मृत्यु की महामारी में सहमें हुए जीवन को देखकर अब बहुत याद आते हैं

भगवान बुद्ध। मानवता के प्रति उनकी असीम करुणा, निष्ठुरता को पिघला देने वाली उनकी संवेदना, उनके कहे हुए वचन अब की जिंदगी के लिए संजीवनी हैं। इस दौर के इंसानी जीवन को इसी की तलाश है। कौन! किससे कहे। अपनी व्यथा। संवेदना के तीर्थ स्थलों पर संवेदनहीन प्रहार हो रहे हैं। संकट मोचन संकट के घेरे में हैं। लहू का लाल रंग, क्षतविक्षत जीवन की चीटकारें सुनकर भी तो किसी का अंतर्मन व्यथित नहीं हो रहा। सिसकता हुआ सवाल तो है कि भगवान तथागत के पग चिन्हों पर कौन चलेगा? पर उत्तर नहीं है, क्योंकि उत्तर देने वाली बुद्धि का अब कमी है। भला कहां खोजें उस बुद्धि को, जो कृष्ण की गीता के अनुसार स्थिर है, जिसकी आस्था कपट पर नहीं करुणा पर है। जो बुद्धिमान चक्रव्यूह नहीं रचती, बल्कि अनुकूलता संवेदना के सरंजाम जुटाती है। जिसका विश्वास पीड़ा देने में नहीं बल्कि कष्ट मिटाने में है। अब तो वह बुद्धि भी नहीं जिसकी चर्चा योगर्षि पतंजलि ऋतंभरा के रूप में करते हैं, जो विवेक ख्याति बनकर जीवात्मा से अविद्या के मल को धोती है।

अब तो केवल उस विनाशक बुद्धि के दर्शन हो रहे हैं, जो स्वार्थ का कालपाश लिए अहंकार का मदिरा पान किए औरों के जीवन पर घातक प्रहार कर रही है। उसे तो यह भी चेत नहीं है कि दोषी कौन है और निर्द्रोष कौन? उसके द्वारा विनाशक धमाकों से जिनके प्राण जा रहे हैं, भला वे कौन हैं? बुद्ध ने अब से ढाई हजार साल पहले इस व्यथा को भांपते हुए कहा कि अगर बुद्धि को साफ न किया गया तो परिणाम भयावह होंगे। उन्होंने चेताया था कि बुद्धि के दो ही रूप संभव हैं1. कुटिल और 2. करुण। बुद्धि अगर कुसंस्कारों से लिपटी है, स्वार्थ के मोहपाश एवं अहंकार के उन्माद से पीड़ित है तो उससे केवल कपट ही निकलेगी, लेकिन इसे अगर साफ किया जा सका तो इसी कीचड़ में करुणा के फूल खिल सकते है। बुद्धि अपनी अपवित्र दशा में इंसान को शैतान बनाती है तो इसकी परम पवित्र साफ दशा में इंसान बुद्ध बनता है, उसमें भगवत्ता उद्धृत होती है। मानव बुद्धि को साफ करने के लिए भगवान बुद्ध ने इसका विज्ञान विकसित किया। उन्होंने इसके लिए आठ बिंदु सुझाए। इस अष्टग-पथ को जो माने उसकी बुद्धि साफ होकर बुद्ध का अनुगमन कर सकती है। आठ चरणों वाली इस यात्रा का पहला चरण है-

1.सम्मादिदिष्ट अर्थात् कि सम्यक् नजर। अर्थात्- सबसे पहली जरूरत है कि हमारा दृष्टिकोण सुधारे। हम समझें कि जीवन सृजन के लिए है न कि विनाश के लिए। ऐसा होने पर विकसित होता है।

2. सम्मा संकल्प-अर्थात्-सम्यक् संकल्प। इसके होने पर हम सही निश्चय करने के योग्य बनते है। और तब होता है।

3. सम्मावाचा-अर्थात् कि सम्यक्ï वाक्ï। जिससे हम ऐसी वाणी बोलते हैं, जो अपने साथ औरों को भी शीतल करने वाली होती है।

4. सम्माकम्मांत अर्थात्- सम्यक् कर्मांत की बात आती है। जो इस अवस्था में पहुंचते हैं वे सभी दुष्कर्मों से मुक्त हो जाते है।

5. सम्मा आजीव कि सम्यक्ï आजीविका का पालन करना सहज होता है।

6. सम्भावनायाम् अर्थात् कि सम्यक् व्यायाम की भाव-दशा विकसित होती है। इस अवस्था में कर्मशुद्धि के साथ संस्कार शुद्धि भी होती है।

7. सम्मा सति अर्थात् कि सम्यक् स्मृति का इस स्मृति परिशुद्धि की दशा में बुद्धि की साफ का विकसित स्वरूप प्रकट होता है।

8. सम्मा समाधि अर्थात् कि सम्यक् समाधि में बुद्धि बुद्धत्व में प्रतिष्ठित होती है। ये आठों चरण क्रमिक रूप से बुद्धि को साफ करने वाले हैं। बुद्धि जितनी साफ होती है उतनी ही वह क्षुद्रताओं से मुक्त होती है। उतनी ही उसमें संवेदना पनपती है और तब जीवन मृत्यु की महामारी से मुक्त होता है। जीवन चेतना के पुष्प खिलते हैं, पर यह होता तभी है जब कोई भगवान बुद्ध के पगचिन्हों का अनुकरण करे। यही संवेदना संजीवनी अब की महौषधि है। जिसका इस्तेमान मनुष्यता के मुरझाए प्राणों में नवचेतना का संचार कर सकता है।

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