कोरोना और देश का पुनर्गठनकरीब40दिनों से कोरोना के लॉकडाउन का पूरे देश में लगभग शांतिप्रिय तरीके से पालन हो रहा है। सभी लोग जो शांति और संयम का पालन किए हुए हैं,उन्हें स्वयं की,मानवता की,धरती की एवं देश की चिंता है। ऐसा जो हुआ है,वह’न भूतो,न भविष्यति’वाले सिध्दांत पर लागू है। आधुनिक भारत में कभी भी देश की जनता एकसाथ कभी भी इतने लंबे दिनों के लिए एकसाथ कभी भी घर पर नहीं बैठी है। गरीब हो या अमीर,सभी के लिए यह एक टेस्टिंग टाइम है। लोगों की बाहर आवाजाही पर रोक है,यातायात के सभी साधन बंद हैं,बाज़ारों की खिड़कियां-दरवाज़े सभी बंद है,न ही दुकानदार ग्राहकों को देख सकते हैं,न ही ग्राहक कोई दुकानें। जिन भी लोगों के पास पैसा है,वह सब उसे संभालकर घर के जरूरी कामकाजों में लगा रहे हैं। कहते हैं कि भोजन ही जीवन की एक बड़ी आवश्यकता है। सभी सिर्फ घर में रहकर भोजन कर रहे हैं,लोगों के लिए अभी यही अच्छा है। ऐसे में सिर्फ खुद न खाएं,अपने आसपास के जरूरतमंदों के लिए घर में घर से ही भोजन बनाकर बांटें,क्योंकि आपको पता है कि ये ही लोग आपके दैनिक जीवन के हर छोटे-बड़े कामों में हाथ बंटाकर आपका स्तंभ बनते हैं।
देश में अचानक हुए लॉकडाउन से लाखों मजदूर जहां थे,वहीं फंसकर रह गए। मुझे विश्वास है कि सरकार व्दारा दी गई हरसंभव मदद उनतक पहुंच रही होगी। फिर भी घर से दूर यह सारे लोग अपने घर तक पहुंचने के लिए उतावले हुए जा रहे थे। उनकी सारी बचत,कमाई इन दिनों में किसी न किसी स्तर पर खर्च तो हो ही गई होगी। सरकार ने इन लोगों को अब उनके गंतव्य तक पहुंचाने के लिए जो बंदोबस्त किए हैं,उससे यह अपने घर तो पहुंच गए जाएंगे पर कुछ दिनों के लिए उन्हें ऑब्ज़रवेशन के लिए रखा जाएगा और फिर उन्हें घर जाने की इज़ाजत दी जाएगी। लाखों कामगर मजदूर जो कमाई की तलाश में हर दिन शहर का रुख करते हैं,उन्हें अब अपनी मिट्टी में ही जाकर आराम मिलेगा। इतनी बड़ी संख्या में गरीब तबके का पलायन देखकर यही लगता है कि सरकार को बहुसूत्रीय योजना लागूकर स्थानीय लोगों के रोज़गार के लिए उन्हीं के इलाके में कुछ प्रबंध करने चाहिए। हमारे देश के कुल 28 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेशों में अलग-अलग प्रकार के उपक्रम स्थापित किए जाने चाहिए। ऐसे उपक्रम,जिससे रोजगार के विभिन्न अवसर मिले और गांव,तहसील,ब्ल़ॉक आदि जैसे यूनिटों में उनका कच्चा सामान तैयार हो। जो बाद में बड़ी जगहों पर जाकर एसेंबल हो,और इससे निर्माण का कार्य आगे बढ़े। हमारे देश की इतनी अधिक जनसंख्या होने के बावजूद हम अभी भी विकासशील देशों की श्रेणी में ही रहकर खुश हैं। देश के निर्माण में सहयोगी बनने के लिए एक-एक हाथ का सहयोग देश की तकदीर एवं तस्वीर दोनों ही बदल सकता है। देश के हर गांव में स्किल मैनेजमेंट की तैयारी कराई जाए। जब रोजगार होगा,तो लोगों का मन नहीं भटकेगा और वह कामकाज में लगे रहेंगे। इतनी व्यस्तता के बाद कहां किसी को अपनी मिट्टी छोड़कर जाने का मन करेगा। इस बात से एक फायदा यह होगा कि लाखों की संख्या में बाहर जाते हुए लोगों का भार किसी भी दूसरे राज्य को वहन नहीं करना होगा।
इसके लिए एक काम किया जा सकता है कि अठारह वर्ष की उम्र के बाद के सारे युवाओं को उनकी शिक्षा,अनुभव के आधार पर या किसी युवक के किसी कारण से अशिक्षित रह जाने के कारण, उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में चुनकर, वहीं उनके कामकाज का प्रबंध भी कर देना चाहिए। साथ ही सरकार को उद्यमिता के भी सारे अवसर इस युवा पीढ़ियों को देने चाहिए। अमूमन यह देखा गया है कि कई बार उन उद्यमी बनने से लोगों में एक अनूठा जोश आ जाता है और कुछ करने का जज्बा लेकर वह अपने काम को आगे बढ़ाते हैं और साथ में अपने साथ वह कई युवाओं को आगे लेकर चलने का हौंसला रखते हैं। ऐसे में सरकार को जितना ज्यादा हो उतनी वित्तीय सुविधाएं ऐसे युवकों को देना चाहिए,जिससे वह देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे सके।
इस लॉकडाउन से यह फायदा हुआ है कि आकाश स्वच्छ हो गया है,ओज़ोन परतें बंद हो गईं हैं, प्रदूषण कम हो गया है। हम सबने देखा कि हिमालय की श्रृंखलाएं अब कितने सारे शहरों से दिखाई देने लगीं हैं,ऐसा हम कितनी भी कोशिशें कर लेतें, वह चाहकर भी नहीं कर सकते थे। गंगा-यमुना का पानी अपने आप साफ हो गया और वह अपने तटों पर निर्मल बह रही हैं, ऐसी परियोजनाओं पर सरकार ने कई करोड़ों खर्च कर दिए हैं,पर बिना कुछ किए ही कितने अच्छे परिणाम सामने आने लगे हैं। क्या हमें इससे कुछ सबक नहीं लेना चाहिए?वातावरण में कितना जबरदस्त परिवर्तन आ चुका है। यह सब बताने और सीखने के लिए कोई नया और अलग मौका नहीं मिलेगा। प्रदूषण इन सारी समस्याओं की जड़ है, इसका जड़ांत करने के लिए सरकार को समय रहते कुछ न कुछ ठोस योजनाओं के साथ सामने आना चाहिए,जिसे अगर लागू किया जाएगा,तो संभव है कि इसके बेहतर परिणाम अगले 5-10 सालों में लोगों और इस धरती को मिलने शुरु हो जाएंगे।
ऑफिसों के कल्चर में भी थोड़ी ढ़ील मिलने की संभावनाएं इससे दिखती हैं। वर्क फ्रॉम होम(WFH)जैसी सुविधाजनक कोशिशों से रोज़-रोज़ दफ्तर जाने के झंझट से भी छुटकारा पाया जा सकता है। महानगरों में दूरी एक बड़ी समस्या है, सुबह दफ्तर के लिए जो लोग निकलते हैं,उनमें से अधिकांश लोग रात के 8-9 बजे से पहले वह घर नहीं आ पाते। ऐसे में रुलाने वाले ट्रैफिक,लंबा इंतजार,लंबी दूरियों,सबसे सबको निजात मिलेगी। पीठ के दर्द,कमर के दर्द,स्पॉडिलाइटिस और न जानी कितनी ही बीमारियों से आप बच सकते हैं,जो हर दिन लंबी दूरी का सफर तय करने के कारण हम सबको हो जाती है। अगर ऑफिस चाहें तो शिफ्ट में भी काम किया जा सकता है। यह लिखने और करने में बहुत अंतर है,क्योंकिWFHवाले लोगों को घर के काम भी निपटाने पड़ते हैं और दोहरी जिम्मेदारी घर पर रहकर आ जाती है,पर अगर ऑफिस इसकी भी एक सारिणी बना लें,तो लोगों का जीवन सुलभ एवं संयमित हो सकता है।
अंत में कोरोना से निबटने के लिए यह जरूरी एवं अत्यावश्यक है कि सामाजिक दूरी बनाए रखें। बार-बार घर से बाहर जाने के बहाने न खोजें। कभी भी बाहर से आएं तो साबुन का इस्तेमाल कर हाथ-पैर अच्छे से धोएं, घर के आसपास सफाई रखें। बाहर से सामान लाने पर उसे अच्छे से धोएं,साफ करें, और ऐसा करने के बाद ही उसका इस्तेमाल करें। एक नियत दूरी से ही सामने वाले से संपर्क बनाएं। जहां तक हो अपने घर के दैनिक कार्य स्वयं ही करें, इससे आपके घऱ में ज्यादा लोगों की आवाजाही भी नहीं होगी और गृहकार्य पूरा करने के लिए किसी पर भी निर्भरता नहीं रहेगी। काम करते रहने से आप स्वस्थ एवं फिट रहेंगे। आशा है कुछ ही दिनों में कोरोना का वैक्सीन भी आ जाएगा,जो लगाना सबके लिए अनिवार्य होगा। फिर क्या है, हम सभी अपने जीवन की दिनचर्या को परिवर्तित कर देशहित में,इस धरती मां के हित में कुछ न कुछ सार्थक प्रयास जरूर कर पाएंगे।
