जैसे हमारे जुगाड़प्रिय देश में किसी भी वस्तु का सदुपयोग बाद में होता है, दुरुपयोग पहले होने लगता है, ठीक वैसे ही पिछले अनेक सालों से दहेज रोकने के लिए बनाया गया कानून दहेज विरोधी कम पति विरोधी अधिक हो गया था। उच्चतम न्यायालय ने 2010 में एक फैसले में कहा था कि यह कानून असंतुष्ट महिलाओं के हाथों का हथियार बन गया है। उसने यह भी कहा था कि संसद में इस कानून के सभी प्रावधानों पर गंभीरता से फिर से विचार करने की जरूरत है। इसके बाद अब दहेज विरोधी कानून में संशोधन की सरकार की पहल स्वागत योग्य है।
अब दहेज उत्पीडऩ के मामलों में सुनवाई के शुरू में ही पति एवं पत्नी के बीच सुलह-समझौता होना भी आसान हो गया है। फिलहाल, इस अपराध में सुलह समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है। इस संशोधन में दोनों पक्षों पर कानून के दुरुपयोग के मामले में जुर्माने की राशि बढ़ाने की भी सिफारिश की गई है। अभी, अगर दहेज उत्पीडऩ का मामला सिद्ध हो जाता है या कानून का दुरुपयोग साबित हो जाता है तो सिर्फ एक हजार रुपये के जुर्माने का प्रावधान है जिसे संशोधन के बाद 15 हजार किए जाने का प्रस्ताव है। संशोधन में इस प्रावधान की भी उम्मीद है कि आरोपी जुर्माना भर कर जेल की सजा से बच सके। हालांकि यह कदम अब पत्नी पर भारी पड़ सकता है।
धारा 498ए का यह कानून 1980 के दशक के आरंभ में लाया गया था। तब दिल्ली और अन्य जगहों पर दहेज उत्पीडऩ के ढेर सारे मामले सामने आए थे लेकिन आज स्थिति बहुत बदली हुई है। इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़कर आज न तो वैसी सास हैं जो अपनी बहू को दहेज के लालच में जला दिया करती थीं और न ही वैसी बहू हैं जो अपनी सास और ससुराल वालों की खरी-खोटी और अत्याचार चुपचाप सहन करती रहती थीं। आज की सास जानती है कि अगर वह बहू से ज़्यादा कुछ कहेगी तो उसकी बहू उसे उठाकर ताक पर बिठा देगी और बहू जानती है कि उसे अपने फायदे के लिए सास को कैसे ‘ट्रीट करना है।
ऐसे में भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के इस कानून के प्रावधान आज के संदर्भ में सही नहीं बैठते हैं। इस कानून में रिपोर्ट दर्ज होते ही पति और परिजनों की गिरफ्तारी का प्रावधान है। इन मामलों में जमानत की प्रक्रिया भी बेहद कठिन और जटिल है।
पति या उसके परिवार के सदस्यों को तब तक दोषी माना जाता है जब तक वह अदालत में खुद को निर्दोष साबित नहीं कर दें। कानून को इतना कड़ा बनाने का मकसद दहेज जैसी कुप्रथा को मिटाना और इसकी खातिर होने वाली हत्याओं पर रोक लगाना था ताकि इससे नवविवाहित स्त्रियों को राहत मिले लेकिन स्वार्थी लोगों ने इसे दूसरे पक्ष को उत्पीडि़त करने का हथियार बना लिया। आर्थिक समृद्धि की चाहत, सामाजिक और मानसिक दबाव और भागदौड़ भरी जीवन शैली के कारण पति-पत्नी के रिश्तों में भी नैतिकता की जगह स्वार्थ हावी हो गया है।
ऐसे में आपसी मनमुटाव, पारिवारिक कलह आदि कारणों की परिणति दहेज के झूठे मामलों के रूप में सामने आई। बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे तक इस कानून के शिकार बनकर जेल में सडऩे पर मजबूर हो गए। इस दुरुपयोग को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून पर चिन्ता जताते हुए राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में पुलिस गिरफ्तारी से पहले पूरी तरह से आश्वस्त होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि दहेज हत्या के दर्ज मामले में किसी व्यक्ति पर मुकदमा चलाने के लिए उसे तभी रिश्तेदार माना जाए जब पति से उसका खून, विवाह या गोद लिए जाने का रिश्ता हो। असंतुष्ट पत्नियों द्वारा पति और ससुराल के लोगों के खिलाफ दहेज विरोधी कानून के दुरुपयोग पर चिन्ता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस ऐसे मामलों में आरोपियों को बिना किसी साक्ष्य के गिरफ्तार नहीं कर सकती। पुलिस को ऐसे में साक्ष्य या कारण बताना होगा, जिसका न्यायिक परीक्षण किया जा सके।
उधर सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह समेत अनेक महिलावादी नेता इस कानून पर कोई समझौता नहीं चाहतीं। उनकी बात भी गलत नहीं कही जा सकती। सच तो यह है कि कानून का कोई भी पलड़ा हलका नहीं होना चाहिए। लेकिन कानून का समय के साथ चलना भी आवश्यक है। यह तभी संभव है जब पुलिस और समाज का रवैया जिम्मेदाराना होगा। आज दरकार है कि हम सभी देश में अपनी-अपनी भूमिका को सही तरह से निभाएं और समाज के प्रति अपनी- अपनी जिम्मेदारी को समझें। जन पर चलने वाले जनतंत्र यानी हमारी सरकार, हमारा कानून और हमारा देश तभी सही तरह से, सही दिशा में चल पाएगा।
