Mahakumbh Mela: स्नान, दान का महापर्व कुम्भ आस्था का ऐसा मेला है जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्घालु जन पहुंचते हैं। मेला किन अर्थों में महत्त्वपूर्ण व किस प्रकार सामाजिक आदर्श का प्रतीक बन सकता है आइए जानते हैं लेख से।
अनेकता में एकता के वाहक देश भारत को पर्वों का देश कहा जाता है। भारतीय पर्वों की लंबी सूची में स्नान पर्वों का विशेष महत्त्व है। इन्हीं स्नान पर्वों में शामिल है कुम्भ पर्व। समुद्र मंथन के दौरान प्राप्त अमृत के लिए जब देवताओं तथा राक्षसों में टकराव हुआ तो देवता अमृत की रक्षा के लिए विभिन्न कंदराओं में छिपे। उसी दौरान अमृत की कुछ बूंद जिन चार स्थानों पर गिरीं, वहां कुम्भ नामक पर्व मनाया जाता है। प्राचीन
भारतीय ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि अमृत कलश से अमृत की कुछ बूंदे, जिन स्थानों पर गिरीं, उनमें इलाहाबाद (अब प्रयागराज, उ.प्र.), नासिक- र्त्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र), उज्जैन (म.प्र.) तथा हरिद्वार (उ.प्र.) का समावेश है। उत्तर प्रदेश की प्रमुख धार्मिक नगरी इलाहाबाद में जिसे कुछ दिनों पहले ही प्रयागराज नाम दिया गया है, में इस वर्ष अर्धकुम्भ का आयोजन किया जाएगा।
मकरसंक्रांति (14 जनवरी) से शुरू होने वाला यह अर्धकुम्भ मेला शिवरात्रि (4 मार्च) को समाप्त होगा। कुम्भ मेले में शाही स्नान की परंपरा का अनुपालन प्रयागराज में होने वाले अर्धकुम्भ में भी किया जाएगा।
इसके तहत 14 तथा 15 जनवरी, 2019 को पहला शाही स्नान होगा, जबकि 4 फरवरी, 2019 को मौनी अमावस्या के दिन दूसरा शाही स्नान होगा। वसंत पंचमी के दिन 10 फरवरी को तीसरा, माघी एकादशी के दिन
16 फरवरी को चौथा, 19 फरवरी माघी पुर्णिमा को पांचवां तथा महाशिवरात्रि के अवसर पर 4 मार्च को छठवां शाही स्नान होगा। इन सभी शाही स्नानों में एक बात बड़ी प्रखरता से देखने को मिलेगी कि नदी के तट पर भेदभाव भूल कर सभी एक साथ आस्था की डुबकी लगाते हुए दिखाई देंगे।
कुम्भ पर्व पर आस्था की डुबकी लगाने वालों में सभी वर्गों के लोगों का समावेश रहता है। कुम्भ के दौरान होने वाले शाही स्नान में नागा साधुओं का विशेष महत्त्व होता है, ये शाही स्नान का मुख्य आकर्षण होते हैं। कुम्भ स्नान में नागा साधुओं को विशेष महत्त्व इसलिए दिया जाता है, क्योंकि इन्हें भगवान शिव का प्रतिनिधि
माना जाता है, इसलिए पहले नागा साधु स्नान करते हैं, उसके बाद अन्य लोगों को स्नान करने का अवसर दिया जाता है।
एकता का परिचायक
कुम्भ मेले के स्वरूप के बारे में अगर गंभीरता से चिंतन किया जाए तो यह स्पष्ट होगा कि यह पर्व एकता का परिचायक है। प्रयागराज में गंगा, यमुना तथा सरस्वती इन तीन नदियों का संगम है और संगम के इसी
पानी में डुबकी लगाकर अपने शरीर को पवित्र तथा संगम का पानी घर में लाकर घर को पवित्र करने की पुरानी परंपरा के पीछे का उद्देश्य यही है कि सभी कुशल मंगल रहें। ग्रामीण क्षेत्रों में नदियों-पोखरों में स्नान
करना तो आम बात है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ ऐसे लोगों का भी समूह मिल जाएगा, जो हर दिन पोखरों, जलाशयों में स्नान करता है। लेकिन किसी विशेष तिथि पर नदियों मे स्नान करने का उद्देश्य कुछ अलग ही होता
है। नदियों में जब बड़ी संख्या में लोग स्नान करते हैं तो उससे एकता का संकेत समाज में प्रसारित होता है। लेकिन लाखों लोगों की भीड़ में ज्यादातर लोग जब स्वच्छता जैसे सामाजिक दायित्व की ओर ध्यान नहीं देते
हैं तो बड़ी टीस होती है।
स्वच्छता का भी परिचायक बने कुम्भ
मेले के दौरान स्वच्छता किसी चुनौती से कम नहीं होती। आस्था के सागर में डुबकी लगाने वाले लाखों लोगों में कुछ बिरले ही ऐसे होते हैं, जो अपने तन की तरह मन तथा मेला परिसर को स्वच्छ रखने की मंशा रखते हैं, ऐसे वक्त यह गीत याद आता है कि राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते धोते। आस्था के सागर में डुबकी मारने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस बात पर विशेष रूप से ध्यान देना होगा कि हमें उस गंगा, यमुना तथा सरस्वती के संगम में अपने पापों को तो धोना ही है। साथ ही यह भी संकल्प लेना है कि जिस तरह आज हम अपना तन धोने के लिए इस नदी में स्नान करने के लिए आए हैं, उसके पानी में डुबकी लगाकर अपना तन स्वच्छ, निर्मल कर रहे हैं, उसी तरह हमें अपनी धरती माता को भी स्वच्छ सुंदर रखना है। जिस धरा पर
कुम्भ मेला आयोजित होगा, वह धरा बहुत पवित्र है, इस बार को ध्यान में रखकर उस धरा की पवित्रता पर दोई दाग न लगे, इसके लिए सभी को संकल्प भी लेना होगा। हमारे देश में भूमि को माता की संज्ञा दी गई है,
ऐसे में हम सभी की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि हम अपनी भूमि माता को स्वच्छ सुंदर रखें। नदियों में स्नान करके पुण्य प्राप्ति की कामना की पूर्ति करने के लिए, धरा को वसुंधरा बनाने के लिए तथा पुण्यार्जन के लिए कुम्भ मेले में स्नान करने का लक्ष्य हर किसी को रखना होगा। हमारी प्रगति हो और दूसरों का नाश ऐसी कामना रखने वाले लोगों की कभी प्रगति नहीं हो सकती। प्रयागराज में कुम्भ के दौरान स्नान करने के लिए आने वाले हर व्यक्ति को केवल यह सोचकर संगम में डुबकी नहीं लगानी हैं कि हमें नदी में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होगी। पुण्य की प्राप्ति में अगर स्वार्थ रूपी गंदगी होगी तो पुण्य की प्राप्ति नहीं होगी, इसलिए कुम्भ में स्नान करने से पहले मन का शुद्धिकरण होना जरूरी है। छल, कपट, द्वेष, लालच, अहंकार, गर्व, स्वयं को सबसे ज्यादा ज्ञानी समझना, जैसी कुछ बातें ऐसी हैं, जिसका त्याग होना जरूरी है, अन्यथा एक क्या हजारों बार डुबकी लगाने के बावजूद पुण्य की प्राप्ति नहीं होगी।
कुम्भ का बदलता स्वरूप

समय के बदलाव के साथ आस्था के महापर्व कुम्भ मेले के स्वरूप में भी काफी बदलाव हुए हैं। केवल स्वदेशी ही नहीं विदेशी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनने वाले कुम्भ मेले में हर आयु, हर वर्ग के लोगों की बढ़ती सहभागिता ही यह बताने के लिए काफी है कि कुम्भ मेला का कलेवर बदल रहा है। हाथ में मोबाइल लेकर बाईक पर सवार मेला परिसर में भ्रमण करने वाले साधु संत हों, या फिर कुम्भ विषय पर शोध करने वाले देशी, विदेशी लोग हों, उनके माध्यम से कुम्भ मेले में कितना बदलाव हुआ है, इसकी जानकारी मिलती है। प्राचीनकाल से भारतीय जनमानस में अपना विशिष्ट स्थान बनाने वाले कुम्भ मेले में बदलाव तो हुए हैं,
लेकिन सबसे खास बात यह है कि इस मेले ने अपने मूल स्वरूप को बिगड़ने नहीं दिया है। इतना ही नहीं इस पर्व ने अपना लिबास तो बदला है, लेकिन अपनी पुरातन परंपरा को भी बनाए रखा है। शाही स्नान, आखाड़ों
की महत्ता आज भी बरकार है और भविष्य में होने वाले कुम्भ मेलों में भी बरकरार रहेगी। आधुनिक तकनीक से लैस युवापीढ़ी की भी इस पुरातन पर्व के प्रति विशेष दिलचस्पी है। वे इस पर्व को आधुनिकता के रंग में रंगने के प्रति उत्साही भी नजर आ रहे हैं। एकता, समानता तथा आस्था के चरम पर पहुंचा यह पर्व आने वाले समय में और भी बदलेगा इसमें किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं है। प्रयागराज, नासिक- र्त्यंबकेश्वर, उज्जैन तथा हरिद्वार में होने वाले कुम्भ मेले में एकता, समानता के संदेश के साथ-साथ यह कुम्भ मेला स्वच्छता का एक ऐसा संदेश देते हुए समाप्त हो कि हर तरफ स्वच्छता तथा हरियाली दिखायी दे।
स्नान पर्वों के मौके पर स्नान के बाद नदी तट पर कुछ ऐसा दृश्य दिखे कि लोग कहें की वाह क्या बात है। जिन स्थानों पर कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है, वे स्थान समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत की बूंदों से पवित्र
हुए हैं, इसलिए उस धरा का विशेष सम्मान किया जाना चाहिए। कुम्भ का एक प्रतीकात्मक अर्थ संग्रह करना भी होता है।
नवरात्रि के अवसर पर कुम्भ स्थापित करने की परंपरा के पीछे का भाव भी यही है कि कुम्भ जिस तरह से अपने भक्तों के अवगुणों को स्वयं में समाहित कर लेता है,
उसी तरह भक्त को भी अपने अवगुणों का परित्याग करने के लिए सदैव तत्पर रहना होगा। कुम्भ, अर्धकुम्भ, महाकुम्भ या फिर नासिक में होने वाला सिंहस्थ कुम्भ में स्नान करने से शरीर पवित्र होता है। लेकिन अगर
इस पवित्रता को सच्चे अर्थों में सबके बीच बनाए रखना है तो कुम्भ के जरिए यही संदेश प्रसारित किया जाए कि स्वच्छता तथा एकता का दर्शन अगर कहीं होता है तो वह कुम्भ पर्व के अलावा दूसरा और कोई हो ही नहीं सकता। हालांकि देश में कई ऐसे पर्व है, जिनमें लाखों की संख्या में श्रद्घालु एकत्र होते हैं, लेकिन स्नान पर्व की महिमा कुछ अलग ही है। यहां देवी के रूप में नदी को महत्ता दी गई है। कुम्भ के दौरान नदी में स्नान के वक्त यह संकल्प लेना होगा कि हर नदी को सदैव स्वच्छ रखना है। सार्वजनिक स्थलों, रहिवासी इलाकों में
व्याप्त गंदगी का देखकर यह सवाल उठता है क्या भारत सचमुच बदल रहा है। स्वच्छता के बारे में जिस तरह की जागरुकता जनमानस में दिखनी चाहिए थी, वह अभी तक नहीं दिख रही है। आधुनिकता के उच्च
स्तर को प्राप्त कुम्भ मेले के माध्यम से न केवल भारत अपितु पूरे विश्व में यह संदेश प्रसारित होना चाहिए कि इस बार का कुम्भ कई मायनों में अलग था, अगर यह बात इस बार कुम्भ मेले के माध्यम से समाज में प्रसारित हुई तो आने वाले कुम्भ उन देशों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनेंगे, जो इस आयोजन की ओर
गंभीरता से नहीं देखते हैं, तो आइए कुम्भ रूपी आस्था के महासागर के इस महापर्व को वह ऊंचाई प्रदान करें कि इसे देखकर स्वदेशी तथा विदेशी दोनों कहें की कुम्भ तेरे जैसा दूसरा कोई और हो
ही नहीं सकता।
