साईं बाबा कौन थे और उनका जन्म कहां हुआ था? ये कुछ प्रश्न ऐसे हैं जिनके जवाब आज तक नहीं मिलें। साईं बाबा ने कभी इन बातों का कभी जिक्र ही नहीं किया। उन्हें आम लोगों के बीच रहकर साधारण जीवन जीना पसंद था। कहते हैं कि उन्होंने समाधि ली थी। सबसे खास बात यह है कि शिरडी से लेकर जहां कहीं भी साईं बाबा के मंदिर बने हैं, वहां उनकी मूर्ति की एक ही छवि देखने को मिलती है।
वह भी संगमरमर की मूर्ति। मान्यता है कि साईं के इस आसन वाली मूर्ति को शिरडी में ही बनाया गया था, जहां उन्होंने समाधि ली थी। इस मूर्ति की पूजा का विधान 1954 से चलता आ रहा है। ऐसी मूर्ति के पीछे एक रहस्य भी छुपा है, जिसके बारे में उनके भक्तों को शायद ही पता हो।

दरअसल, लोगों का मानना है कि साईं अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने के लिए खुद आते हैं। एक घटना खुद साईं बाबा की मूर्ति बनाने वाले शिल्पकार से जुड़ी है। इसके बारे में जानकर आपको भी हैरानी होगी। कहते हैं कि जिस शिल्पकार को साईं बाबा की मूर्ति बनाने के लिए कहा गया था, तब उसके सामने सबसे बड़ी समस्या यह आए कि वो मूर्ति को किस तरह की बनाए? ऐसी दुविधा में उससे कहा गया कि वो साईं बाबा को मन में याद करके मूर्ति बनाए।

मूर्ति बनाते समय जब उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, तब वो निराश होकर बैठ गया और प्रार्थना करने लगा कि हे साईं बाबा आप मुझे इतनी शक्ति दीजिए कि मैं ऐसी प्रतिमा बना सकूं, जो मनमोहक हो। इसके बाद साईं बाबा ने खुद दर्शन दिए और जिसके बाद यह आसन वाली मूर्ति बनी। साईं बाबा की प्रतिमा बनाने वाले का नाम वसंत तालीम है। मूर्ति से जुड़ी एक रहस्यमयी जानकारी यह है कि आज तक कोई नहीं जान पाया है कि साईं बाबा की मूर्ति बनाने के लिए पत्थर किसने भेजा था सिवाए इसके कि यह इटली से आया था।
यह घटना 1954 की बताई जाती है। साईं बाबा की मूर्ति को बनाने के लिए मुंबई के बंदरगाह पर इटली से मार्बल आया था। मार्बल पर सिर्फ इटली लिखा था इससे पता चला कि पत्थर वहां से आया था। वैसे तो इसके बाद इस आसन वाली अब तक लाखों-करोड़ों मूर्तियां बन चुकी हैं, लेकिन शिरडी में विराजी मूर्ति की बात ही अलग है। इस मूर्ति की खासियत यह है कि जब आप साईं बाबा की ओर गौर से देखेंगे, तो लगता है कि वे हमें देख रहे हैं और भक्तों की प्रार्थनाओं को सुन रहे हैं।
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