धर्म और अधर्म क्या है

भारत में मतांतरण की प्रक्रिया भी राजनैतिक प्रतीकों की व्यथा-कथा बनकर रह गई है। इसको राष्ट्रीय संदर्भ में उचित रूप से देखा-समझा नहीं जा रहा है। यह आश्चर्यजनक है कि भारतीय मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग प्राय: उन राष्ट्रीय हितों की भी अनदेखी कर देता है, जिन पर इस राष्ट्र की सुरक्षा और एकता, अखंडता की नींव टिकी हुई है।

विगत कुछ वर्षों में धर्म परिवर्तन के संदर्भ में भारत में विमर्श की प्रक्रिया तेज हो गई है। धर्म वास्तव में किसी भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। वह किस धर्म, मत पंथ अथवा उपासना पद्धति को स्वीकार करना चाहता है, यह उसका नितांत व्यक्तिगत मौलिक अधिकार है। भारत में अपने धर्म और स्वीकृत विचारों का प्रचार-प्रसार भी समाज में करने के लिए स्वतंत्र है। यहां तक सब ठीक है। इसके आगे जब अपने धर्म और मत पंथ के प्रचार-प्रसार के लिए प्रलोभन, साजिश, उत्कोच और हिंसा व दबाव का प्रयोग किया जाता है, तो इसे अनुचित, अस्वीकार्य और विधि विरुद्ध माना जाता है। भारतीय संविधान और कानून व्यवस्था ऐसे प्रयासों को अपराध की श्रेणी में रखती है। धर्म परिवर्तन के लिए भी मनुष्य किसी भी क्षण स्वतंत्र है।धर्म परिवर्तन के संदर्भ में व्यक्ति की आंतरिक प्रेरणा होनी चाहिए, न कि बाह्य शक्तियों का दबाव।

धर्म परिवर्तन का मूल उद्देश्य यदि आध्यात्मिक लक्ष्यों की प्राप्ति है, तो यह मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है। इसके विपरीत यदि धर्म परिवर्तन लालच, दबाव, प्रलोभन के आधार पर होता है और इसका मूल लक्ष्य राजनैतिक है और रणनीतिक है, तो ऐसा धर्म परिवर्तन निंदनीय, त्याज्य और अस्वीकार्य होता है। धर्म परिवर्तन का वास्तविक अर्थ आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति है। इसे किसी धर्म विशेष की जनसंख्या बढ़ाने का अराजक उपकरण नहीं बनने देना चाहिए।

भारत में प्राय: ऐसे उदाहरण सामने आते हैं, जब लोग विवाह करने के लिए अपना धर्म परिवर्तन करा लेते हैं। ऐसा धर्म परिवर्तन वास्तव में धर्म और आध्यात्मिक विचारों का उपहास मात्र है। इस पर अवश्य ही रोक लगनी चाहिए। अकसर लोगों को डरा-धमका कर उनका धर्म परिवर्तन कराया जाता है, परंतु क्या ऐसा करने-कराने वाले वास्तव में धर्म का अर्थ समझते भी हैं।

नि:संदेह आज संपूर्ण विश्व में धर्म परिवर्तन एक उद्योग एवं व्यवसाय बन गया है अनेक पेशेवर संगठन इस घृणित कार्य में लगे हुए हैं। ऐसे प्रयासों का वास्तव में धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। यह एक ऐसा कारोबार है, जिसकी बुनियाद ही झूठ से शुरू होती है। संपूर्ण वैश्विक इतिहास में सत्ता संघर्ष और मतांतरण में सीधा एवं प्रत्यक्ष संबंध रहा है। जब भी विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा किसी देश पर हमला किया गया और वहां जीत मिली, तो इसके बाद तेजी से स्थानीय नागरिकों का बलपूर्वक हिंसक ढंग से धर्मांतरण कराया गया।

मानव इतिहास ने वे भी दिन देखे हैं, जब जबरन धर्म परिवर्तन के नाम पर पूर्व रोमन साम्राज्य में इंसानों को जीवित मशाल की शक्ल में इस्तेमाल किया जाता था। मानव सभ्यता ने मतांतरण और धर्म परिवर्तन के नाम पर एक दीर्घकालिक हिंसक दौर देखा है। उस धर्म के नाम पर इस विश्व के करोड़ों नागरिकों की हत्याएं की गई, जिसे मानव समाज कल्याण के लिए स्वीकार किया गया।

मानव सभ्यता का इतिहास अतार्किक दृष्टïतों से भरा पड़ा है। यह एक तथ्य है कि मानव सभ्यता ने धर्म को लेकर कभी भी वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टिïकोण का परिचय नहीं दिया है। आदिकाल से ही धर्म को लेकर रक्तरंजित संघर्ष होते रहे हैं। वास्तव में यदि कोई भी धर्म हिंसा, अराजकता और दुराचरण को स्वीकार नहीं करता, तो फिर मानव सभ्यता का इतिहास इतना रक्तरंजित क्यों रहा है। कट्टरपंथी, दुश्चरित्र आततायियों और आक्रमणकारियों को प्रभाव संपूर्ण समाज पर प्रत्येक काल में ही स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता रहा है।

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