुण देव को आचमन के जरिए रावण के पेट में घुसने को कहा। इस कारण रावण कई घंटों तक लघुशंका करता रहा। इधर वह बालक शिवलिंग को धरती पर रखकर चला गया। जब रावण लौटकर आया तो लाख कोशिशों के बावजूद शिवलिंग को नहीं उठा पाया। तब उसे भगवान की लीला समझ में आई। क्रोध में आकर रावण ने शिवलिंग को अपने अंगूठे से धरती में दबा दिया और वापस लंका चला गया। उसके बाद ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं ने उस शिवलिंग की पूजा की और शिवलिंग को वहीं स्थापित कर वापस स्वर्ग को लौट गए। तभी से महादेव ‘कामना लिंग’ के रूप में देवघर में पूजे जाते हैं। कहते हैं यहां जलाभिषेक करने से भक्तों की मनोकामना पूर्ण हो जाती है। इसलिए इसे ‘कामना लिंग’ भी कहते हैं।

श्रावणी मेला मूलत: आस्था का मेला है। लेकिन यह मेला पूरे एक महीने तक कई छोटे-मोटे दुकानदारों के लिए व्यापक रोजगार का भी जरिया बन जाता है। कांवड़ियों के लिए जगह-जगह छोटी-छोटी दुकानें भी सजाई जाती हैं, जहां वे अपनी आवश्यकतानुसार गंजी, बनियान, तौलिए, जल-पात्र, अगरबत्ती, टॉर्च आदि चीजें खरीद सकें। शिव भक्तों के साथ-साथ स्थानीय दुकानदार भी इस मेले का बेसब्री से इंतजार करते हैं। वैसे कई जगह कांवड़ियों के लिए नि:शुल्क विश्राम की भी व्यवस्था की जाती है।

कांवड़ियों के लिए तेल, साबुन, कंघी और अन्य श्रृंगार प्रसाधनों का प्रयोग, तामसिक भोजन, नशा, मांस-मदिरा वर्जित है। देश में लगने वाले बाकी मेलों से बिलकुल अलग है यह मेला। ‘मेला’ शब्द आते ही एक ऐसी जगह की कल्पना होती है, जहां लोग घूमने-फिरने, समय बिताने, मौज-मस्ती करने और खाने-पीने आते हैं। लेकिन श्रावणी मेले में शामिल होने के लिए जरूरी है आपके अंदर आस्था और साहस का होना। कई कठिनाइयों को पार कर पूरा होता है यह श्रावणी मेला। भक्तों के कदमों को ना तो धूप, न बारिश, ना ही उबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ते रोक पाते हैं और ना ही लगातार नंगे पैर चलने की वजह से पैरों में पड़े छालें। शिव में आस्था इतनी गहरी होती है कि इतना बड़ा सफर भी उनके भक्त कष्टों को भूलकर तय कर लेते हैं और देवघर से लेकर हरिद्वार तक  गूँज उठती है – ‘बोलबम का नारा है, बाबा एक सहारा है

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