आत्मिक प्रगति का प्रथम चरण है उपासना- उपासना का विच्छेद होता है- उप-आसन अर्थात् निकट बैठना ही वास्तव में उपासना है। मानव अंत:करण के साथ ईश्वर की घनिष्ठता, मानव में उत्कृष्ट चिंतन, आदर्शवादी भावना एवं संवेदना उत्पन्न करती है। ईश्वर वास्तव में निराकार है। उसकी साकार प्रतिमा तो ध्यान-धारणा की सुविधा के लिए निर्मित की जाती है। किसी कल्पित प्रतिमा में उत्कृष्ट चिंतन, आदर्शवाद एवं अन्य दिव्य संवेदनाओं के उपस्थित होने की मान्यता हमें उसका उपासक बनाती हैं। ऐसे महा-मानव, जिन्होंने आदर्शों का परिपालन लोक मंगल हेतु किया तथा स्व जीवन को नि:स्वार्थ भाव से जन समर्पित किया, उन्हें भी ईश्वर का ही प्रतीक माना जा सकता है।

भिन्न-भिन्न युगों में ऐसे महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिन्होंने जनसाधारण को एक नया चिंतन तथा कल्याणकारी दिशा दी। त्रेतायुग में श्रीराम, द्वापर युग में श्रीकृष्ण, कलयुग में महात्मा बुद्ध, सतयुग में राजा हरिश्चन्द्र को ईश्वर का अंशावतार माना जा सकता है। ऐसे महामानवों को ईष्ट मानकर, उन्हीं के सांचे में स्वयं के व्यक्तित्व को ढालने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। चिंतन में भाव-संवेदनाओं का समावेश करना, उपासना क्षेत्र के अंतर्गत आता है। इस निमित हेतु किया जाने वाला पूजन-प्रयास उपासना ही कहलाता है।

आत्मिक प्रगति का द्वितीय चरण है साधना– शरीरचर्या की धारा-विधा जीवन साधना के क्षेत्र में आती है। साधारण शब्दों में, चरित्र निर्माण भी कहा जा सकता है। इसके अंतर्गत उचित आहार-विहार, रहन संयम, कर्तव्य पालन, सदगुणों का, अभिवर्द्घन तथा दुष्प्रवृतियों का उन्मूलन आते हैं। 

संयमशील, अनुशासित एवं सुव्यवस्थित क्रियाकलाप अपनाना जीवन साधना ही कहलाएगा। व्यक्तित्व को पवित्र एवं प्रखर बनाने की प्रक्रिया जीवन-साधना होती है। जीवन वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने लगना, ताकि जीवन भव्य एवं दिव्य बन सके, जीवन-साधना है। ऐसा करने पर ही आत्मा में परमात्मा का अवतरण संभव हो पाता है। किसी ने सच ही कहा है।

संयममय जीवन हो, संयममय जीवन –चरित्रवान व्यक्तियों पर ही दैव्य वरदान बरसते हैं। सिद्धि, तृप्ति, संतुष्टि एवं शांति जैसी दिव्य विभूतियों से मात्र चरित्रवान ही संपन्न होते हैं। सद्भावना, शालीनता एवं सुसंस्कारिता के सभी लक्षण चरित्रवान व्यक्तियों में ही उभरे हुए दिखते हैं। जिन्होंने जीवन को साध लिया हो, वे साधारण एवं सामान्य परिस्थितियों में रहते हुए भी महामानव व देवमानव बन जाते हैं। इतिहास इस कथन एवं तथ्य का साक्षी है।

आत्मिक प्रगति का तृतीय चरण है आराधना- अभ्यर्थना एवं अर्चना, इसी के पर्यायवाची शब्द हैं। अन्य शब्दों में, हम आराधना को परमार्थ, लोकमंगल एवं जन-कल्याण भी कह सकते हैं।

इस विराट एवं ब्रह्म-स्वरूप संसार में निवास करने वाले सभी पदाथों एव प्राणियों का उनकी परिस्थितियों के साथ सुनियोजन करने-करवाने में संलग्न रहना ही आराधना है। मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के नाते सभी का ऋणी है तथा इस ऋण की भरपाई हेतु उसे परमार्थ परायण होना ही चाहिए।

उपासना, साधना एवं आराधना को निजचिंतन, चरित्र एवं व्यवहार में निरंतर एवं नियमित रूप से सम्मिलित करते रहना चाहिए। इन तीनों के मेल से ही संभव है। आत्मिक उत्थान।  

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