डर एक नकारात्मक भावना है।मनुष्य का जीवन डर की जीत के लिए संघर्ष है।विश्व में प्रत्येक व्यक्ति प्रायः किसी न किसी रूप में डर से ग्रस्त है।कुछ व्यक्तियों को कुछ खो देने का डर रहता है,किसी को अपने आत्मीय जनों से बिछड़ने का डर रहता है,

भगवद्द गीता के अनुसार अर्जुन युद्ध नहीं लड़ना चाहते थे,क्योंकि उन्हें अपने गुरु और भाइयों को युद्ध में खोने का डर था,उस समय श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध लड़ने का मार्ग दिखाया।इसलिए व्यक्ति को भावना में बहकर निर्णय नहीं लेना चाहिए,क्योंकि भावनाएँ तात्कालिक होती हैं,गीता के छठे अध्याय में श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें अपने मस्तिष्क को संतुलित करके चलना चाहिए।ज़्यादा ख़ुशी या दुःख की स्थिति में लिया गया निर्णय ग़लत साबित होता है।

श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि,”हे अर्जुन जो बुद्धि प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग को,कर्तव्य और अकर्तव्य को,भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को जानती है वह बुद्धि सात्विक है ।”

भय और कुछ नहीं बल्कि प्रेम का ही उलट पलट स्वरूप है।अर्जुन ने जब भगवान से चतुर्भुजरूप होने के लिए प्रार्थना की तब भगवान ने अर्जुन को पहले चतुर्भुज़रूप दिखाया फिर पुन:द्विभुज़रूप(मनुष्य रूप में प्रग़ट हो गए।)ये रूप उन्होने अर्जुन को इसलिए दिखाया कि सब कुछ केवल सुंदर नहीं है किंतु “भयावह”भी है।विश्व रूप को देखकर डरे हुए अर्जुन को उन्होने आश्वासन दिया कि जहाँ कहीं,किसी विशेषता को लेकर हमारा मन चला जाए अर्थात हम भयभीत हो जाएँ तो वहीं भगवान का चिंतन करें और भगवान के विश्व रूप का पठन पाठन करें।”मेरे इस विश्वरूपको देखकर तू न डर न परेशान हो,शांत और प्रसन्न भाव से मेरे इस रूप को देख।”

अगर हमें पूर्ण प्रौढ़ता प्राप्त करनी है,परिपक्वता प्राप्त करनी है तो हमें अच्छे बुरे अहसास भी करने होते हैं क्योंकि विश्व में प्रिय के साथ अप्रिय का वास भी है,लेकिन जब तक इसे समान रूप से नहीं देखा जाता तब तक परिपक्वता नहीं आती।इसलिए तू मेरे अनेक सर,अनेक भुजाएँ,सहस्त्रो नेत्र वाले रूप को देख।

   अर्जुन कृष्ण के मुख में अनेक ब्रह्मांडों को प्रवेश होते देखकर चकित हो रहे हैं।इस स्वरूप का न तो कोई आदि है,ना मध्य है,ना ही कोई अंत।इस स्वरूप में ब्रह्मा,विष्णु,व महेश समाए हुए हैं।अर्जुन ये भी देख रहा है कि ध्रतराष्ट्र के समस्त पुत्र,सभी राज्यों से आए हुए राजा,,ध्रतराष्ट्र,भीष्मपितामह,और कर्ण,ये सब ईश्वर के विश्वमय रूप के मुख में प्रवेश करते जा रहे हैं।अब अर्जुन को “भय”लग रहा है,और वह हाथ जोड़कर श्री कृष्ण से क्षमायाचना करने लगा, कि जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं,उसी प्रकार इस संसार में जितने भी प्राणी हैं वे सभी श्री क्रण के मुख में समाते चले जाएँगे हैं।भय अधिक होने लगता है और वो बार बार नतमस्तक होने लगता है।और आराधना करने लगता है।तब क्रश्ण उसे समझाते हैं,कि,

“द्रोणाचार्य,भीष्मपितामह,कर्ण,दुर्योधन इन सब को तो मैं पहले ही मार चुका हूँ तू तो बस निमित्त बन।”

तात्पर्य यह है,कि “मनुष्य जब भक्तिमार्ग पर होता है तो इन पंचमहाभूतों से उसे ऊर्जा प्राप्त होती है और वो कर्मयोगी हो जाता है।इस दशा में वो कर्ता के साथ साथ भर्ता भी है।”

अर्जुन नतमस्तक होकर कृष्ण को अपना चतुर्भुज स्वरूप को दर्शन कराने की माँग करते हैं जिसमें गदा,शंख,चक्र और पद्म है।यह चित्त को शांति प्रदानों करने वाला है। ये चतुर्भुज रूप ना ही मंत्रो,न ही तप और दान से देखा जा सकता है सिर्फ़ तभी देखा जा सकता है जब सम्पूर्ण कर्तव्यों को समझकर व्यक्ति धर्ममय हो जाता है और लोग मुझ में ही आसक्त हो जाते हैं।ऐसा करते समय वो,राग,द्वेष,,बैर नहीं करते और मुझ में ही विलीन हो जाते हैं।

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