फिल्म थ्री इडियट्स में करीना कपूर एक डॉक्टर बनी थी जो तेज बारिश के कारण डिलीवरी कराने के लिए अपनी गर्भवती बहन को अस्पताल पहुंचने में पूरी तरह से असमर्थ थीं। तब उन्होंने इंटरनेट पर चैटिंग के माध्यम से हिदायतें देते हुए अपनी बहन की डिलीवरी आमिर खान के हाथों संपन्न करवाई। नतीजा यह रहा कि वर्तमान टेक्नोलॉजी के कारण मां और बच्चा दोनों को बचाया जा सका। फिल्म ‘थ्री इडियेट्स में डॉक्टर से फोन पर बातचीत करते हुए बच्चे की सफल डिलीवरी का आइडिया भले ही फि ल्मी था, लेकिन इसमें आने वाले समय की एक छोटी सी झलक भी छिपी थी।
अभी इसी साल की शुरूआत में इसी फिल्म से प्रेरणा लेकर राजस्थान के बीकानेर में भी एक महिला की डिलीवरी इंटरनेट के जरिए सफलतापूर्वक संपन्न करवाई गई। बीकानेर के नोखा कस्बे के गांव मैनसर में एक गर्भवती महिला मघी देवी की तबीयत जब अचानक बिगडऩे लगी तो किसी जानकार ने चिकित्सकों के वाट्सएप ग्रुप पर महिला की हालत की सूचना भेजी। मैसेज पढ़कर ग्रुप में सक्रिय डॉ. नवल गुप्ता सहित कई डॉक्टरों ने दिशा-निर्देश देने शुरू कर दिए और गांव में मौजूद कुछ पढ़े लिखे लोगों ने मिलकर महिला की डिलीवरी करवाने और रक्तस्राव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रक्तस्राव नियंत्रण में आने पर महिला को नोखा सीएचसी लाया गया, जहां जहां डॉक्टरों ने उसकी हालत को संभाल लिया।
फिल्म ‘थ्री इडिएट्स की ही तर्ज पर हिमाचल प्रदेश में भी बच्चे पैदा किए जा रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा हिमाचल प्रदेश में शुरू की गई मुफ्त एम्बुलेंस सेवा में तैनात इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियन आपातकाल में एम्बुलेंस में लगे फोन के जरिए डॉक्टर की सलाह लेकर बच्चों की डिलीवरी करवाने के मुश्किल काम को अंजाम दे रहे हैं और अपनी शिक्षा और हुनर को देश की सेवा के लिए एक सार्थक दिशा दे रहे हैं।
इस एंबुलेंस सेवा के कारण अब तक हिमाचल प्रदेश में एक दर्जन से भी ज्यादा बच्चे टेलीफोन पर डायरेक्ट ली जाने वाली डॉक्टर की सलाह के जरिए पैदा हो चुके हैं। सराहनीय बात यह है कि इन बच्चों को जन्म दिलाने वाले इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियनों ने कई मुश्किल माने जाने वाले मामलों में भी सफलतापूर्वक डिलीवरी करवाई है।
यह तो थी सिर्फ फोन के जरिये चिकित्सा की बात, लेकिन खुशखबरी यह है कि आनेवाले समय में हम इससे भी आगे की अनेक तकनीकों के बारे में न सिर्फ जानेंगे बल्कि इस तकनीक का भरपूर लाभ भी उठा सकेंगे। हमारे आज के तकनीक गुरु गूगल ने ऐसी ही एक नई तकनीक ईजाद की है- गूगल ग्लास। गूगल ग्लास की मदद से अब दूर दराज में रहने वाले रोगियों को चिकित्सकीय मदद आसानी से पहुंचाई जा सकेगी। इससे जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि इसके शुरुआती परीक्षण बेहद सफल रहे हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स मेडिकल स्कूल के पीटर आर. चाइ के अनुसार आपातकालीन टेलीमेडिकल उपकरण के तौर पर गूगल ग्लास सबसे कारगर है। यह छोटा और पोर्टेबल होता है और बिना हाथ लगाए इसे इस्तेमाल किया जा सकता है। रोगी इसे पहनकर सीधे डॉक्टर से जुड़ सकते हैं।
गूगल ग्लास से पहले के पारंपरिक टेलीमेडिसिन उपकरण बड़े डेस्कटॉप या लैपटॉप कंप्यूटरों से जुड़े होते थे। इससे उन्हें इस्तेमाल करने की सहजता खत्म हो जाती थी। गूगल ग्लास को चश्मे के साथ पहनकर डॉक्टर किसी भी तरह की जांच की की तस्वीरों को बड़ा करके देख सकते हैं और दूर बैठे, यहां तक कि विदेशों में बैठे स्वास्थ्य विशेषज्ञों से भी जुड़ सकते हैं। इस बारे में यूमास मेमोरियल मेडिकल सेंटर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने 18 परीक्षण भी किए हैं। उन्होंने गूगल ग्लास पहनकर दूर बैठे रोगियों की जांच की और उस जांच के आधार पर संरक्षित किए गए वीडियो प्रमाणों को विशेषज्ञों के पास भेजा। परीक्षणों की जांच के बाद विशेषज्ञों ने गूगल ग्लास पर लिखित संदेश के जरिए उनका मार्गदर्शन किया।
इसके अलावा, गूगल ग्लास के माध्यम से किए गए उपचार के बाद रोगी की देखभाल में भी सुधार देखा गया। चाइ के अनुसार, इस तरह विशेषज्ञों की रोगियों के पास वर्चुअल मौजूदगी के कई लाभ हैं।
इससे सिर्फ गांव में रह रहे रोगियों को ही नहीं बल्कि शहरों और मेट्रो तक के रोगियों को भी बहुत फायदा होगा क्योंकि कई बार ऐसा होता है कि रोग के विषय में ही डॉक्टर सही जानकारी नहीं दे पाते। खासकर बड़े और मारक रोगों की स्थिति में विदेशों में बैठे विशेषज्ञों से भी सलाह ली जा सकेगी। इससे पता लग जाएगा कि रोगी को विदेश भेजने का कुछ फायदा है या नहीं। फिर जरूरत के अनुसार रोगी को वहां भेजा जा सकेगा।
