Funny Stories for Kids: निक्का को जाने कब कंचे खेलने का शौक लगा । उसके घर के पास ही गोपलू रहता था । कंचे खेलने में पूरे गाँव में वह उस्ताद था । निक्का को लगा, गोपलू इतना अच्छा खिलाड़ी है, तो भला मैं क्यों नहीं सीख सकता कंचे ?
अब तो हर दूसरे-तीसरे दिन निक्का जिद ठान लेता, “मम्मी -मम्मी , पैसे दो । कंचे लाने हैं ।”
मम्मी से इकन्नी लेकर निक्का दौड़ पड़ता । इकन्नी के आठ बढ़िया चम-चम करते कंचे आ जाते । काँच के गोल-गोल, संदुर कंचे । उनके अदंर भी तमाम संदुर-संदुर रंग-बिरंगे डिजाइन बने होते । उन्हें देखते ही निक्का खशु हो जाता और दौड़ा -दौड़ा खेल के मैदान में आ जाता । गोपलू से कहता, “गोपलू देख, मेरे नए-नए कंचे । चल खेलते हैं ।” मगर एक-दो दिन बीतते-न-बीतते निक्का की फिर वही पुकार सुनाई देती,
“मम्मी -मम्मी , कंचे…!” “अभी कल खरीदकर दिए तो थे, वे कहाँ गए ?” मम्मी झुँझँलाकर कहतीं ।
“मम्मी , हार गया मैं !” कहते-कहते निक्का की गरदन नीचे लटक जाती । फिर पता चला, निक्का के सारे कंचे एक-एक कर गोपलू की जेब में चले जाते हैं । पहले तो वह निक्का से खेल सिखाने के ही दो कंटे धरा लेता है । फिर बाकी कंटे भी धीरे-धीरे जीत लेता है ।
“ऐसे तो काम नहीं चलने वाला । निक्का , तू कब तक नए कंचे खरीदता रहेगा ?” मम्मी चिंता में पड़ गईं । फिर एकाएक कुछ सोचकर बोलीं, “चल निक्का , मैं सिखाती हूँ तुझे कंचे ।”
“सच मम्मी , तुम !” निक्का तो उछल पड़ा । जोर से । अभी तक उसके चेहरे पर अविश्वास की छाया थी । बोला, “तुम मम्मी …! तुम सिखाओगी मुझे कंचे ?” “क्यों नहीं ?” मम्मी मीठी-मीठी हँसी हँस दीं । बोलीं, “बचपन में मैं भी तो खेलती थी कंचे ।”
“सच, अरे वाह ! फिर तो मैं भी पक्कड़ हो जाऊँगा ।…गोपलू से कभी नहीं हारूँगा ।” निक्का खुश होकर नाचने लगा ।
उसी समय मम्मी ने निक्का को मजे-मजे में कंचे खेलना सिखाया । उसमें क्या होशियारी बरतनी है, यह भी बताया । साथ ही खेल में जीतने के ऐसे-ऐसे गुर बताए कि निक्का हैरान रह गया । वह मान गया कि मम्मी ऐसी-वैसी नहीं, बड़ी ही उस्ताद खि लाड़ी रही होंगी बचपन में । सिर्फ तीन दिन में मम्मी ने निक्का को कंचे का ऐसा पक्का निशाना लगाना सिखा दिया कि निक्का खुद ही अपनी कलाकारी देख-देखकर मुग्ध हो गया ।
फिर बोला, “मम्मी , जाऊँ अब गोपलू को हराने ?” मम्मी हँसीं, “ऐसे कैसे जाएगा रे निक्का ! पहले मेरी फीस तो देता जा, सिखाने की फीस…!”
“फीस…?” निक्का की आँखें फैल गईं । यह तो उसने सोचा ही नहीं था । मम्मी बोलीं, “मेरी फीस यह है कि तू शाम को सिर्फ एक घंटे कंचे खेला करेगा । बाकी टाइम पढ़ेगा या फिर दूसरे काम करेगा ।”
“मंजूर !” निक्का उछला और हाथ में कंचों को खनखनाता हुआ बाहर निकल गया ।
उस दिन उसने गोपलू को एक नहीं, तीन-तीन बार हराया । पूरे दस कंचे जीत लिए । गोपलू हैरत में आ गया । बोला, “ऐ रे निक्का , तेरे में कोई भूत तो नहीं आ गया ?”
निक्का खिड़-खिड़ करके हँसा । बोला, “हाँ, सच्ची -मुच्ची !” अगले दिन गोपलू फिर दस कंचे हारा । और तीसरे दिन तो निक्का के आगे पड़ते ही गोपलू अपने कंचे लेकर ऐसे भागा कि अलबेलापुर के सारे बच्चे तालियाँ बजा उठे । निक्का कंचों का चैंपियन हो गया । सब बच्चों ने मिलकर
नारा लगाया, “निक्का चैंपियन, जिंदाबाद !”
यहाँ तक कि गोपलू ने भी मान लिया कि निक्का का कोई जवाब नहीं । उसे खेल-खेल में दूसरों के कंचे जीतना आता है ।
पर निक्का भला लड़का था । वह जिसके भी कंचे जीतता, बाद में सारे के सारे लौटा देता । कहता, “मेरे पास आठ कंचे हैं । बड़े ही शानदार । चम-चम चमकते हुए । फिर मुझे और कंचे लेने की भला क्या जरूरत है ? इन्हीं कंचों से मैं अपना जादू दिखा सकता हूँ, और जिसे भी चाहूँ, हरा सकता हूँ ।”
सुनकर सब हैरानी से निक्का की ओर देखते और खूब तारीफ करते थे । मगर निक्का ? उसे अपने पर जरा भी घमंड नहीं था । कोई पूछता, तो वह मुसकराकर कहता था, “मेरी कोच तो मेरी मम्मी हैं । उन्हीं से मैंने सीखा है सब कुछ । सच्ची पूछो तो मेरी मम्मी हर चीज में उस्ताद हैं !”
ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ
